अमरनाथ की रिपोर्ट
दाल जायका ख़राब कर रहा है. नेताजी अरहर के बहाने वोट की फसल काटने का पूरा जुगत लगा चुके हैं, तो किसी का जायका इस महंगी दाल की वजह से फीका हो रहा है. लेकिन चुनाव के शोर मे किसान और गांव के मुद्दे गौण हो गए हैं. किसान तो सिर्फ नेता जी का वोट बैंक है. लगभग ८२ फीसदी आबादी गांवों में रहती है.इनमें से ज्यादातर लोग किसानी से जुड़े हैं, लेकिन किसानों की बात नेता नहीं कर रहे हैं.पार्टियों की घोषणा तक ही किसानों से जुड़े मुद्दे सीमित हैं, लेकिन इन पर बहस नहीं हो रही है. जबकि किसान सरकार बनाने बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं. इसके बाद भी किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. मुजफ्फरपुर हाजीपुर मार्ग पर गोरौल के आसपास के इलाके में बड़े पैमाने पर बैगन की खेती होती है. यहां के किसान सिंचाई केलिए डीजल पर निर्भरता से परेशान हैं.
खेत से बैगन तोड़ रहे सुनील सहनी मुजफ्फरपुर बाजार जानेकी तैयारी में हैं.कहते है कि भले ही बाजार में बैगन की कीमत २० से३० रुपए प्रति किलो के बीच है लेकिन हम लोगों को पांच से आठ रुपए प्रति किलो के बीच ही मिल पाते हैं. दरभंगा बाजार ले जाने पर कुछ अधिक मिल जाता है,लेकिन किरायां रास्ते का किराया भाड़ा भी लग जाता है. सुनील ठेके पर खेत लेकर बैगन की खेती करते हैं.कहते है कि सरकारी स्तर पर सिचाई की सुविधा नहीं है. हमें डीजल अनुदान भी नहीं मिल पाता है.
सुनील के पिता सूरज सहनी बैगन के खेत में पानी पटा रहे थे. निजी पंपिग सेट से पानी पटाने का काम हो रहा है. कहते है कि इसमें खर्च काफी आता है .अधिक आमदनी नहीं होती. लेकिन इसे छोड़ भी नहीं सकते. काम नहीं करेगे तो खाएगे क्या? वे बताते हैं कि बैगन चौक के आसपास के इलाके में ज्यादातर लोग बैंगन की खेती करते हैं. बैंगन खेती की परंपरा सी बन गई है. हालांकि यहां बैगन के साथ खेतों में ओल व गोभी के पौधे भी दिखते हैं. अन्य हरी सब्जियां भी खेतों में दिखती है.किसान कहते हैं कि सब कुछ खुद अपने बूते करन पड़ता है. पोस्ट ग्रेजुएट अंशुमान पूसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं. इसलिए खेती भी करते हैं. कहते हैं कि इलाके के ज्यादातर लोगों की आजीविका खेती पर निर्भर है. लेकिन सरकारी नलकूप वर्षों से खराब है. खाद-बीज कोई सुविधा नहीं मिलती.
चुनाव के समय नेताओं को इन लोगो की सुध आती है. जैसे ही चुनाव बीत जाते है, नेताजी फिर हमारे घरों का रास्ता भूल जाते हैं. वे बताते हैं कि पिछले वर्षों में बिजली की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन वोल्टेज घटता बढता है जिससे मोटरपंप चलाने के परेशानी होती है. खेतो से गुजरने वाले तारों की देखरेख नहीं की जाती. कई बार खेतों में तार लटक जाते हैं. कहने पर भी बनाने में देर होती है. मरम्मत हो जाती है,तब भी कुछ ही दिनों में फिर स्थिति पहले जैसी हो जाती है. पूसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड उपकूलपति डॉ गोपाल जी त्रिवेदी कहते हैं कि गांव और किसानों के लिए राजनीतिक दलों के पास कोई सोच नहीं है. चुनाव उन्हें भरमाने का साधन बन गया है.
बैगन चौक के पास आंगनबाडी के न्द्र की संचालिका आभा कुमारी बताती हैं कि खेती किसानी की समस्याओं की वजह से इलाके में ड्राप्स आउट की समस्या चरम पर है. क्योंकि लोग बच्चों को पढाने के बजाए थोड़ा बड़े होते ही खेती के काम में लगा देना बेहतर समझते हैं.चरम स्तर का भ्रस्टाचार निचले स्तर तक है. पंचायत सेवक और मुखिया भी घूस मांगते हैं. चाहे किसान हो या दूसरे लोग इससे परेशान हैं.

