2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य को उत्तराखंड में धरातल पर आकार देने के लिए राज्य सरकार ने कवायद शुरू कर दी है। इस कड़ी में कृषि व उससे जुड़े रेखीय विभागों को विशिष्ट कृषि उत्पादन के लिए पंचायत के साथ ही क्लस्टर दृष्टिकोण को मौजूदा प्रणाली के अनुसार अपनाने को कहा गया है। यही नहीं, उन्नत बीज, मृदा एवं जल संरक्षण, विपणन, उपज का उचित मूल्य, नवीनतम तकनीकी, खेती के लिए एक लाख तक दो फीसद ब्याज पर ऋण समेत अन्य कदम उठाने की योजना है।
यह सब ठीक है, लेकिन पिछले अनुभवों को देखते हुए इस राह में चुनौतियों का भी अंबार है। असल में, विषम भूगोल वाले उत्तराखंड की परिस्थितियां बेहद जटिल हैं। मैदानी क्षेत्रों में खेती पर शहरीकरण की मार पड़ी है तो पर्वतीय इलाकों में सुविधाओं व रोजगार के अभाव में निरंतर पलायन के कारण गांव खाली हो रहे हैं। ऐसे में पहाड़ में खेती सबसे अधिक प्रभावित हुई है। अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि गुजरे 17 सालों में खेती का रकबा एक लाख हेक्टेयर घटकर सात लाख हेक्टेयर पर आ गया है। खेती की सबसे खराब हालत पहाड़ में ही है। पलायन के साथ ही मौसम की बेरुखी, वन्यजीवों का खौफ, बिखरी जोत जैसे कारणों से लोगों का खेती से मोह भंग हो रहा है। बता दें कि राज्य के 95 में से 71 विकासखंडों में खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है। यदि वक्त पर बरसात हो गई तो ठीक, अन्यथा बिन बारिश के खेत से अगली फसल को अनाज का दाना तक नसीब नहीं हो पाता।
सूरतेहाल, सबसे बड़ी चुनौती तो पर्वतीय इलाकों में सिंचाई की है। आंकड़े बताते हैं कि पर्वतीय इलाकों में महज 42 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में ही सिंचाई की सुविधा है। इसका भी हाल सूखी गूलों को देखकर लगाया जा सकता है। हालांकि सरकार ने वर्षा जल संरक्षण की दिशा में पहल की है, लेकिन इसके नतीजे तात्कालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक होते हैं।
(दैनिक जागरण से साभार)
