जो वंचित थे, वे डिजिटल इंडिया में भी वहीं रह गए

ओसामा मंजर संस्थापक-निदेशक, डिजिटल इंपावरमेंट फाउंडेशन

  • डिजिटल तरीकों से भी दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की विषमता कम नहीं हुई है।
  • सरकार की सभी सेवाएं और योजनाएं तो ऑनलाइन हुईं, लेकिन पिछड़े तबके अभी ठीक से ऑनलाइन से नहीं जुड़ सके हैं।

ऐसा क्यों होता है कि कुछ खास समूहों के लोग ही अक्सर सेवाओं और अधिकारों से वंचित रह जाते हैं? ऐसा क्यों होता है कि सरकार विभिन्न योजनाओं के तहत नागरिकों को जो सुविधाएं देती है, वे ऊपर बैठे कुछ सुविधा-संपन्न लोगों तक ही सिमट जाती हैं? कुछ समुदायों और समूहों तक ये चीजें ऐतिहासिक रूप से नहीं पहुंचती। आज भी इसके रास्ते में जाति, धर्म और लिंग जैसी चीजें आड़े आती हैं। इन समूहों में दलित हैं, अल्पसंख्यक हैं, आदिवासी हैं, महिलाएं हैं, वरिष्ठ नागरिक हैं और किन्नर हैं। सरकार की ओर से कोई सहारा न मिलने के कारण इन समूहों की किस्मत पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह चलती है।हाल ही में जारी हुई इंडिया एक्सक्लूजन रिपोर्ट बताती है कि 118 देशों के विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत का स्थान 97वां है। 2003 के मुकाबले भारत 13 साल में तीन स्थान नीचे आ गया है। जबकि दूसरे कई गरीब देशों ने अपनी स्थिति को सुधारा है और वे भारत से आगे भी निकल गए हैं। विडंबना है कि भारत में अन्नदाता ही बुरे हाल में हैं।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि हालांकि भारत की 55 फीसदी आबादी की आजीविका कृषि है, लेकिन सरकार सार्वजनिक धन का सिर्फ चार फीसदी ही कृषि में निवेश करती है। कृषि क्षेत्र को न सरकारी नीतियों में प्राथमिकता मिलती है और न बजट में। इसी के साथ जुड़ा हुआ एक मुद्दा यह भी है कि पिछले दो दशकों में देश के तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। और इस क्षेत्र में भी आर्थिक व सामाजिक ऊंच-नीच जैसी बुराइयां तो हैं ही, महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी बहुत कम है। लेकिन इसके साथ ही देश के अमीर और ज्यादा अमीर हो रहे हैं। इसलिए ऑक्सफॉम के उस अध्ययन में कोई हैरत की बात नहीं है, जो हमें बताता है कि देश के एक फीसदी लोगों के पास देश की 50 फीसदी से ज्यादा संपत्ति है। इंडिया एक्सक्लूजन रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में दूसरे तबकों के मुकाबले आदिवासियों में 14 प्रतिशत गरीबी ज्यादा है, जबकि दलितों में नौ प्रतिशत ज्यादा है।यहां यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर भारत अपनी गरीबी को दो डॉलर प्रतिदिन खर्च के पैमाने पर मापे, तो उसकी 80 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी की रेखा से नीचे होगी। यहां दस में से नौ परिवार दस हजार रुपये महीने भी नहीं कमा पाते। परिवार के हर पांच में से कम से कम एक सदस्य ऐसा है, जिसे प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिली। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ तीन फीसदी परिवार ऐसे हैं, जिनमें किसी के पास स्नातक की डिग्री है। सरकारों की नीतियों और बजट ने इस ऐतिहासिक विषमता को पाटने के लिए कुछ नहीं किया।संयोग से इंडिया एक्सक्लूजन रिपोर्ट में पहली बार ऐसे लोगों का भी जिक्र है, जो डिजिटल माध्यम से दी जा रही सुविधाओं से भी वंचित हैं। हालांकि इस माध्यम को सरकार ने इसलिए अपनाया था कि सभी नागरिकों तक सुविधाओं को बिना किसी भेदभाव के पहुंचाया जा सके। लेकिन इन्हें लागू करने के तरीके की खामियों ने देश की डिजिटल विषमता को कम नहीं होने दिया।

देश में जो सामाजिक-आर्थिक विषमता थी, वह ऑनलाइन विश्व में भी वैसे ही पहुंच गई। वे करोड़ों भारतीय, जो ऑनलाइन नहीं हो सके, गरीब दिहाड़ी मजदूर हैं, दलित हैं, आदिवासी हैं, अल्पसंख्यक हैं, महिलाएं हैं, वरिष्ठ नागरिक, विकलांग, किन्नर जैसे तबके हैं। डिजिटल इंडिया के तहत सरकार ने अपनी सभी सेवाओं और योजनाओं को ऑनलाइन कर दिया, लेकिन जिस गति से और जिस प्राथमिकता से इन तबकों को ऑनलाइन से जोड़ा जाना चाहिए था, वह नहीं हो सका। नेशनल ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क परियोजना कागज पर तो बहुत अच्छी लगती है, लेकिन जमीन पर यह उस तरह से नहीं दिखती। इसके तहत 2014 तक देश की 11 लाख से ज्यादा पंचायतों को फाइबर नेटवर्क से जोड़ा जाना था, लेकिन अभी तक 80 हजार को ही जोड़ा जा सका है, यानी 20 फीसदी काम भी नहीं हुआ है।इन डिजिटल औजारों के जरिये ही देश की आबादी शिक्षा, सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का फायदा उठा सकती है। यह नागरिकों और अधिकारियों के बीच संवाद शुरू करने का माध्यम भी बन सकता है। इस सबके अभाव में सरकार वंचित लोगों का समावेश नहीं कर सकती। (ये लेखक के अपने विचार हैं,हिन्दुस्तान से साभार।)

 

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