मनीष अग्रहरि
किसी भी फसल में रोगो व कीटो से नियन्त्रण के लिए बेतहासा रसायनिक दवाओं का प्रचलन बढ़ गया है, जिससे एक ओर हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है,सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है वही दूसरी तरफ कीटो और रोग कारको ने तमाम प्रचलित रसायनिक दवाओं के प्रति अपने अंदर प्रतिरोधिकता विकसित कर ली है। लिहाजा दवाएॅं बेअसर साबित हो रही है, पैसा पानी में जा रहा है, खेती घाटे का काम साबित हो रही है। ऐसे में हानिकारक कीटो और बीमारियों की रोकथाम के लिए वैज्ञानिको ने एक नई तरकीब निकाली है जिसे एकीकृत नाशी जीव प्रबन्धन कहते है। इसमें कीटो, बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए नियंत्रण हेतु एक से अधिक तरीको को अपनाया जाता है। इस तरकीब में कीटो, रोगो और खरपतवारों आदि के खात्मा के बजाय उनके प्रबन्ध की बात की जाती है। वास्तव में इस प्रक्रिया में किसी जीव को हमेशा हमेशा के लिए खत्म करना नही बल्कि एैसे उपाय करने है जो कि नुकसान के स्तर तक न पहुच सके।
गन्ने के पाईरिला कीट, तालाब के जलकुम्भी और चने के फली बेधक कीट पर एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन से शतप्रतिशत नियन्त्रण पाया गया है। चना के फसल में कीटो और रोगो से 10-30 फीसदी तक का नुकसान देखा गया है खास तौर पर चना का फली छेदक कीट तो सबसे ज्यादा नुकसान पहुचाने वाला कीट है।एैसे में अब देर किस बात की एकीकृत नाशी जीव जीव प्रबन्धन को झटपट अपनाइये और लाभ पाइये।
क्या है एकीकृत नाशी जीव प्रबन्धनः केवल एक ही तरीके (रसायनिक दवाओं) को अपनाने की बजाय उपलब्ध सभी साधनो का समन्वय किया जाना चाहिए। इसमें शस्य क्रियाएॅं, अवरोधी किस्मों का उपयोग,यान्त्रिक क्रियाए, तकनीकी, जैविक साधनो और सबसे अंत में जरूरत पड़ने पर रसायनो का प्रयोग करना चाहिए।इस विधि का प्रबन्धन निम्न तरीको से कर सकते है।
शस्य क्रियाएॅंः
ऽ स्वस्थ और प्रमाणित बीज का प्रयोग होना चाहिए
ऽ चने के प्रमुख रोगो में उकठा (फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम, जड़ सड़न (राईजोक्टोनिया सोलेनाई) रतुआ (यूरोमाईसीज सिसेरिस एरिटिनाई) है।अनेक प्रमुख फफॅूदजनित रोगो से बचाव हेतु बीजशोधन जरूर करे।इसके लिए थीरम, कैप्टान, कार्बेन्डाजिम को 2ण्5ग्राम प्रति किग्रा0 की दर से शोधित करना चाहिए।इसके अलावा 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किग्रा0 बीज की दर से तथा खेत में उपचार हेतु 2 किग्रा0 ट्राइकोडर्मा को 50से 100 किग्रा0 गोबर की खाद मे मिलाकर बोआई के 30 दिनो के अंदर 1 एकड़ खेत में छिड़काव करना चाहिए। ट्राइकोडर्मा मिट्टी और बीज पर फफूॅंदी की बढ़वार को रोकता है साथ ही साथ बीज के जमाव व अंकुरण को बढ़ाता है।
ऽ पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे के बीच में उचित दूरी रखे। असिंचित दशा में 30 सेमी तथा सिंचित दशा में 45 सेमी कूड़ से कूड़ की दूरी रखे।
