संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: देश में दलहन की पैदावार बढ़ाने के सरकारी प्रयासों के बीच कुछ विवाद भी जुड़े हैं। जी हां, यह विवाद है खेसारी दाल के उत्पादन और आयात को मान्यता दिए जाने को लेकर। अरहर की बढ़ती हुई कीमत और कम होते उत्पादन के बीच केंद्र सरकार द्वारा खेसारी दाल की तीन किस्में उगाने की अनुमति दिया जाना निश्चित ही सवालों के घेरे में रहा। यह वही खेसारी दाल है जो भले ही लाखों गरीबों के लिए प्रोटीन पाने का सस्ता विकल्प रहा है, लेकिन विशेषज्ञों की राय में खेसारी दाल खाने से अपंगता और नसों को नुकसान पहुंचने की आशंका के चलते इनके उत्पादन पर रोक लगाई गई थी। वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि इंसान और जानवर दोनों के लिए यह समान रूप से खतरनाक है। इसके सेवन से शरीर के निचले भाग में लकवा मार सकता है। खेसारी दाल की पिछली किस्में उगाने पर सरकार ने 1961 में रोक लगाई थी।
खेसारी की चुनिंदा किस्मों की अनुमती
लेकिन अब मोदी सरकार दलहन की कमी से निपटने के नाम पर भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईपीआर) का कहना है कि अरहर जैसे रंग व आकार वाली इन तीन किस्मों की’महातेवड़ा’, ‘रत्तन’ और ‘प्रतीक’ को मंजूरी दे दी है, जिसे कानपुर स्थित भारतीय दाल अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि खेसारी दालों क उपभोग से स्वास्थ्य पर किसी भी तरह का प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका नहीं है।
कहीं बीमारियों को दावत तो नहीं दे रहे
सरकार के इस फैसले पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि सरकार गलत ढंग से दालों की बढ़ती तेजी की समस्या को सुलझाने का प्रयास कर रही है। इसके जरिए बीमारियों को दावत तो नहीं दिया जा रहा है। दरअसल, खेसारी नाम की ये दाल हमारे स्वास्थ्य के लिये बेहद खतरनाक है, ये दाल देखने में बिल्कुल अरहर की दाल की तरह होती है। इसका फायदा व्यापारी मिलकर उठा रहे हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो अधिक मुनाफा कमाने के लिए अरहर दाल में इस दाल की मिलावट कर रहे हैं जो सेहत पर बुरा असर डाल रहा है। मिलावट की वजह से ये दाल अब प्रोटीन का नही बल्कि जहर का स्त्रोत बन रही है। जब इस दाल में खेसारी की मिलावट की जाती है तो ये बहुत ही घातक रुप ले लेती है जो कई सारी बीमारियों को दावत देती है।
दावे से इत्तफाक नहीं रखते विशेषज्ञ
आईसीएमआर के इस कदम की कई कृषि और चिकित्सा विशेषज्ञों ने आलोचना की है। इनका कहना है कि सरकार अगर प्रतिबंध हटाती है तो इसके सेवन से लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कैसे रोका जाएगा?
खेसारी को लेकर उहापोह
दाल को लेकर चल रही किल्लत के बीच भी खेसारी दाल के उत्पादन और इस्तेमाल को लेकर कोई फैसला नहीं हो सका है। यह स्थिति तब है कि जब प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसके निपटारे के लिए एक अंतर मंत्रालयीय कमेटी का गठन कर दिया था, जिसे इसके उत्पादन और इस्तेमाल पर फैसला लेना था। इसी बीच कमेटी ने नए सिरे से खेसारी के इस्तेमाल और उत्पादन को लेकर अभी मंत्रालयों से रिपोर्ट देने को कहा है। सूत्रों की मानें तो कोई भी मंत्रालय अपने मत्थे कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है और नए सिरे से लटका दिया गया है।
गौरतलब है कि भारत में हर साल करीब 220 लाख टन दालों की खपत होती है। जबकि करीब 20 फीसद दालें कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और म्यांमार जैसे देशों से आयात की जाती हैं।
