आओ! प्राकृतिक संसाधनों को बचाएं

रणविजय निषाद
शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता


प्रयागराज: आज सम्पूर्ण विश्व जल एवं पर्यावरण संरक्षण तथा इसके गिरते स्तर और शुद्धता के प्रति चिंतित है। हमको इस भयावह और विनाशकारी दृश्य के कारण के मूल में जाना ही होगा। स्वयंसेवी संस्थाओं और विभिन्न शासकीय प्रयासों के बावजूद भी हम चारो तरफ शुद्ध जल, भोजन एवं शीतल हवा के लिए त्राहिमाम-त्राहिमाम की स्थिति से दो-चार हो रहे हैं। समय रहते यदि आमजनमानस ने अपनी भोगवादी जीवनशैली में प्राकृतिक संसाधनों का मितव्ययिता के साथ उपभोग नहीं किया तो जीवन जीना मुश्किल हो जाएगा।
आज हम सोचने पर मज़बूर हैं कि खेतों में पसीना बहाकर अन्न पैदा करने वाला किसान/अन्नदाता भूखा है, कपड़ा सिलकर तैयार करने वाले के तन पर कपड़ा नहीं है, जानवरों की सेवा करके दूध निकालने वालों के बच्चे एक-एक बूंद दूध को तरस रहे हैं, आलू, प्याज तथा टमाटर पैदा करने वालों के नैनिहाल बच्चे समोसा खाने को तरस रहे हैं; तो दूसरी तरफ सरकारी गोदामों में लाखों टन अन्न गलत नीतियों के कारण सड़ रहा है, दूध जैसे अमृत रूपी पेय रासायन को हम अंधभक्ति में नालियों के माध्यम से बर्बाद कर रहे हैं। जो चिंता का विषय है।


वर्तमान में हरे पेड़-पौधों की कटाई
भी चरम पर है, अस्तु जलवायु परिवर्तन हो रहा है परिणामत: वर्षा का जलस्तर कम हो गया, कहीं अधिक गर्मी तो कहीं अधिक सर्दी। अभी आपने देखा होगा कि ऋषिकेश में ग्लेशियर के पिघलने से जन धन की हानी/तबाही के साथ प्रकृति ने प्रलय का संकेत देना प्रारम्भ कर दिया है। कभी-कभी हम सोचते हैं कि वर्षा से पेड़-पौधे हैं बल्कि पेड़-पौधों से वर्षा है ये सत्य है। हमको शुद्ध और शीतल वायु भी तो वृक्षों से ही मिलती है। आप कल्पना करें यदि प्राणवायु ऑक्सीजन जो हमको मुफ्त में पौधों से मिलती है खत्म हो जाए तो आप कैसा महसूस करेंगे?
आओ! समझते हैं —
📌 ऑक्सीजन के अभाव में सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणें हमारी त्वचा को जला देंगी। चूँकि इन किरणों को ओज़ोन परत रोकती है जो ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनी होती है।

📌 हमारे शरीर की सभी धमनियाँ, ध्वस्त हो जाएंगी; चूँकि हमारे शरीर में ७०% जल होता है जो ऑक्सीजन के अभाव में हाइड्रोजन गैस में परिवर्तित हो जाएगा। चूँकि जल हाइड्रोजन के दो तथा ऑक्सीजन के एक परमाणुसे मिलकर बनता है।

📌 धरती विनाशकारी प्रलय के रूप में फट जाएगी, चूँकि ४६फीसदी ऑक्सीजन से धरती में मिट्टी के कण आपस में बंधे होते हैं। ऑक्सीजन के अभाव में धरती धँस जाएगी।

📌 ऑक्सीजन के अभाव में सभी मशीनें स्वतः बंद हो जाएंगी, चूँकि इनके लिए कम्पनसेशन का होना जरूरी है, जो नहीं हो पाएगा। गाडियाँ स्टार्ट नहीं हो पाएंगी।
अतः ऑक्सीजन और जलसंरक्षण के निमित्त पेड़-पौधों को बचाना हमारा दायित्व है।

भोगवादी प्रवृत्ति :-

 साबुन, शैंपू तथा टूथपेस्ट का अत्यधिक प्रयोग न करें:-

हम अक्सर देखते हैं कि बाथरूम में हम अपने शरीर में या बालों में इतना अधिक शैंपू या पेस्ट लगा लेते हैं कि उसकी सफाई के लिए जहाँ अधिक जल का दुरुपयोग होता है वहीं धन के साथ-साथ हमारे संसाधन की भी बर्बादी होती है। ये संसाधन प्राकृतिक वस्तुओं से ही तो प्राप्त किए जाते हैं। अतः उनके समुचित प्रयोग, उपयोग और उपभोग पर ध्यान दिया जाना समीचीन होगा।
अन्न का दुरुपयोग न करें:-
वर्तमान में हम देख रहे हैं कि शादी-विवाह से लेकर घर पर भी लोग अपनी थाली में इतना अधिक भोजन ले लेते हैं, जिसे खा पाना मुश्किल हो जाता है अंततः उसे कूड़ेदान में डाल दिया जाता है। कूड़ेदान में डाला गया भोज्य पदार्थ सिर्फ अन्न ही नहीं होता है वह तो पानी भी होता है। क्योंकि एक किलो ग्राम गेंहू पैदा करने में लगभग १३००लीटर जल लगता है। अब आप कल्पना करें यदि १०लोगों ने मिलकर एक किलोग्राम के समतुल्य गेंहू की रोटी को कूड़ेदान में फेंक दिया तो अप्रत्यक्ष रूप में हमने लगभग १३०० लीटर जल भी हम बर्बाद कर दिया। अतः थाली में उतना ही भोजन लें जितना हम आसानी से खा सकें।
कभी-कभी हम सोचते हैं कि इन संसाधनों को तो हम पैसों से खरीद कर दुरुपयोग कर सकते हैं, पर इतना ध्यान रहे कि ये संसाधन सभी के हैं। हमारे प्राकृतिक संसाधनों में जल, वायु, मृदा तथा वनस्पतियों को सुरक्षित एवं संरक्षित रखना श्रेयस्कर होगा
ये प्राकृतिक संसाधन हमारे पास नहीं हैं, तो पैसा काम नहीं आएगा। अतः आओ! इन्हें बचाएं।

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