ऽ पानी और खाद की मात्रा का मुनासिब प्रबन्ध हो।
ऽ यदि उत्तर भारत में चने की अगेती बोआई 15-30 अक्टूबर तक कर दिया जाए तो सूड़ियो के आक्रमण से बचाव हो जाता है।
ऽ उकठा की स्थित होने पर तीन से चार वर्ष बाद उस खेत में चना की खेती करे।
ऽ गर्मियों में खेत की गहरी जुताई जरूर होनी चाहिए इससे जमीन में छुपे हानिकारक कीटो तथा रोगो की विभिन्न अवस्थाएं उपर आकर तेज धूप से नष्ट हो जाती है और पक्षियो द्वारा अनेक जीवित और मृत कीट उनके भोजन बनकर नष्ट हो जाते है। एैसा पहले गर्मी में कर लेने पर चने की फसल को जरूर लाभ मिलता है।
ऽ रोगो से बचने के लिए रोग अवरोधी प्रजातियाॅं बोनी चाहिए।
यांत्रिक नियंत्रणः
फसलो का बराबर सर्वेक्षण करते रहे ताकि विभिन्न कीटों और रोगो आदि के बारे में जानकारी हो सके।
औसतन 5 पौधो पर एक शिशु कीट फूल तथा फली बनने की अवस्था पर दिखे तो तुरंत रोकथाम के उपाय करने चाहिए। इसके लिए प्रकाश और फेरोमैन ट्रैप का उपयोग करके नाशीजीवों को नष्ट करे।
यदि दीमक का प्रकोप हो तो खूब अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए।
जैविक नियंत्रणः
चने के फली बेधक के लिए न्यूक्ल्यिर पाली हेड्रोसिस वाइरस (एन0पी0वी0) के 100 सूड़ियो का रस 200-300 ली पानी में मिलाकर 15-20 दिन के अंतराल मेें 2-3 बार प्रति एकड़ प्रयोग करे (जब खेत में सूडियो की संख्या अधिक हो )
एन0पी0वी0 का छिड़काव करते समय यह ध्यान रखे कि इसका प्रयोग सूर्यास्त के समय ही करे तथा घोल तभी बनाएॅ जब छिड़काव करना हो। घोल को अच्छी तरह से हिलाकर स्प्रे पम्प में डाले तथा छिड़काव इस प्रकार किया जाए कि घोल सम्पूर्ण पत्तियों पर पड़ जाए।
रसायनिक नियंत्रणः रसायनिक दवाओं का प्रयोग तभी करना चाहिए जब नुकसानदायक कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर को पार कर जाए। इसके लिए निम्न में से कोई एक रसायन का प्रयोग करना चाहिए।
क्यूनालफास 25 ई0सी0 का 1.25. 2 लीटर प्रति हैक्टेयर
मोनोक्रोटोफास 36 ई0सी0 का 750 मिली प्रति हेक्टेयर
कार्बोरिल 10 प्रतिशत धूल 25 किग्रा0 प्रति हेक्टेयर
मिथाइल पैराथियान 2 फीसदी धूल 25 कि0ग्रा0 प्रति हेक्टेयर
इसी तरह नीम आधारित कीटनाशक जैसे निम्बोसिडीन, नीमार्क, नीमगार्ड वगैरह का 5 प्रतिशत घोल से छिड़काव करने पर भी अच्छा असर पाया गया है।
अच्छे और प्रभावी नियंत्रण के लिए ध्यान रहे किसी भी कीटनाशी का प्रयोग दो बार नही होना चाहिए
फफूद जनित रोगो जैसे अंगमार, रतुआ अथवा दूसरे किसी रोग की दशा उग्र होने पर या बचाव के लिए निम्न फफॅूदीनाशक में से किसी एक का छिड़काव कर सकते है।
जिंक मैग्नीज कार्बामेंट 2 किग्रा0 प्रति हेक्टेयर या कार्बेन्डाजिम 500 ग्राम प्रति हैक्टेयर या जीरम 80 प्रतिशत 2 किग्रा0 प्रति हैक्टेयर प्रयोग करना चाहिए।
