योगेंद्र यादव, स्वराज अभियान से जुड़े हैं
देश में सूखे की स्थिति बेहद गंभीर है. 100 साल में दूसरी बार लगातार दो बार मॉनसून सामान्य नहीं रहा. वर्षा सामान्य से 20 फीसदी कम हुई. ऐसे कठिन हालात में किसानों की मदद के लिए कोई सरकार आगे नहीं आ रही है, चाहे वह केंद्र की सरकार हो या फिर राज्य की. सूखा पर प्रधानमंत्री समीक्षा कर रहे हैं। लेकिन सही समीक्षा तो तब हो जब सरकार सही आंकड़ा पेश करे। सरकारी आंकड़े कुछ कहते हैं। सरकार का सुप्रीम कोर्ट में दलील कुछ होता है। यदि आंकड़े सामने आएं तो सरकार सूखा राहत के लिए यूनीफार्म पालिसी बनाए।
हालात इतने विकट हैं कि लोगों को पीने की पानी की समस्या का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है, बल्कि पशुओं के चारे की भी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गयी है. सूखे पर सरकार का कहना है कि देश का 39 फीसदी क्षेत्र इससे प्रभावित है और यहां सामान्य से कम वर्षा हुई है. सरकार कितनी गंभीर है इसका अंंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हरियाणा सरकार ने एक भी गांव को सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया, वही हाल बिहार का रहा. वहीं झारखंड ने लगभग पूरे राज्य को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया. वहीं गुजरात ने 6 महीने के इंकार के बाद 900 गांवों काे सूखाग्रस्त घोषित किया. देश में सूखे की स्थिति का अंदाजा सरकार को पिछले साल ही लग गया था, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं होता देख स्वराज अभियान ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की. सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार ने कहा कि 33.6 करोड़ लोग इससे प्रभावित हैं, जबकि वास्तविकता में यह आंकड़ा 43 करोड़ था. जब हमने आंकड़ों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यह संख्या लगभग 54 करोड़ है तो सरकार ने बहाने बनाकर इसे झुठलाने की कोशिश की. सरकारी आंकड़ो के अनुसार देश के 54 करोड़ लोग सूखे की चपेट में हैं. इन लोगों के पास पानी की समस्या है. अक्सर मराठवाडा की खबर दिखायी जाती है, जबकि तेलंगाना और बुंदेलखंड पर चरचा कम होती है. बुंदेलखंड में स्थिति बेहद खराब है. क्योंकि मराठवाडा के साथ नाना पाटेकर जुड़ा हुआ है और बुंदेलखंड के पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है. मौजूदा दौर में सिर्फ सूखे पर चरचा की जा रही है, जबकि अन्य पहलुओं पर गौर नहीं किया जा रहा है. सूखे के अलावा इन क्षेत्रों में खाने का संकट, पौष्टिक भोजन का संकट भी है. बुंदेलखंड की स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि यहां के लोगों को दाल खाने को नहीं मिल रहा है. चारे के अभाव में पशुओं की माैत हो रही है और लोगों के लिए दूध नसीब नहीं हो रहा है. अगर कहें तो अकाल के सबसे नजदीक बुंदेलखंड है. काफी समय से सूखा होने के कारण जानवरों के लिए चारा नहीं मिल पा रहा है. बड़ी संख्या में जानवर मर रहे हैं. किसान सिर्फ कम मॉनसून का ही दंश नहीं झेल रहे हैं, बल्कि आेलावृष्टि से भी उनकी फसलों को काफी नुकसान हुआ है.
