जस्टिस लोकुर ने किया मॉडल बालाश्रय भवन का उदघाटन

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पंचायत खबर डेस्क

श्रम की प्रधानता है लेकिन जब हमारे नौनिहाल अपनी पढ़ाई—लिखाई छोड़कर जब बालश्रमिक बन जाएं तो समाज के लिए चिंता की बात है। कानूनन तो बालश्रम जुर्म है ही। कुछ इसी दिशा में प्रयास होता दिख रहा है झारखंड के रांची शहर में जहां बाल श्रमिकों के पुर्नवास की कोशिश कई स्तरों पर की जा रही है। इस दिशा में बढ़ते हुए  बाल श्रम के शिकार बच्चों के पुनर्वास हेतु नवनिर्मित ‘‘बाल आश्रय’’ चिल्ड्रेन होम का उद्घाटन आज सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश श्री मदन बी. लोकुर, झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश माननीय विरेंद्र सिंह, झालसा के कार्यकारी अध्यक्ष माननीय न्यायाधीश डी एन पटेल एवं झारखंड हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश आर. आर. प्रसाद के द्वारा कार्यक्रम में रांची में किया गया। बाल आश्रय भवन में पुनवार्सन हेतु 32 बच्चे लाए गए हैं।

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माॅडल बाल श्रम पुनर्वास कार्यक्रम को लागू करने हेतु एक विस्तारित कार्ययोजना तैयार की गई जिसमें प्रत्येक साझीदारों की स्पष्ट जिम्मेवारी एवं भागीदारी तय की गई है। इस कार्यक्रम में महिला एवं बाल विकास विभाग, श्रम विभाग और यूनिसेफ महत्वपूर्ण साझीदार हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाल श्रम से छुड़ाए गए और बाल कल्याण समिति के द्वारा संप्रेक्षण गृह भेजे गए बच्चों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए, उन्हे मुख्यधारा में शामिल किया जाए साथ ही उनपर नजर बनाए रखा जाए ताकि उसे दुबारा बाल श्रम के दलदल में नहीं धकेला जा सके।

इस कार्यक्रम को जमीन पर सही तरीके से सुनिश्चित करने के लिए श्रम विभाग ने भवन मुहैया कराया है, जबकि महिला एवं बाल विकास विभाग ने आईसीपीएस के नियम के तहत बच्चों के देखभाल एवं भवन के परिचालन आदि के लिए सहयोग दिया है। यूनिसेफ इस कार्यक्रम के संचालन हेतू वित्तीय और तकनीकी मदद उपलब्ध करा रहा है। इस कार्यक्रम को लागू करने की जिम्मेवारी झारखंड महिला समाख्या सोसाइटी की है।

माननीय न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह प्रशंसनीय है कि राज्य सरकार और अन्य दूसरे साझीदार देखभाल और संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों के लिए एक माॅडल पुनर्वासन कार्यक्रम के साथ आगे आए हैं।

माननीय न्यायाधीश विरेंद्र सिंह ने बाल श्रम से छुड़ाए गए/देखभाल एवं संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों के परिवारो को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने पर बल देते हुए कहा कि यह बच्चों के पुनर्वासन के लिए एक चुनौती है।

माननीय न्यायाधीश डी एन पटेल ने कहा कि चिल्ड्रेन होम के उद्घाटन और माॅडल बाल श्रम पुनर्वास कार्यक्रम को लागू कर राज्य ने 23 अगस्त 2015 को जारी किए गए रांची घोषणा के तहत किए गए वायदों में से एक को पूरा कर दिया है। जल्द ही रांची घोषणा के अन्तर्गत किए गए अन्य वायदों जैसे कि केसों के जल्दी निस्तारण हेतु संप्रेक्षण गृहों में वीडियो कांफ्रेंसिंग की सुविधा और किशोर न्याय बोर्डांे के साथ इसको जोड़ना तथा संप्रेक्षण गृहों में परामर्श/कानूनी सहायता केंद्रों की स्थापना जिसे जल्द ही महिला एवं बाल विकास विभाग के द्वारा प्रारंभ किया जाएगा।

childlabourयूनिसेफ झारखंड की प्रमुख, डा. मधुलिका जोनाथन ने कहा कि, ‘‘ यह कई विभागो का सम्मिलित प्रयास है जिसमें शिक्षा विभाग, कौशल निर्माण मिशन, जिला बाल संरक्षण समितियां, बाल कल्याण समिति और पुलिस संयुक्त रूप से शामिल हैं। जिसका उद्देश्य है कि देखभाल और संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों का पुनर्वास और नियमित रूप से उनकी निगरानी ताकि वे दुबारा बाल श्रम के शिकार न हों। इसके अलावा इस कार्यक्रम में जरूरतमंद बच्चों के परिवारों के आर्थिक सशक्तिकरण को भी सुनिश्चित किया गया है।’’

कार्यक्रम में झारखंड हाईकोर्ट के कई माननीय न्यायाधीशों के साथ-साथ झारखंड के महालेखाकार, झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार, महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव श्री विनय चैबे़, यूनिसेफ झारखंड की बाल संरक्षण अधिकारी, श्रीमति प्रीति श्रीवास्तव, श्रम आयुक्त, श्री प्रवीण टोप्पो, रांची के उपायुक्त, झालसा के सदस्य सचिव, श्री नवनीत कुमार, महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त सचिव और आइसीपीएस के डायरेक्टर, श्री राजेश कुमार और झारखंड महिला समाख्या सोसाइटी की डा. स्मिता गुप्ता कार्यक्रम में उपस्थित थीं।

 

 

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