Climate Change Impact on Agriculture: खेती-किसानी के लिए बड़ी चुनौती, कृषि क्षेत्र की विकास दर में चिंताजनक गिरावट

0
234

 

टिकाऊ कृषि के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, क्योंकि इस साल अनियमित मानसून (Monsoon) ने भारत के कृषि उत्पादन को प्रभावित किया, इससे खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) में बढ़ोतरी हुई। सरकार को निर्यात पर रोक लगाने जैसे उपाय करने के लिए मजबूर होना पड़ा। खराब मौसम के कारण खरीफ उत्पादन में गिरावट के कारण जुलाई-सितंबर तिमाही में देश के कृषि क्षेत्र (Agri Sector) की विकास दर घटकर मात्र 1।2% रह गई। इसका प्रतिकूल प्रभाव चालू रबी सीजन (Rabi Season) पर पड़ा है और सामान्य से कम मानसून के कारण कुल बोए गए क्षेत्र में 3% से अधिक की गिरावट आई है। मिट्टी में नमी की कमी हो गई है और जलाशयों में पानी का भंडारण कम हो गया है।

गेहूं और दालों के रकबे में क्रमश: 3 और 8% की गिरावट आई है, इससे आगे चलकर खाद्य उत्पादन में गिरावट को लेकर चिंता बढ़ गई है। जलवायु परिवर्तन की इस जटिल घटना से निपटने के लिए गतिशील प्रतिक्रिया रणनीतियों को विकसित करने के लिए नीति निर्माताओं और वैज्ञानिक समुदाय के भीतर अब एक बड़ी चिंता है, खासकर कुछ राज्यों में विशाल क्षेत्र अभी भी वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर हैं।

रबी फसलों का रकबा 647 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने के आसार

हालांकि, रबी (Rabi) के रकबे में मौजूदा गिरावट के बावजूद, कृषि मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि अगले कुछ हफ्तों में अंतर को संभावित रूप से कम किया जा सकता है। उनका अनुमान है कि रबी फसलों (Rabi Crops) के लिए कुल बोया गया क्षेत्र, पिछले पांच वर्षों के औसत स्तर (648 लाख हेक्टेयर) तक पहुंच सकता है।

तिलहनों का रकबा बढ़कर 1 लाख हेक्टेयर तक पहुचा

 

अधिकारी दलहन के रकबे में कमी का कारण धान जैसी खरीफ फसलों की देर से कटाई और फसल विविधीकरण की प्रवृत्ति को मानते हैं। इसमें कुछ राहत की बात है कि सरसों (Mustard) और रेपसीड सहित तिलहनों का रकबा इस साल 2022 की तुलना में 1 लाख हेक्टेयर अधिक है, इससे देश के खाद्य तेलों के आयात बिल को कम करने में मदद मिलेगी।

वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि तिलहन पर जोर आत्मनिर्भरता बढ़ाने के रणनीतिक उपायों को दर्शाता है। जबकि मौसम संबंधी बाधाओं के कारण चुनौतियां बनी रहती हैं। कृषि मंत्रालय का संभावित पलटाव का पॉजिटिव आउटलुक कृषि क्षेत्र की लचीलापन पर आधारित है। आगामी सीजन में मजबूत खाद्यान्न उत्पादन हासिल करने के लिए फसल विविधीकरण को संतुलित करना और नमी की कमी को दूर करना महत्वपूर्ण होगा।

इस वर्ष की शुरुआत में लोकसभा में कृषि और किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया, 2014 के बाद से फसलों के लिए बीजों की 1,888 जलवायु अनुकूल किस्में विकसित की गई हैं। इसके अलावा, सूखे, बाढ़, ठंढ और गर्मी की लहर जैसी चरम मौसम की स्थिति वाले जिलों और क्षेत्रों में कृषक समुदायों के बीच व्यापक रूप से अपनाने के लिए 68 स्थान विशिष्ट जलवायु लचीली प्रौद्योगिकियों का विकास और प्रदर्शन किया गया है।

देश के कृषि निर्यात में 4-5 अरब डॉलर गिरावट का अनुमान

देश दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है और एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है। इसलिए, निर्यात पर प्रतिबंध से इन देशों में भोजन की उपलब्धता पर भी असर पड़ा है।

हालांकि, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी आशावादी हैं। वाणिज्य मंत्रालय (Commerce Ministry) में अतिरिक्त सचिव राजेश अग्रवाल का मानना है कि अन्य कृषि वस्तुओं के निर्यात में बढ़ोतरी से इस साल निर्यात घाटा पूरा हो जाएगा।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के आंकड़ों से पता चला है कि इस साल अप्रैल और नवंबर के बीच मांस और डेयरी, अनाज की तैयारी और फलों और सब्जियों के निर्यात में बढ़ोतरी हुई है। दूसरी ओर, रेटिंग एजेंसी आईसीआरए (ICAR) की एक रिपोर्ट के अनुसार, खरीफ उत्पादन के पहले अग्रिम अनुमान से पता चलता है कि खाद्यान्न उत्पादन घटकर चार साल के निचले स्तर 148।6 मिलियन टन पर आ गया है, जो पिछले साल के अंतिम अनुमान से 4।6% कम है।

यह भी पढ़ें👉एमपी में अब खेती भी होगी हाईटेक

कमजोर ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने भी रेटिंग फर्म को वर्ष के लिए ट्रैक्टर की बिक्री में 0-2% की बढ़ोतरी के अनुमान में नकारात्मक जोखिम जोड़ने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि पहली छमाही में 3।7% और अक्टूबर और नवंबर के दौरान 0।5% की गिरावट आई है।

बेमौसम बारिश नुकसान का एक बड़ा कारण

जलवायु परिवर्तन के कारण बेमौसम बारिश भी हुई है इससे फसलों को नुकसान हुआ है। इस वर्ष राज्यों में लगभग 8।68 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र बाढ़ या भारी वर्षा से प्रभावित होने की सूचना है। जून में मानसून (Monsoon) देरी से शुरू हुआ था, इसके बाद जुलाई में अधिक बारिश हुई, उसके बाद अगस्त में कमी हुई और फिर सितंबर में पंजाब और हरियाणा जैसे देश के कुछ हिस्सों में फिर से अधिक बारिश हुई, इससे खड़ी फसल पर असर पड़ा। इसके परिणामस्वरूप सब्जियों, विशेषकर टमाटर (Tomato) और प्याज (Onion) की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई, इससे महंगाई में बढ़ोतरी हुई।

यह भी पढ़े👉प्रयागराज सुरखा: अमरुद की एक बेहतर किस्म

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here