अमृतसर। अजीत सिंह जितना प्यार अपने बेटे और दो बेटियों को देते हैं उतना ही उन पेड़-पौधों को भी, जिनको उन्होंने अपनी छत पर बनाए बगीचे में तैयार किया है। सुबह ड्यूटी से जाने से पहले और शाम को वापसी तथा छुट्टी का समय भी इनके बीच गुजारते हैं। कभी सिंचाई, गुड़ाई तो कभी अन्य रखरखाव। उनका यह सिलसिला साल-दो-साल नहीं बल्कि 30 सालों से चलता रहा है। कहना गलत होगा कि कुदरत के यह पहरेदार उनके परिवार के मेंबर से कम नहीं हैं।
प्रकृति से हो रही छेड़छाड़ के मद्देनजर की पहल
अजीतसिंह बताते हैं कि वह इनको खाने निजी इस्तेमाल के लिए नहीं लगाए हैं। उनका कहना है कि जिस तरीके से आज पर्यावरण से छेड़छाड़ हो रही है, उसके मद्देनजर उन्होंने यह पहल की है। हमारे पास यही एक जरिया है जिससे हम प्रदूषण से निजात पा सकते हैं। उन्होंने बताया कि अब तो बगीचे में तितलियां और परिंदे भी दिखाई देते हैं, इनसे अजब का सुकून मिलता है।
लालबहादुर शास्त्री प्रेरणा स्रोत बने
उनका कहना है कि अगर पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री आपात काल में गमलों में धान-गेहूं उगाने की पहल कर सकते हैं तो हम क्यों आज ऐसा करें। वह मानते हैं कि जिस तरीके से विकास के नाम पर पेड़-पौधों की बलि ली जा रही है उसके मद्देनजर हरेक नागरिक को अपने आसपास पेड़-पौधों को पालना चाहिए, ताकि पर्यावरण को सुरक्षित किया जा सके।
बागवानी और सब्जियां एक साथ
गेटहकीमां की गली मलकां में रहने वाले 50 वर्षीय अजीत सिंह एडिशनल सेशन जज के रीडर हैं। 50 गज की छत पर 100 से अधिक गमलों में उन्होंने फूल, सब्जियां और पेड़ उगाए हैं। छत के अलावा सीढ़ियों तक पर सजे गमले उनके कुदरत प्रेम को दर्शाते हैं। अजीत सिंह ने एक गमले में आम के पेड़ लगाया है, जिस पर इस वक्त भी फल लगे हैं, इसी तरह से दो गमलों में लगे निंबुओं में भी फल लगे हैं। उन्होंने गमले में ही नीम, क्रिसमस ट्री, केसर, कलगा, ग्लोडियोलस, गुलाब, डबल डेलिया, कंघी पाम, मोर पंख, कलिया, तुलसी, न्याजबोज, सौंफ, किन्नू, पपीता के अलावा प्याज, लहसुन, धनियां, बैगन गोभी आदि सब्जियां भी उगाई हुई हैं। ( साभार:दैनिक भाष्कर)
