केंद्र सरकार ने भले ही कृषि मंत्रालय के नाम में किसान कल्याण मंत्रालय जोड़ दिया हो लेकिन इससे किसानों के सेहत पर या किसानी के बेहतरी पर कोई असर होता नहीं दिखता। यही कारन है मध्य प्रदेश में बडे स्तर पर किसान आन्दोलन की तैयारी हो रही है। मध्यप्रदेश के विभिन्न जन-संगठनों के लोग, किसान-मजदूरों, मछुआरों के प्रतिनिधि, और राष्ट्रीय स्तर के आंदोलनकारी एकजुट होकर प्रदेश के कई जिलों में यात्रा निकालने की तैयारी में हैं यह यात्रा छिंदवाड़ा से निकलकर मुलताई, बैतूल, इटारसी, कटनी, जबलपुर, रीवा, सीधी, सिंगरोली, छतरपुर, ग्वालियर, मुरेना, रतलाम, बड़वानी, इन्दौर जाएगी। 11 से 19 जनवरी छिंदवाडा से इन्दौर तक चलने वाली इस किसान यात्रा का अंतिम पडाव इन्दौर होगा।

इस यात्रा के आयोजकों ने सरकार द्वारा किसानो के हितो को दरकिनार करने का आरोप लगते हुए सरकार के किसान विरोधी नीतियों पर सवाल खडे किये हैं। इनका कहना है की हमारे देश की 70 प्रतिशत जनता खेती पर निर्भर होते हुए भी न किसान की जान सुरक्षित है, न पूरी जनता ने भोजन सुरक्षा पाई है। यह स्थिति पैदा हुई है, केवल गलत नीतियों के कारण जो कि खेतिहरों के,किसानी के विरोधी रही है और आज की सरकार से किसानों के शोषण एवं लूट को बढ़ावा देती जा रही है।
पिछले कुछ सालों से देश के विभिन्न राज्यों के किसानों ने, वैसे ही मध्यप्रदेश के, जो प्राकृतिक आपदा भुगती है, उससे है समूचा ग्रामीण क्षेत्र एवं छोटे-छोटे कस्बों के छोटे व्यापारी, व्यवसायिक परेशान हैं, लेकिन प्रदेश की सरकार की नुकसान की भरपाई करने की इच्छा नहीं है। झूठे आश्वासनों और बयानों से किसानों की कर्जदारी दूर नहीं हो सकती, न ही उसके बाल बच्चों का पेट भरना या शिक्षा पाना संभव हो सकता है। उसपर बीमा योजना की मार और भू-अधिग्रहण के खतरे ने किसानो की चिंता बढ़ी है। विकास के नाम पर किसान की तथा देश प्रदेश की संपदा, भूमि, जल-नदी,खनिज…. लूटने की साजिश में शासन के साथ-साथ पूंजीपती भी शामिल हैं। देश के साथ ही विदेशों से आ रहे उद्योगपतियों को बुलावा देकर सरकार यहाँ की भूमि, पानी, श्रमशक्ति को दान करते जा रहे हैं। एक ओर गाँवों की हत्या, किसानों की आत्महत्या तो दूसरी ओर पलायन से शहरों में रोजी-रोटी ढूँढते, बसते जा रहे गरीबों की अमानवीय अवस्था, असुरक्षित, असंगठित रखे गये श्रमिकों की दुर्दशा असहनीय है।
उनका सवाल है की कंपनियेां को 5 सालों में 35 लाख करोड़ रू की छूट देने वाले सरकार क्या किसानों को सब्सिडी तथा खेती उपज का सही दाम, सही समर्थन मूल्य नहीं दे सकती हैं? इनका कहना है की सरकार को ऐशी नीतियाँ अपनानी चाइये जिसमे श्रम का सही मूल्य और रोज़गार निर्माण करने वाला, प्राकृतिक संपदा और मनुष्य शक्ति पर आधारित औद्योगिकरण हो? बड़े शोषणकारी विनाशकारी उद्योग, योजनाओं के बदले, रोजी-रोटी-कपड़ा-मकान-शिक्षा-स्वास्थ्य हर नागरिक को देनेवाला विकास संभव हो सके। सरकार द्वारा विश्व व्यापार संगठन के मंच पर किया गया समझौता किसानों के लिए खतरा है। न केवल ग्रामोद्योग बल्कि अपनी मेहनत की कमाई करते, उसके लिये छोटी सी जगह मांगते फेरीवाले भी उजाडे जा रहे हैं। हर क्षेत्र में विदेशी पूंजी एफ.डी.आई. को लाने के बजाय हमें इस विस्थापन से हो रहे विकास का विकल्प खोजना है जो कि समता-न्याय-समाजवादी नीति और नियेाजन हो सकता है। आन्दोलन कारी 24 फरवरी को दिल्ली में अपनी मांग को लेकर एकत्रित होंगे।
