पंचायत खबर टोली
मउ: पर्व त्योंहारों में तो वैसे ही मुर्गी पालकों बाजार की मार का सामना करना पड़ता है। उसपर से ये बदलते मौसम। कृषि वैज्ञानिकों की राय है कि गुनगुनाती ठंड और धूप बीच बदल रहे मौसम में मुर्गीपालन करने वालों को बहुत की सचेत की जरूरत है। ऐसे मौसम में एच1एन1 जीवाणु के प्रसार की संभावना मुर्गियों में बढ़ जाती है। इस दौरान किसी भी तरह की लापरवाही बरतने से पूरा फार्म इसकी चपेट में आ सकता है। ऐसे में विशेषज्ञों की माने तो रोग प्रसार से पूर्व इसका टीकाकरण कराया जाना अति अावश्यक है। सामान्य जन को खाने से पूर्व मांस को पूरी तरह पकाने के प्रति भी उन्होंने सचेत किया है। बदलते मौसम के बीच मुर्गीपालकों को इस रोग के प्रति सचेष्ट रहना होगा।
वरिष्ठ केवीके वैज्ञानिक डा.वीके सिंह बताते हैं कि देश में इस बीमारी की मौजूदगी वर्ष 2006 से पाई गई। यह एवियन फ्लू पक्षियों की बीमारी है। यह अधिकांश पक्षी प्रजाति में ही पाई जाती है। मुर्गी से इंसान में इसके प्रवेश की संभावना अधिक हो जाती है। बर्ड फ्लू का वायरस नाजुक आरएनए यानि राइबो न्यूक्लिक एसिड श्रेणी का है। यह डिटेरजेंट, साबुन के पानी के संपर्क से बेअसर हो जाता है। यह 60 से 70 डिग्री सेल्सियस तापमान में नष्ट होता है।
मुर्गियों का करायें टीकाकरण
ऐसे में ठंड में मौसम में अन्य देशों से आने वाले पक्षियों सहित पूर्व के वायरस सक्रिय हो जाता है। पालतू मुर्गियों में इस वायरस से बचाव करना बहुत ही आवश्यक है। इससे बचाव का टीकाकरण उपलब्ध है। टीकाकरण के बाद भी इसकी संभावना बनी रहती है। मुर्गी के मल से अन्य में इसके संक्रमण का प्रसार अन्य में हो जाता है। इसके साथ ही इस मांस का प्रयोग करने वालों को भी बहुत सचेत रहना होगा। मांस को पूरी तरह पकाने के बाद ही इसका प्रयोग किया जाना अति अावश्यक है। गर्म-ठंड भरे इस मौसम में मुर्गियों में इसके वायरस सक्रिय हो जाते हैं।
ठंड से पशु का रखें ख्याल
मौसमी बदलाव प्रकृतिगत सच्चाई है। लेकिन बदलते मौसम में मौसम के मुताबिक तैयारियों की जरूरत होती है। पशुओं को बदलते मौसम में सुरक्षित रखने की सलाह देते हुए केवीके के वैज्ञानिक डा.सिंह का कहना है कि बदलते मौसम में ठंड को नजर अंदाज करना पशु के लिए घातक हो सकता है। शाम होते ही ओस का प्रभाव बढ़ते जा रहा है। यह सुबह तक बना हुआ है। एेसे में दुधारु पशुअों को तेल व गुड़ देने से भी उनके शरीर का तापक्रम सामान्य बनाए रखने में सहायता मिलती है। कमजोर व रोगी पशुओं को बोरी का झूल बना कर ढक देना चाहिए। रात में उन्हें खुले आसमान में कदापि न बांधे।

