नीरज प्रताप सिंह
भागलपुर:आज पता चला कि यूएन ने वर्ष 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष घोषित किया है ,अच्छा लगा सुन कर । यह बात भी जोर—शोर से कही जा रही है कि भारत सरकार भी इस अभियान के साथ जुड़कर देश में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत दलहन के पैदावार बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। उद्देश्य भी बहुत अच्छा है कि इससे दलहन की पैदावार बढ़ेगी ,हो सकता है कि दूसरे देशों में पैदावार बढे, पर भारत में इससे पैदावार बढ़ेगा ,मुझे तो शंका है, क्योंकि कोई भी कार्यक्रम हो उससे संवंधित किसानों को उससे जोड़ा ही नहीं जाता है। अब यूएन प्रायोजित दलहन दिवस और भारत सरकार द्वारा चलाया जा रहे दलहन के पैदावार बढ़ाने का कार्यक्रम कितना जमीन पर उतर रहा है इसको लेकर थोड़ी आशंका है। बड़े—बड़े जगहों पे कार्यक्रम हो गए ,और जयसियाराम,तो फिर नतीजा भी ढ़ाक के तीन पात ।
दो तीन साल पहले मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछेक जिलाों में घूमने का मौका मिला था ,जो कि सोयाबीन के सबसे ज्यादा उत्पादक जिले थे ,लेकिन वहां के किसानों का रोना यही था कि एक तो अच्छी बीज नहीं मिलती है दूसरी सबसे बड़ी समस्या थी अच्छे कीटनाशक का आभाव । किसान परेशान थे कि कीड़े पे कोई दवाई लंबे समय तक असर ही नहीं करती ,जिससे की पैदावार बहुत ही कम होने लगा है ,सरकारी अमला तो आराम से सोया है । कुछ जगह पे अतिवृष्टि से भी फसल प्रभावित हुई थी ।
छोटे थे, तो गाँव में दालों की खेती काफी होती थी । जिनमे अरहर, मसूर, चना ,मटर ,मूँग और उरद प्रमुख खेती थी । शायद ही कोई किसान होगा जो दाल खरीद कर खाता हो। लेकिन अब मुश्किल से एक प्रतिशत किसान होंगे जो अपनी उपज का दाल खाता होगा । अब पूछियेगा कारण ,तो कारण कई हैं । आइये बारी—बारी से इनपर चर्चा करते है।
सबसे पहले दाल की खेती कम होने का कारण है, जोत का छोटा होना ,परिवार बढ़ते गए, लोगों के पास जमीन कम होती चली गयी , मूँग की खेती पहले खूब होती थी ,लेकिन मजदूरों की कमी के कारण ज्यादातर किसानों ने इसकी खेती करना छोड़ दिया, कारण ,मूँग को तोड़ना पड़ता है , कई बार उसकी तुड़ाई होती है, मजदूरों की कमी के कारण किसान समय पर इसकी तुड़ाई नहीं कर पाते थे और फसल खराब हो जाती थी ,जिसके कारण लोगों ने इसकी खेती कम कर दी।

चना भी शायद इसी कारण लोगों ने इसको उपजाना छोड़ दिया, क्योंकि चना बुआई के एक हप्ते बाद किसान को हर समय खेत की रखवाली करनी होती थी। पौधे बड़े हुए तो साग तोड़ने वालों से इसकी रक्षा कीजिये ,फिर जब दाने होने पे उसकी रखवाली, या यों कहिये जबतक फसल आपके घर तैयार हो के न आ जाय इसकी रखवाली करते रहिये, परिणाम लोगों ने दूसरी फसल की खेती करना शुरू कर दिया। खेसारी तो बीमारी के कारण लोगों ने छोड़ा ,कहते हैं कि इसके सेवन से बीमारी होती है , इसके कारण मात्र की भी खेती छूट गयी ।
कभी गंगा के किनारे दियारा क्षेत्र में उरद की फसल लहलहाती थी ,पैदावार भी खूब होती थी और इसके खेती में खर्चा कुछ भी नहीं । बाढ़ का पानी जब उतरता था ,तो उसी नमी वाले जमीन पे उरद की बीजों को छींट दिया जाता था ,और ढाई महीने बाद फसल तैयार । जिस किसान के पास दो तीन एकड़ भी उरद की खेती थी वो खुशहाल था ,पर अब असमय बाढ़ ने इसकी खेती को काफी प्रभावित किया ,बाढ़ का पानी उतरता है फिर चढ़ता है, अब खेतों से पानी निकलते निकलते इसका समय भी निकल जाता है, जिसके कारण अब इसकी खेती और उपज बहुत ही कम हो गयी है।
मसूर पे तो जोत कम होने का असर हुआ है । लेकिन सबसे ज्यादा असर अगर किसी फसल पर हुआ है तो वो है अरहर की खेती,जो कि कभी भागलपुर के आसपास गंगापार इलाके का मुख्य खेती हुआ करता था । ये पूरे एक साल की खेती थी । अप्रैल में कटाई फिर जून, जुलाई में बुआई ,यानि पूरे एक साल की खेती । वैसे अब कम समय वाला भी अरहर की खेती होने लगी है ,लेकिन पता नहीं क्यों लोग उसकी खेती कम करते है। शायद जानकारी का आभाव कह सकते है । इसकी खेती से फायदा ये होता था कि इससे खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती थी । उसका कारण फसल चक्र ,और पूरे साल अरहर की पत्तियां खेतों में गिरती थी ,फिर घनी झाड़ी होने के कारण लोगों के शौच का ये एक प्रमुख स्थान होता था। जिसके कारण खेतों में अपने आप कंपोस्ट पहुँच जाता था । हमने देखा है कि अरहर के बाद जो भी फसल आप उस खेतों में लगायें, पैदावार बढ़ जाती थी । फिर फसल तैयारी के बाद अरहर के पौधे जलावन का भी अच्छा साधन होता था । इस कारण हर किसान इसकी खेती करता था । लेकिन पंद्रह बीस साल पहले एक अजीब किस्म की बीमारी इस फसल को बिल्कुल ही तबाह कर के रख दिया । इसको बोने के कुछ महीने बाद ही इसके पौधे धीरे धीरे सूखने लगते थे ,ऐसा नहीं था कि ये एक बार में सूखते थे ,थोड़े थोड़े अंतराल पे सूखते थे ,और अंत तक तो पूरी फसल का ही बंटाधार। इसके चक्कर में दूसरी फसल भी नहीं हो पाती थी । परिणाम इसकी भी खेती लगभग बंद ही हो गयी । किसानों ने काफी उपाय किये, मिट्टी की जाँच ,दीमक की दवाई ,लेकिन परिणाम सिफर । सरकारी तंत्र आज भी सोया है ,अरहर की खेती ख़त्म होने से किसानों पे बड़ा ही उल्टा प्रभाव पड़ा ,न चाहते हुए भी किसानों को इसकी खेती छोड़नी पड़ी ।
उम्मीद की जा सकती है कि इस दलहन वर्ष में इन समस्याओं पर सरकार का ध्यान जाये और सचमुच में उनकी समस्या का हल हो।