ग्रामसभा के साथ मिलकर गांव में ही ग्रामीणों के पैसे वापसी का रूपरेखा तैयार करे सरकार..सिर्फ बैंक और डांकघर काफी नहीं
संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: खूंट में पैसा..नानी के जैसा..पैसा तू कैसा..मैं तो जैसे को तैसा..न ऐसा न वैसा..बस पैसे के जैसा। लेकिन आज वो पैसा जैसे का तैसा नहीं रहा। बदल गया है। सरकार ने 500 के पुराने नोटों के जगह पर नया नोट एक हजार के नोटों को पूरी तरह से बंद करने करने का फैसला लिया है। अब नानी के खूंट वाली चवन्नी,अठन्नी तो पहले ही खत्म हो गयी है, लेकिन उस खूंट के चवन्नी—अठन्नी को 500—1000 में बदलने वाली हमारी दादी—नानियां आज सांसत में पड़ गयी हैं।
मनमतिया के माई को कहीं से मजदूरी मिलती..उसमें से कुछ पैसा जरूर बचाती। जैसे तैसे छुट्टे नोट में बदलते..नोट सैकड़ा में..सैकड़ा 500 में। और कुछेक हजार के नोट में भी। न कोई बक्सा, न कोई बैंक खाता। किसी को कभी कोई सामान खरीदते वक्त छृट्टे की जरूरत होती तो वह मनमतिया की माई से ले सकता था। खुशी—खुशी छृट्टे को नोट में बदलती। मानो उसके सारी का चेट न हो..स्वीस बैंक हो। लेकिन आज मनमतिया की माई को जब यह खबर मिली कि उसके 500 और हजार का नोट काला पैसा हो गया है..जिसका कोई मोल नहीं। सदमे में है। लोग ढ़ाढ़स दे रहे हैं कि बैंक जाकर बदलवा लो..लेकिन उसे भरोसा नहीं। कौन बैंक जायेगा। 10 तरह के सवाल। कई तरह के कागज पत्तर।
इस देश में मनमत्तिया के माई जैसे सोच रखने वालों की कमी नहीं है, और न ही गुड्डूआ के बाबा का जिनका बैंक से वास्ता कम ही होता है। चेट ही बैंक। और बक्सा ही लॉकर, और कमर में फंसा डांरा में लिपटा ही चाभी का गुच्छा यानी स्वीस बैंक जिसमें जमा धन का थाह सिर्फ उन्हें ही होता है। जनधन योजना के तहत लाखों खाते खुले…लेकिन तब भी भारतीय ग्रामीण समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसका बैंक में कोई खाता नहीं। कुछेक लोगों को जब मोदी सरकार द्वारा चलाये गये जनधन योजना के तहत गांव—मुहल्ले और बैंक वालों से प्रेरित होकर खाता खुलवाये भी तो उसकी हकिकत आप जानते हैं। ढ़िढोड़ा के बावजूद उनमें से ज्यादातर खाता में पैसा नहीं है। चाहे छोटे जोत वाले किसान की बात करें या फिर खेतिहर मजदूर की, ज्यादातर की धोती में खुंसा चेट ही बैंक है।
कमोबेश यही हाल देश के ग्रामीण अंचल में रह रहे अधिकांश गृहनियों, महिलाओं, किसानों, आदिवासियों, छोटे—छोटे व्यापारियों, रेड़ी पटड़ी पर दुकान डालने वाले अधिकांश आबादी की है। हमारे देश में एक बहुत बड़ी आबादी आज भी बैंक से दूर है। जो बैंक के पास भी है, उसका बैंक से कम ही लेना देना। ऐसा भी नहीं है कि इनके पास जो जमा रकम है वह कम है। यह हजार से लेकर लाखों रूपए तक हो सकता है। छोटी जरूरतें,बड़ी बचत। यदि अर्थशास्त्रियों के आंकड़ो पर भरोसा करें तो यही वह रकम थी जिसने हमें आर्थिक मंदी के दौर में भी महफूज रखा था। सरकार के एक फैसले से ये सभी छोटी—बड़ी जमापूंजी अपने चेट में सहेजने वाला हमारा ग्रामीण समाज सकते में है। हो सकता है कि सरकार की मंशा बड़े कालाबाजारियों पर नकेल कसने की हो, जैसा कि सरकार दावा कर रही है। लेकिन इन बड़े फैसलों की मार इन छोटी बचत वालों पर जिस तरह से पड़ने वाला है, वह अपने आप में सिहरन पैदा करता है। सरकार के तरफ से कहा जा रहा है कि आप बैंक जाकर पुराने नोट बदल सकते हैं,लेकिन बैंकिग प्रणाली की जटिलताओं को देखते हुए बैंक से दूर रहने वाला हमारा यह तबका कितना उसका लाभ ले पाएगा इसको लेकर संशय है।

फैसले से अफरातफरी
सरकार द्वारा आनन—फानन में लिए गये इस फैसले को जहां समाज के बहुत बड़े हिस्से द्वारा देश हित में बताया जा रहा है। हो सकता है इस बात में सच्चाई हो लेकिन जिस तरह की प्रतिक्रिया बाजार में छोटी—छोटी जरूरतो के लिए छृट्टे खोजते लोगों को हो रहे परेशानियों से दिखाई दे रहा है, वह आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है। किसी को दवा की दुकान से बैरंग वापस आना पड़ा तो कोई बच्चे का दूध नहीं खरीद पाया तो कहीं यात्री सिर्फ इसलिए फंसे रहे कि उनके पास जो 500—1000 रूपये के रकम थे, उसे कोई स्वीकारने को तैयार नहीं था। हो सकता है यह उहापोह थोड़े दिनों में समाप्त हो जाए और गाड़ी पटरी पर लौटे लेकिन ग्रामीण समाज का एक बड़ा हिस्सा सरकार के इस फैसले के बावजूद सहजता से अपना जमा रकम चेट से निकालकर बैंक के जरिए पुन:वापस पा सके इसके लिए सरकार को नीतिगत स्तर पर कुछ उपाय करना चाहिए। इसमें पंचायतों और उसके चयनित प्रतिनिधियों की अहम भूमिका हो सकती है। जिस तरह से सरकार ने कैंप लगाकर लोगों को जनधन योजना से जोड़ा था, उसी तरह ग्रामीण स्तर कैंप लगाकर लोंगों की मेहनत से जमा की गयी पूंजी के बिना किसी नुकसान के वापसी सुनिश्चित किये जाने पर ही सरकार के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ पायेगा।
