महेंद्र राजा जैन, वरिष्ट हिंदी लेखक
- कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय ने किसानों की आत्महत्याओं का कारण बढ़ते तापमान में ढूंढ़ निकाला है।
- जब तक बदलते मौसम के हिसाब से कृषि को नहीं बदला जाएगा, किसानों की आत्महत्या में कमी नहीं आएगी।
अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह निष्कर्ष निकला है कि लगभग 60 हजार भारतीय किसानों और कृषि कार्य में लगे लोगों द्वारा की गई आत्महत्या का कारण जलवायु परिवर्तन है, जिसके कारण इसी प्रकार के व्यवसायों में लगे कुछ अन्य लोग भी प्रभावित हुए माने जा सकते हैं। यह नतीजा उस समय निकाला गया है, जब हम भारत में किसानों की खुदकुशी को कृषि और आर्थिक नीतियों का परिणाम मानते हुए कजर्-माफी की राजनीति कर रहे हैं। इस अध्ययन के अनुसार, तापमान में प्रतिदिन केवल एक डिग्री सेल्सियस की बढ़त बुआई के मौसम में 67 आत्महत्याओं का कारण बन सकती है। इसी प्रकार, किसी एक दिन में पांच डिग्री सेल्शियस की बढ़त 335 से ज्यादा किसानों की मृत्यु का कारण बन गई। पिछले महीने (जुलाई) में अमेरिका की नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंस के जर्नल में प्रकाशित इस लेख में बतलाया गया है कि पिछले 30 वर्षो में भारतीय कृषि सेक्टर में 59,300 लोगों की आत्महत्या का कारण जलवायु परिवर्तन ही है। बुआई के बाद के सीजन में तापमान में वृद्धि का आत्महत्या पर कोई असर नहीं पड़ा।
इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि कृषि उद्योग में आत्महत्या में वृद्धि का कारण जलवायु परिवर्तन ही है। इसी अध्ययन से यह भी पता चला है कि प्रतिवर्ष वर्षा काल में सिर्फ एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से आत्महत्या में सात प्रतिशत की कमी हुई। दो साल तक लगातार अधिक वर्षा होने के कारण आत्महत्या के मामलों में उल्लेखनीय कमी देखी गई। भारत में कृषि सेक्टर में पिछले वर्ष आत्महत्याओं की संख्या में यद्यपि कमी आई है, लेकिन कुछ प्रदेशों में यह अब भी संक्रामक स्तर पर है। सूखाग्रस्त महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए इसमें कहा गया है कि पिछले वर्ष के शुरू के चार माह में ही 852 किसानों ने आत्महत्या की, जबकि उसके पहले 2015 में देश भर में 12,602 किसानों ने आत्महत्या की, जिसे सबसे बुरा वर्ष कहा जा सकता है। वर्ष 1995 से अब तक तीन लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। हाल के कुछ महीनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों के नरकंकाल और हड्डियों के ढेर लगाकर कई तरह से नाटकीय प्रदर्शन किए थे। इसकी वजह से पूरे देश का ध्यान उनकी ओर गया। कहा जाता है कि पिछले 140 वर्षो में तमिलनाडु में ऐसा सूखा नहीं पड़ा, जैसा पिछले साल पड़ा था। इसके कारण वहां बड़ी संख्या में किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। इन आत्महत्याओं का एक कारण किसानों द्वारा बैंकों से लिया गया कर्ज भी कहा जाता है, जिसे वे अदा नहीं कर पा रहे थे। समस्या को अगर हम इस अध्ययन से जोड़कर देखें, तो नतीजा यह भी निकल सकता है कि तापमान बढ़ने के कारण उपज कम हुई और किसान अपने कर्ज चुकाने की हालत में नहीं रह गए। पिछले वर्ष भारत सरकार द्वारा फसलों के बीमा के लिए लगभग 80 अरब रुपये की बीमा योजना शुरू की गई थी, कहा जाता है कि इसकी वजह से किसानों और कृषि क्षेत्र में काम करने वालों की आत्महत्या में कमी आई है। इस अध्ययन में यह भी बतलाया गया है कि भारतीय किसान जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली हानियों को दृष्टिगत न करते हुए अब भी पुराने र्ढे पर काम करते आ रहे हैं, जबकि जरूरत यह है कि वे अपनी कार्य-प्रणाली में कुछ परिवर्तन करें। जब तक किसानों को जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए कृषि प्रणाली में सुधार की ओर ध्यान नहीं दिलाया जाएगा, तब तक किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या में कमी होने का कोई आसार नजर नहीं आता। किसानों की आत्महत्या के कारण चाहे कर्ज रहे हों, गलत कृषि नीतियां रही हों या तापमान का बढ़ना, हर हाल में सरकार के पास एक ही तरीका है कि वह आर्थिक व कृषि नीतियों से इस समस्या का समाधान खोजे। तापमान के बढ़ने या मौसम बदलने का किसानों और उपज पर असर पड़ना तय है। अगर सरकारी नीतियां इसका समाधान किसानों और खेतों तक नहीं पहुंचाती, तो नुकसान सिर्फ किसानों का ही नहीं, देश की पूरी अर्थव्यवस्था का होगा। बदलते मौसम में पुराने तौर-तरीके नहीं चलेंगे।
(हिन्दुस्तान से साभार…ये लेखक के अपने विचार हैं)