सरकारी आंकड़ो के अधिक किसानों की फसलें बर्बाद हुई है. सरकार फसलों के मुआवजे के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति कर रही है. उत्तर प्रदेश में पिछले साल का मुआवजा किसानों को अब मिल रहा है. मुआवजा भी लागत मूल्य से काफी कम है. सूखे की इतनी भयावह स्थिति के बावजूद किसानों का कर्ज माफ नहीं किया जा रहा है. एक आेर सरकार कॉरपोरेट के कर्ज को रिस्ट्रक्चर कर रही है, लेकिन किसानों के कर्ज को लेकर अलग पैमाना अपना रही है. रिजर्व बैंक के मानक भी किसानों के कर्ज को रिस्ट्रक्चर करने की बात करते हैं. सूखे के व्यापक आयाम पर चरचा नहीं हो रही है. देश में बारिश तो कम हुई लेकिन मॉनसून के बाद होने वाली वर्षा भी नहीं हुई. इससे चार रबी और खरीफ फसल बर्बाद हो गये. इससे सूखा प्रभावित क्षेत्रों में रोजगार का संकट पैदा हो गया. क्योंकि पहले से परेशान किसान रोजगार नहीं दे सकता है. जब किसानों को रोजगार की जरूरत है तब केंद्र सरकार मनरेगा का पैसा नहीं दे रही है. मनरेगा में पिछले साल का ही 12 हजार करोड़ रुपये का बकाया है. केंद्र सरकार प्रचार कर रही है कि मनरेगा में अबतक का सबसे अधिक 38500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. लेकिन मौजूदा समय में सरकार के आंकड़े के अनुसार 315 करोड़ मैन डेज की जरूरत है. इस आंकड़े को पूरा करने के लिए ही लगभग 66 हजार करोड़ रुपये की जरूरत है. पहले से 12 हजार लंबित हैं, यानि मनरेगा के लिए कुल 78 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता है. अक्टूबर में संवेदना यात्रा के दौरान पता चला कि किसानों के सामने कितनी विकट स्थिति है. सरकार के रवैये को देखते हुए हारकर हमें सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा. इस मामले में सबसे अधिक 40 घंटे की बहस हुई, इतना समय तो संसद और विधानसभओं में भी सूखे पर नहीं दिया गया. अब कभी भी सूखे का संकट पर सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना सकता है. सूखे से किसानों के सामने कर्ज का, पलायन का संकट है. सरकार कॉरपोरेट के 3.86 करोड़ रुपये कर्ज को माफ कर सकती है, लेकिन किसानों के कर्ज माफी से उसे आर्थिक संकट का डर लग रहा है. मौजूदा समस्या को देखते हुए सरकार को मुआवजे को लेकर एक समग्र नीति बनानी चाहिए. क्षेत्र विशेष की जरूरत के हिसाब से फसल लगाने की प्रवृति को बढ़ावा देने की जरूरत है. मराठवाडा में पानी की कमी है, लेकिन वहां बड़े पैमाने पर गन्ने का उत्पादन होता है. जहां पानी की कमी है, वहां गन्ने की फसल का औचित्य नहीं है. देश में चीनी एक मात्र उत्पाद है, जिसपर सबसे कम टैक्स है. चीनी लॉबी काफी मजबूत है. बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति के इस समस्या का समाधान संभव नहीं है.
आगे की राह
स्वराज अभियान अन्य संगठनों के साथ मिलकर मराठवाड़ा से बुंदेलखंड अर्थात लातूर से महोबा तक की यात्रा करेगा। 21 मई से 30 मई तक चलने वाले इस यात्रा में सूखा प्रभावित गांवो में ग्रामीणों, किसान, मजदूरों के साथ चर्चा की जाएगी। यह कहा जा रहा है कि इस वर्ष मानसून अच्छी आएगी। सूखा समाप्त हो जाएगा। लेकिन सूखा समाप्त होने के बाद भी खाने का संकट बना रहेगा। हम इस दौरान जल के साथ हल यात्रा करेंगे। किसानों की स्थिति समझेंगे। परंपरागत जल स्रोतों के संभरन के प्रति लोगों को जागरूक करेंगे। किसानों को उन फसलों के विषय में जानकारी देंगे जो क्लाईमेट के हिसाब से ठीक है। यदि जलचक्र बदल गया है तो हमें फसल चक्र बदलने की भी जरूरत है। नकदी फसल की ओर बढ़ते किसानों को सूखे का मार ज्यादा झेलना पडता है। पलायन बढ़ा है। सरकार से मांग की जाएगी कि किसानों को न सिर्फ सूखा राहत मिले बल्कि उन्हें निशुल्क खाद्यान्न भी मिले जिसमें दाल भी शामिल हो।


