
बिहार: दरभंगा नगर निगम की मेयर अंजुम आरा के एक बयान ने मंगलवार को सुर्खियां बटोर लीं। जब उन्होंने शांति समिति की बैठक के बाद होली के दिन दोपहर 12:30 से 2:00 बजे तक उत्सव पर रोक लगाने का सुझाव दिया। उनका तर्क था कि इस समय शुक्रवार की नमाज होती है। और दो घंटे का यह विराम शहर में शांति बनाए रखेगा। मेयर ने कहा, “होली का त्योहार मस्ती और रंगों का है। लेकिन मस्जिदों में नमाज के दौरान कोई व्यवधान न हो। इसके लिए यह छोटा कदम जरूरी है।” उन्होंने यह भी अपील की कि इस दौरान लोग पूजा स्थलों से दूरी बनाए रखें। ताकि किसी तरह की अशांति न हो। उनका इरादा दरभंगा की सांप्रदायिक सौहार्द को कायम रखना था। लेकिन उनके शब्दों ने उल्टा असर दिखाया।
बुधवार तक मेयर के बयान पर विवाद इतना बढ़ गया कि उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े। सूत्रों के मुताबिक लोगों ने उन्हें “बांग्लादेशी” और “देशद्रोही” जैसे तीखे शब्दों से निशाना बनाया। आलोचना के इस तूफान के बीच अंजुम आरा ने माफी मांगते हुए कहा, “मुझे अपने पिछले बयान पर खेद है। सुबह से मुझे तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं मिली हैं। कुछ ने मुझे गद्दार कहा, कुछ ने विदेशी। उन्होंने कहा कि, मैं मीडिया से अनुरोध करती हूं कि मेरे बारे में गहराई से जांच करे। अगर कोई ठोस सबूत मिले, तो मेरे खिलाफ सख्त कार्रवाई का स्वागत है।” उनकी आवाज में अफसोस साफ झलक रहा था। “मेरा इरादा सिर्फ दरभंगा में शांति बनाए रखना था। ” उन्होंने सफाई दी। “लेकिन अगर किसी की भावनाएं आहत हुईं, तो मैं इसके लिए माफी मांगती हूं।”
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इस बीच, बिहार के मंत्री अशोक चौधरी ने मेयर के बयान की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा, “ऐसे बयान सामाजिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। बिहार प्यार और भाईचारे से चलता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नारा है ‘पूरा बिहार मेरा परिवार’, जिसमें हर जाति और धर्म के लोग शामिल हैं। कुछ लोग सिर्फ सुर्खियों में रहने के लिए ऐसी बातें कहते हैं। मेरे ख्याल से ऐसे लोगों को पार्टी से निकाल देना चाहिए।” चौधरी का गुस्सा इस बात का संकेत था कि बिहार की सियासत में एकता का कितना महत्व है।
मेयर अंजुम आरा का यह बयान, जो शांति की मंशा से शुरू हुआ, जल्द ही विवाद, माफी और राजनीतिक तकरार का सबब बन गया। दरभंगा में उनके इस यू-टर्न ने सवाल खड़े किए—क्या शांति का उनका सपना बेहतर शब्दों में पेश किया जा सकता था? क्या लोगों का गुस्सा जायज था या यह अतिरंजना थी? बिहार की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता के इस नाजुक दौर में यह घटना एक सबक बनकर उभरी कि शब्द कितने शक्तिशाली हो सकते हैं—वे जोड़ भी सकते हैं और तोड़ भी।

