बाढ़ की रंगत बदली

अमरनाथ झा
  पटना:बिहार की बाढ़ इसबार कुछ अलग तरह की है। इसकी भयावहता कतई कम नहीं है, पर कोरोना की मार से टूटे लोगों में सालाना विपदा को लेकर उदासीनता का भाव है। नदियों में प्रवाह खतरे के लाल निशान से उपर-नीचे हो रही हैं। वर्षा का पानी उत्तर बिहार के तकरीबन सभी शहरों में भरा है और विभिन्न नदियों के तटबंधों के जगह-जगह टूटने से गांवों, खेतों, सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर पानी चढ़ गया है। कोरोना-जनित भूख से लड़ रहे लाखों लोगों के सर से छप्पर और अगले साल पेट भरने की उम्मीद टूट चुकी है। पर सरकारी राहत और बचाव कार्यों के लेकर कोई विशेष उत्सुकता भी नहीं है। हालांकि राज्य सरकार ने बाढ़-पीडितों को प्रति परिवार छह हजार रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की है जो ऊंट के मुंह में जीरा की तरह है।


तटबंधों के टूटने के रंग-ढंग में बदलाव देखा गया है। इसबार तटबंधों का टूटना गंडक तटबंध से शुरु हुआ जो शायद ही कभी टूटता है। और टूटा भी तो पानी तेजी से निकल जाता है, पर इसबार ऐसा नहीं हो रहा। तटबंध टूटने से नदी से निकला पानी जमा हुआ है। दूसरे इलाकों में भी जल निकासी की समस्या इसबार अधिक विकराल है।
गंडक नदी पर दाहिनी ओर बना सारण-तटबंध चार जगह टूटा। फिर बूढ़ी गंडक और उसकी सहायक छोटी नदियों के तटबंध टूटे। जिससे चंपारण और फिर मुजफ्परपुर जिले में बाढ़ आई। कई जगह जमींदारी और महाराजी बांध टूटे। दरभंगा के केवटी में तो महाराजी बांध चौथी बार टूटा। चकिया में रिंग बांध टूट गया। कई जगहों पर ग्रामीणों ने बांध काटे। मुजफ्फरगुर जिले में जहां तिरहुत नहर बुढ़ी गंडक में मिलती है वहां प्रशासन ने नहर का बांध कटवा दिया ताकि मुजफ्फरपुर शहर में पानी फैलने से रोका जा सके। इसे लेकर वहां बवाल भी हुआ और पुलिस को लाठियां चलानी पड़ी।
तटबंधों के कैद नदियों में इसबार एक नया लक्षण दिखा है। नदियां खतरे के निशान से तीन मीटर, चार मीटर तक उपर तक प्रवाहित होने लगी है। पहले इसे सेंटीमीटर में नापा जाता था। इसका स्पष्ट कारण है कि नदियों के पेट में बड़ी मात्रा में सिल्ट जमा है। नदियों की गहराई घट गई है। यह सिल्ट तटबंध नहीं होने पर जहां तक बाढ़ का पानी पहुंचता था, वहां तक की खेत में पसरता था और खेतों को उर्वरता मिलती थी। पर अब सिल्ट भी उपजाउ मिट्टी से विहिन हो गया है। इसबार बाढ़ के पानी के साथ सिल्ट से अधिक बालू आया है। जिससे बाढ़ उतरने के बाद खेती करना कठिन होगा। बागमती नदी में यह साफ दिख रहा है।

बागमती नदी के सिल्ट की उर्वरता प्रसिध्द रही है। कहते हैं कि उसका संसर्ग होने पर सूखा बांस भी अंकुरित हो सकता था। पर इस बार जहां-जहां बागमती की बाढ़ का पानी पहुंचा है, वहां-वहां खेतों में बालू की मोटी परत जम गई है। सीतामढ़ी जिला से लेकर खगडिया तक लगभग 400 किलोमीटर लंबी धारा बहने वाली बागमती के दोनों ओर खेतों में बालू की परत दिखने लगी है। यह हालत लगभग सभी नदियों की है, बागमती में स्थिति अधिक चिंताजनक है। जल संरक्षण के जानकार पूर्व आईएएस गजानंद मिश्र कहते हैं कि बिहार में बागमती करीब पांच सौ मीटर उंचाई से प्रवेश करती है, इसलिए प्रवाह काफी तेज रहता है। तेज प्रवाह के कारण किनारे की मिट्टी की उपरी परत कट गई है और अब बालू की परत आ गई है। इसलिए बाढ के पानी में बालू अधिक आने लगा है।
अभी तक मिले आंकड़ो के अनुसार, इसबार राज्य के 19 जिलों में लगभग नौ लाख हेक्टेयर में लगी फसल को नुकसान हुआ है। इन जिलों के 251 प्रखंडों में नुकसान हुआ है। किसानों के हुए नुकसान का आंकलन अभी प्रारंभिक दौर मे है। कृषि विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि संभव है कि बाढ़ का पानी पूरी तरह उतरने पर पता चले कि बहुत बडे इलाके में बालू जमा है। तब आगे खेती करना कठिन होगा और नुकसान का आंकड़ा बहुत अधिक होगा। अभी 33 प्रतिशत से कम नुकसान वाले किसानों को मुआवजा देने का प्रावधान नहीं है। उससे अधिक नुकसान का मुआवजा दिया जाएगा।
 

 

 

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