कमलेश कुमार सिंह
पटना: देश में भारत- पाकिस्तान, राम मंदिर, सांप्रदायिकता और असहिष्णुता आदि मुद्दे समाचार पत्रों और टीवी न्यूज़ चैनल की खूब सुर्खियां बटोरते हैं। हां! इन सबके बीच कभी-कभार खेती किसानी, किसानों के मुद्दे भी ज्वलंत समस्या बनकर आते रहते हैं। पक्ष- विपक्ष के अपने दावे- प्रतिदावे होते हैं। किसानों का भी अपना रोना होता है। लेकिन आज किसानों को कैसे लूटा जा रहा है। इस पर शायद ही कभी अखबारों या टीवी न्यूज़ चैनलों पर खबरें प्रकाशित या प्रदर्शित होतीं हैं । आखिर कभी आपने सोचा है कि किसानों को मनोवांछित फसल का उत्पादन क्यों नहीं हो पाता। हां, कहा जाता है कि मौसम की मार किसानों पर, बाढ़ आया सूखा आया। फसल तबाह हो गए, बर्बाद हो गए।
हां, इसमें सच्चाई है। इससे भला कोई इंकार कैसे कर सकता है, लेकिन मौजूदा दौर में फसलों के कम उत्पादन के पीछे जमीन की उर्वरा शक्ति की कमी के अलावा एक बहुत बड़ी समस्या है । दिनदहाड़े उनके डकैती हो रही है। कैसे? सभी खाद बीज विक्रेताओं पर तो यह बात लागू नहीं होती, लेकिन हां लगभग 50 फ़ीसदी से ज्यादा खाद बीज विक्रेता किसानों को दिनदहाड़े लूट रहे हैं। उनकी मेहनत की कमाई से अपनी जेबें भर रहे हैं। दरअसल बीज विक्रेता बड़े पैमाने पर गोरख धंधा कर रहे हैं। एक्सपायर खाद, बीज व कीटनाशकों को बेचकर। अब भला आप सोचेंगे कि हां अधिकतर किसान तो अनपढ़ हैं वह इनके पैकेट पर दर्ज या चस्पा या छपे उत्पादन की तारीख व एक्सपायरी तारीख को पढ़ नहीं पाते होंगे। जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। उत्पादन की तारीख भी दुरुस्त है। और एक्सपायरी डेट भी दुरुस्त है। ऐसे में आपके जेहन में एक सवाल जन्म लेगा, तो इसमें गोरख धंधा है, क्या?
जनाब बहुत बड़ा गोरखधंधा खाद बीज कीटनाशक आदि खेती किसानी के डिब्बाबंद उत्पादों में। जब ये एक्सपायर हो जाते हैं, तब ऐसे विक्रेता इन्हें कचड़े मैं नहीं फेंकते या कंपनी को नहीं लौटाते। बल्कि कुछ स्थानीय प्रिंटरों की मदद से एक गंदा खेल खेलते हैं। सबसे पहले उस डब्बे पर दर्ज तारीखों को बड़ी सफाई से मिटाया जाता है। मानो पहले से कोई अंक दर्ज ही ना हो। बिल्कुल कोरा।उसके बाद डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर की मदद से हुबहू कंपनी की तरह फिर से उस पर नई तारीखों के साथ प्रिंट कर दिया जाता है। अब किसान के सामने जब ऐसे उत्पाद आते हैं तो वह वही देखते पढ़ते हैं जो उन्हें दिखाया पढ़ाया जाता है। किसान खुशी खुशी ऐसे उत्पाद लेकर अपने खेतों में जाते हैं बीज बोते हैं उसे अच्छी तरह फलने फूलने के लिए खाद डालते हैं और कीटों के आक्रमण से बचाने के लिए ऐसे ही कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं। अब भला ऐसे में कैसे फसल अच्छा होगा? कीटों से कैसे बचाव होगा। स्थानीय प्रिंटरों को एक रुपैया या ₹2 प्रति पैकेट पर छपाई का पैसा मिल जाता है। एक ऐसे ही प्रिंटर से जब पूछा गया कि आप ऐसा क्यों करते हैं? तो उसने बड़ी चतुराई से जवाब देते हुए कहा ऐसा मैं नहीं करूंगा तो कोई दूसरा कर लेगा, तब तो मेरी कमाई जाति रहेगी। हां, मैं जानता हूं कि ऐसा करना गलत है, लेकिन पापी पेट का सवाल है।
कुछ किसानों से जब इस मुद्दे पर बात की गई तो उनका सबसे पहले ऐसे किसी भी ठगी, डकैती, लूट हो भी सकता है की बात से ही भौचक्के रह गए। कुछ ने कहा, हम तो सालों से उस फलाने बीज विक्रेता की दुकान से ही सब कुछ खरीदते हैं। हां कई बार फसल तो काफी अच्छी होती है और कई बार खराब। हमें तो लगता है यह मौसम की मार है या मिट्टी मैं पहले सी क्षमता नहीं रही। लेकिन बाबू हम तो पैकेट पर तारीख ही देकर खरीदेंगे ना अब ऐसा झोल मोल होगा तो हम कैसे पता करेंगे। अब बात सरकार की इंसान के लिए बिकने वाली दवाइयों एवं अन्य खाद्य सामग्रियों की जांच के लिए फूड इंस्पेक्टर या ड्रग इंस्पेक्टर तैनात किए गए हैं। अधिकतर लोगों को पता है यह इंस्पेक्टर लोग कैसे काम करते हैं। अपनी जेबे भरने के अलावा शायद ही कुछ करते हैं। सभी नहीं अधिकतर के बारे में ऐसा ही मत है। क्या किसानों के लिए बेची जा रही खाद बीज कीटनाशक की जांच के लिए कोई तैनात है? क्या अगर है तो इतने बड़े पैमाने पर दिनदहाड़े ऐसी डकैती हो कैसे हो रही है? किसान रो रहे हैं। कुछ कीजिए उनके आंसू को पूछिए। ऐसे काला कारोबार करने वालों पर सख्ती कीजिए। हमारे अन्नदाता को बचाइए। जागिये सरकार जागिये।


