गुजरात में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध में पानी के बढ़ते स्तर के कारण मध्य प्रदेश के 10 हजार की अबादी वाले निसरपुर गांव पर डूबने का खतरा मंडराने लगा है। वर्तमान स्थिति में नर्मदा नदी के आस—पास की वनस्पति और घर आदि डूबने लगे हैं।
वहीं धार जिले में 10 हजार की आबादी वाले निसरपुर गांव में पानी तेजी से बढ़ रहा है जिसके कारण लोग पलायन करने को मजबूर हैं। अब तक सैकड़ों लोग गांव से पलायन कर चुके हैं।
नर्मदा तट से करीब चार किलोमीटर दूर स्थित निसरपुर में सरदार सरोवर बांध का बैकवॉटर 133 मीटर का स्तर पार कर गया जो खतरे के निशान के मुकाबले करीब 6.5 मीटर ज्यादा है।
मॉनसून की भारी बारिश के कारण सूबे में नर्मदा और इसकी सहायक नदियों पर बने बांधों से लगातार पानी छोड़ा जा रहा है। इससे निसरपुर में बैकवॉटर का स्तर बढ़ने की गति तेज हो गई है।
एक वक्त, जब निमाड़ बचाओ आंदोलन हुआ था, तब जनसंघ और कांग्रेस ने मिलकर सरदार सरोवर को मध्यप्रदेश के पूर्णत: अहित में घोषित किया था। आज हर उठाया मुद्दा साबित हो रहा है। विस्थापितों की सूचियों में धांधली, भ्रष्टाचार के अलावा बांध का एकमात्र बिजली का लाभ नहीं मिल रहा है। आज तक राज्य के पूंजी निवेश में पचास प्रतिशत हिस्से पर विवाद कायम है और गुजरात में भरपूर पानी बरसने से न उसे लबालब भरे जलाशयों से पानी की जरूरत है न ही मप्रदेश को बिजली की। मध्यप्रदेश की बिजली उत्पादन क्षमता 21 हजार मेगावाट होते हुए इस वक्त की डिमांड तो मात्र 6800 मेगावाट है। फिर न्यूनतम बिजली के लाभ के नाम पर घाटी को विस्थापन के करंट का शॉक और मौन किसलिए?
जाहिर है कि मध्यप्रदेश की पूर्व सरकार ने 2008 से 2010 के बीच बैकवाटर लेव्ह्ल्स कम करने का अवैज्ञानिक खेल चलाया और ‘सोलह हजार परिवारों को डूब से बाहर कर कागज पर धकेल दिया।’ उनमें से बहुतांश आज डूब सामने होते हुए भविष्य को ही डूबने की संभावना भुगत रहे हैं। उसके बाद यानी 2017 में मप्र शासन ने लोकविरोधी भूमिका लेकर जिनकी प्रकृति, संस्कृति के नाम पर सेवायात्रा के रूप में राजनीति की थी, उन्हे ही बिनाधार मूल गांव में रहने के लिए दोषी ठहरा दिया था। सब लाभ पाकर भी केवल 138.68 मीटर डुबोये जाने से ही 40 हजार परिवार गांवों में रह रहे हैं, यह दावा था अधिकारियों का । मप्र के उस समय के अधिकारी आज भी आंकड़ों का खेल खेलकर मुख्यमंत्री, मंत्री, आयुक्त तक सही संख्या बचा हुआ कार्य, आदि पर भ्रमित कर रहे हैं। अब गांव—गांव में में जांच शुरू हो रही है, वह भी अधिकारीयों के अडंगे पार करके तो वह पूरी कब होगी। राजघाट में दो मृत्यु के बाद जांच हुई ……. लेकिन निर्णय आज भी बाकी ! गांवों में सूचियां टांगी गई, उसमें गलतियों के अंबार लगा हुआ है। पात्रों को अपात्र, अपात्रों केा पात्र, के बीच आंदोलनकारी सच्चाई सामने ला रहे हैं।
