बिहार का अनोखा गुरूकुल, जिसकी फीस 1 किलों चावल

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मीनाक्षी पाल

बिहार के गया केबाराचट्टी प्रखंड मुख्यालय से लगभग 6 किलोमीटर स्थित काहूदाग पंचायत के कोहवरी गांव में सहोदय आश्रम चल रहा है। अभी इस आश्रम में 32 बच्चों को आवासीय शिक्षा दी जाती है। इस आश्रम को एक दंपति चला रहे है। वो भी महज एक किलो चावल की फीस पर। गया जिले के बाराचट्टी प्रखंड के बीहड़ जंगलों में पटना के रहने वाले दंपति अनिल और उनकी पत्नी रेखा गांव के बच्चों को गुरूकुल की तर्ज पर सहोदय आश्रम में निशुल्क शिक्षा दे रहे है।
गया जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर दोनों दंपति गरीब बच्चों को आवासीय शिक्षा देते है। वे बच्चों से फीस में शुल्क के तौर पर महज 1 किलो चावल लेते हैं। सभी बच्चों को यहां शिक्षा के साथ ही खाना बनाने से लेकर खेती करने तक की शिक्षा दी जाती है। अनिल कुमार मुख्य रूप से पटना के बिहटा प्रखण्ड के पहाड़पुर गांव के रहने वाले हैं। अनिल और रेखा शादी के बाद दिल्ली गए और उच्च शिक्षा हासिल की। वहीं से एमफिल किया। उनकी पत्नी रेखा ने भी पटना से पीजी तक की पढ़ाई की है यहीं से की। दिल्ली की भागदौड़ वाली जिंदगी उनको पसंद नहीं आई। इसके बाद दोनों दंपति गया आकर यहां के बीहड़ जंगलों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। इस गुरुकुल में बच्चों को न सिर्फ अक्षर का ज्ञान दिया जाता है, बल्कि उन्हें प्रकृति, पशु-पक्षी, कृषि और जीव-जंतु समेत अन्य जानकारियों से अवगत कराया जाता है। यहां के बच्चे कम उम्र में ही अक्षर ज्ञान के साथ-साथ खेती और अन्य चीजों के बारे में जानकारी हासिल कर रहें हैं।

कोहवरी जंगल में पहुंचना आसान नहीं

2016 में दिल्ली से आकर इन दोनों ने जंगल में बसे विभिन्न टोले के गांवों का चयन किया। जहां बच्चों का शिक्षा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था, लेकिन आज दोनों की मेहनत रंग ला रही है। सुदूरवर्ती जंगल क्षेत्र के बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। आश्रम में क्लास के माध्यम से नहीं, उनके अंदर खुद की क्षमता के अनुसार शिक्षित करने का अनोखा प्रयास होता है। कोहवरी जंगल में पहुंचना इतना आसान नहीं है, आज भी यहां रास्ता नहीं है। पगडंडी और पतला कच्चा रास्ता ही सहारा है।

गांव में रहकर शिक्षा देने की चाहत

जंगल की गोद में बसे इस गांव में पिछड़ा समाज और गरीब आबादी रहती है। जहां बच्चे पहले निरक्षर रह जाया करते थे। लेकिन जब यहां सहोदय आश्रम की शुरूआती हुई तब से गांव के बच्चे साक्षर हो रहे है।
फिलहाल यहां 32 बच्चे पढाई कर रहे हैं, जिसमें जिले के अलग अलग क्षेत्र से बच्चे आते हैं। रेखा और अनिल बताते हैं कि नौकरी करके और शहर में रहकर हम खुश नहीं थे। हम दोनों की चाहत थे हम गांव में रहें, यहीं खेती करें या बच्चों को शिक्षित करे।

2016 से बच्चों को दे रहे है शिक्षा

हमें लग रहा था कि हम जो पढ़ाई कर रहे हैं वह खुद के लिए कर रहे हैं। इससे हमारे समाज को कोई फायदा नहीं हो रहा है। हमारा समाज हमसे पीछे छुटते जा रहे थे। शहरों में हमें शुद्ध हवा नहीं मिल रही थी। घुटन सी महसूस हो रही थी। तब हम दोनों ने एक कार्य योजना तैयार कर 2016 से गया के इस जंगल में गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं। हम बच्चों को किताबी ज्ञान के अलावा सामाजिक ज्ञान देते हैं। जिसमें बच्चो को मिलजुल कर रहना, खेती करना, पर्यावरण संरक्षण, खाना बनाना, कलाकृति बनाने के बारे में बताया जाता है।

ऐसे होता हैं संचालन

इन्होंने बताया कि हम बच्चों से इसके लिए कोई शुल्क नहीं लेते हैं। इस आश्रम को चलाने में हमारे दिल्ली के दोस्त लोग मदद करते हैं और जब हम लोग पढ़ाई कर रहे थे तो उस समय कई प्रोजेक्ट और रिसर्च वर्क किए थे जिसमें हमें कुछ पैसे मिले थे। हमारे शिक्षक, फैकल्टी भी मदद करते है। बैंगलोर की कंपनी विप्रो से 3 साल के लिए फैलोशिप मिला था और उसी पैसे से हमलोग ने इसकी शुरुआत की। हम लोगों की सोच थी कि हम बहुत ज्यादा पैसो पर आधारित जिंदगी नही जीएंगे इसलिए सिंपल लाइफ जीने की कोशिश की है।

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