संतोष कुमार सिंह
इस देश में मीडिया कर्मियों की स्वास्थय संबंधी प्रशिक्षण की दशा क्या है यह किसी से छुपी नहीं। लेकिन देश के अग्रणी संस्थान आईआईएमसी, और यूनिसेफ जैसे संस्थानों ने इस दिशा में पहल की है। कोशिश हो रही है..बुनियादी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों को प्रशिक्षण देने की ताकि वे स्वास्थय पत्रकारिता के बुनियादी गुर को सीख सके, और वरिष्ट कहे जाने वाले संपादक स्तर के लोगों को भी इस कार्यक्रम से जोड़ा गया है ताकि वे इसके महत्व को समझ सके। जनस्वास्थय एवं संचार विषय पर आयोजित क्रिटिकल अप्रेजल स्किल प्रोग्राम में वक्ताओं ने नियमित टीकाकरण कवरेज के राह में आ रही परेशानी और इसके रिर्पोटिंग से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित किया। थॉम्पसन रियूटर फाउंडेशन से जुड़े रॉस्टन मार्टिन ने कहा कि पूर्व निर्धारित धारणा के बजाय हम तथ्यों का विश्लेषण कर आंकड़ो के आधार पर अपनी बाते कहें, लोगों को जागरूक करें तो स्थिती में सुधार हो सकता है। एक तरफ हम प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थय अधिकार की बात करते हैं वहीं दूसरी तरफ स्थिति यह है कि आधे से ज्यादा बच्चों का टीकाकरण नहीं किया जा सका है। हमें ग्लोबल टू लोकल..और लोकल टू ग्लोबल अप्रोच अपनाना होगा। अर्थात कस्बाई पत्रकार यदि सही तरीके से लिखता है तो चीजें वैश्विक स्तर पर ठीक से सामने आती हैं। इसलिए यदि गांव की भी रिर्पोटिंग करते हैं तो वैश्विक फलक पर लिखें इससे दायरा बढ़ता है और चीजों को स्थानीयता के साथ वैश्विक परिदृश्य में तुलनात्मकता को बढ़ावा मिलता है। एक पत्रकार के तौर पर हमें अपनी सामान्य क्षमता का विस्तार करना हैं। आम तौर पर हम यह मान कर चलते हैं कि हेल्थ पत्रकारिता राजनीतिक रिर्पोटिंग या यहां तक कि क्रिकेट के रिर्पोटिंग से निम्नतर बीट है, लेकिन हेल्थ रिर्पोटिंग भी रोचक हो सकती है..बशर्ते उसे पैसन के साथ किया जाए, उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव हो। उन्होंने सुझाव दिया कि बड़े शब्दों को छोटे शब्दों में लिखें। दो शब्द को एक शब्द में लिखें। बात पैसिव में नहीं एक्टिव में कहें। तकनीकि शब्दावली को सामान्य भाषा में तब्दील करें। कहने को उनके पास बहुत कुछ था, और कहा भी संभव है जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे पत्रकारों को स्वास्थ के क्षेत्र में आकर्षण बढ़ाने में उनके विचार जागरूक करने में मददगार साबित होगी ।

