संतोष कुमार सिंह
“मौताणा” यानी मौत का सौदा। राजस्थान के आदिवासी इलाकों में प्रचलित यह प्रथा आज भी जारी, जब हम मोबाइल क्रांति और कानून के सामने सबके समानता की बात करते हैं, उस युग में भी “मौताणा” के जरिये मौत का मुआवजा लिया जाता है। कई बार तो लाश सालों, महीनो, मुआवजे की रह तकती पेड पर ही लटकी रहती है। इसी प्रथा की कुरीतिओं को रेखांकित करता गांव वाला क्रिएशन के बैनर तले सोनी टीवी पर क्राईम पेट्रोल एक एपिसोड बनाया गया है जिसके जरिये कबीलाई व्यवस्था से ही चली आ रही “मौताणा” की कुप्रथा पर लोगों का ध्यान खिंचा जा सके ।
यह एक कबीलाई व्यवस्था थी जिसका उद्देश्य मिल बैठकर झगड़ों को सुलझाना, पारंपरिक आदिवासी नियमों के तहत पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाना और आर्थिक दंड के माध्यम से अपराध पर सामाजिक नियंत्रण था। आदिवासियों की ‘जातिगत-पंचायत’ ही बहुत बार छोटे-मोटे अपराधों का फैसला करती है और दोषियों पर जुर्माने ठोकती है। दुर्घटना में या अप्राकृतिक परिस्थितियों में मौत हो जाने पर सारी की सारी आदिवासी आबादी ‘दोषी’ या अपराधी का तब तक घेराव रखती है, जब तक उसके द्वारा नकद मुआवजे और सारे समुदाय के लिए देसी-दारू का इंतजाम नहीं कर दिया जाता। इस प्रक्रिया में दोनों पक्षों की तरफ़ से सौदेबाज़ी होती है। कई बार तो ‘मौताणा’ की रकम तय होने तक शव का अंतिम संस्कार तक नहीं किया जाता, भले इसमें कई कई घंटे लग जाएँ या कई दिन!
कहाँ प्रचलित है मौताणा
देश की आज़ादी के 68 साल बाद भी उदयपुर के आदिवासी बहुल क्षेत्रों खेरवाडा, झाडोल, कोटडा, गिरवा, सलूम्बर और निकटवर्ती डूंगरपुर ज़िले के कुछ हिस्सों में आदिवासियों के बीच मौताणा की व्यवस्था कायम हैं। मौताणा की प्रथा इन क्षेत्रों के भील, गरासिया और इनकी उपजाति मीणा आदि में प्रचलित है।
वसूली का धंधा बना
कई बार तो अजीबो गरीब मामले मौताणा में सामने आते हैं। यदि कोई बच्चा आपके खेत में से होकर निकल रहा है और उसे सांप ने डस लिया, तो हो सकता है कि उस बालक की मौत पर आपको भारी हजार्ना भरना पड़ सकता है। साथ ही किसी व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति की हत्या कर दी है तो जेल जाने के स्थान पर वह सामने वाले पक्ष की ओर से तय की गई जुमार्ना राशि अदा कर खुला घूम सकता है। गभर्वती महिला की किसी भी कारण से मौत हो जाने पर उसके पति से महिला का पीहर पक्ष जुमार्ना वसूल कर सकता है। क्योंकि गर्भ ठहराने का वही जिम्मेदार है और यदि पंचों की ओर से तय जुमार्ना अदा नहीं किया गया तो हो सकता है कि सामने वाला पक्ष आपके गांव पर हमला बोल दे। घरों को जला दे और गांव छोड़ने को मजबूर कर दे।
डेढ़ साल से लटकी हुई है लाश
उदयपुर राजस्थान के आदिवासी गांव के आंजणी कस्बा में करीब डेढ वर्ष से खुंटी पर लाश लटकी हुई है। लाश को इन्तजार है ‘मौताणा’ की रकम का ताकि इसे मोक्च मिल सके। ये कहानी अजमेरी नाम के उस युवक की है जो डेढ वर्ष पहले अपनी बहन से मिलने राजस्थान के एक गांव में आया था, लेकिन फिर जिन्दा नहीं लौटा। अजमेरी के भाईयों ने जंगलों में से उसकी लाश की तलाश कर उसी के घर में खुंटी पर टांग दी और बहनोई और भाँजों पर हत्या का आरोप मढते हुए पांच लाख नहीं मिलने तक अंतिम संस्कार नहीं करने की चेतावनी दे दी।
आज डेढ वर्ष बाद भी उसका अंतिम संस्कार नहीं करने पर अड़े हुए है। इतना ही नहीं पंच का फैसला भी बहन के परिजनों द्वारा पांच लाख नहीं देने तक शव का अंतिम संस्कार नहीं होने देने की चेतावनी दी है। दोनों राज्यों की पुलिस भी अजमेरी के घर पर लटकी उसकी लाश को देखा, पूछताछ भी की लेकिन इस अपराधिक कृत्य का निवारण करने की बजाय पंचायत के आदेश का इन्तजार कर रही है और अपने क्षेत्र की वारदात नहीं होने का हवाला देते हुए मामला खत्म करने पर तुली है।

