लोकआस्था का महापर्व आज से प्रारंभ हो गया। ‘छठ’ हम बिहारियों के लिए पर्व मात्र नहीं हैं माहापर्व है भाव का आवेग हैं।मैं से हम के बीच अपने समाज को देखने और जानने का ज़रिया हैं।माँ के लिए आस का केंद्र है कि घर के बच्चे पूरे साल कही भी रहे छठ में घर तो आएंगी ही।
इस बार की यात्रा मेरे लिए बिलकुल अलग प्रकार की रही।वैसे भी दिल्ली से बिहार की ट्रेन इस समय मिलना मुश्किल ही नहीं न मुमकिन हैं।एसे भी पूर्व में मेरी कोई योजना नहीं थी कि ट्रेन से जाना है या किसी और साधन से। मित्र के साथ बैठा हुआ था 20 तारीख ट्रेन में कन्फर्म टिकट की संभावनाएं नहीं के बाराबर थी।परिवार के अन्य लोगों ने तीन महीने पहले टिकट ले रखा था। अब तक उनकि आरएसी हो पायी थी।उम्मीद नहीं के बराबर , बातचीत के क्रम में मित्र ने अपना फोन निकाला दो देखा कि मेरे शहर के लिए ‘छठपूजा’ स्पेशल ट्रेन इक्कीस तारीख को हैं।जल्दी -जल्दी में टिकट लेलिया गया।उम्मीद अब छठ ही नहीं दीपावली में घर पहुँचने की बन गई।ट्रेन अपने गंतव्य समय से छः घंटे की देरी से पहुँची लेकिन ख़ुशी इस बात की थी कि घर पहुँच गए और वे भी दीपावली से पहले। ट्रेन के बोगी में सब की ख़ुशी इस बात से थी कि ट्रेन का टिकल मिल गया और वे अपने घर पहुँच रहे हैं। ट्रेन के बोगी में छठ गीत का गायन भी हो रहा था और शारदा सिन्हा जी कि आवाज दिलासा दिला रही थी कि हम छठ में अपने घर पर होंगे।लोग महानगरीय जीवन से निकल कर लोक जीवन में प्रवेश कर रहे थे।हर किसी के मोबाईल में छठ गीत बज रहा था।–
ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए,
ओह पर सुगा मेड़राए,
ऊ जे ख़बरी जनैबो अदित से,
सुगा दिहली जुठियाय,
सुगा दिहली जुठियाय ।
ऊ जे मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए,
सुगा गिरे मुरझाए ।
इस बार मैंने अपने आसपास के लोक व्यवहार को समझने और जानने की कोशिश की यह अहसास मेरे लिए महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति मूल से कट कर अपनी दृष्टि को विस्तृत फलक नहीं मिल सकता ।लोक व्यवहार के इस पक्ष को समझने के लिए आसपास के गाँव मे जाना हुआ। जहाँ पता चला किउत्सव सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं।अपने आप को समझने और जानने का जुगत भी हैं।
कोसी के कछार से लोक का संदेश देते लोग…
दुनिया बदल गई हैं। पिछले दो साल पहले की बात है कोसी नदी पर दाई किलोमीटर का पुल बन गया हैं। सहरसा ,सुपौल और दरभंगा की दूरी कम हो गयी हैं।इसी पुल के नीचे भारत का गाँव बसता हैं।बसता ही नहीं अपना “लोक”जीवन जीता हैं, चूंकि पिछले कुछ दिनों से लोक आधारित विषयों को जानने की जिज्ञासा बढ़ी हैं।इसके कई कारण हैं ,उन कारणों में से एक कारण रेल के यात्रा के क्रम में एक व्यक्ति से संवाद हैं।बरहाल हम बात करते है सहरसा ज़िले के बरोल पंचायत की।जिसे दुनिया ने अपनी खुशियों का मनोरंजन का साधन माना हैं जैसे तैराकी (स्विमिंग) , नोकाविहार (बोटिंग) यहाँ जीवन शैली हैं यहाँ लोकाचार पानी का संस्कार हैं। बच्चे पानी और मिट्टी में सने होते हैं। पानी में खेलना इनके जीवन का हिस्सा हैं। साल के छः महीने पानी के सिवाय कुछ और नसीब नहीं होता हैं। कोसी और कमला दोंनो अपने पानी से इस पंचायत को सुशोभित करती हैं। इनके लिए नदी मैया (माँ) है स्थानीय लोग बताते हैं कि’ पानी के बिना हम सब का जीवन अधुरा हैं, अगर पानी है जो जीवन में पानी के सिवाय और कुछ है ही नहीं।’ पानी जीवन है उस पानी के जीवन में यहाँ का समाज हैं।
भक्ति का सुर
लोकाचार्य और व्यवहार में यह महत्वपूर्ण हो जाता हैं अगर भक्त पहलवान है तो भगवान भी हनुमानजी होंगे। उसी प्रकार यहाँ के देवता भी बाबा ‘कारू खिड़री’ हैं।बाबा सिद्ध संत हुए हैं कोसी नदी के किनारे इनका प्रसिद्ध मंदिर हैं।इस मंदिर के संदर्भ में लोक मत यह है कि कोसी माता कितनी भी नाराज क्यों न हो जाए लेकिन बाबा से वे नाराज नहीं होती।मान्यता के साथ -साथ लोक संगीत का भी महत्व हैं। ‘भगैत’ नौवें के दशक में बिहार राज्य में भगैत को विशेष स्थान दिया गया हैं। चूंकि यह सामूहिक गायन हैं इसलिए समुहों में लोग संवाद करते हैं।अपनी परेशानी को भगवत भक्ति के माध्यम से भगवान को बताते हैं।’भगैत’ गायन के लिए प्रत्येक गाँव में एक टोली होती हैं।भक्त और भगवान के बीच रागात्मक संबंध इस लोक गीत के माध्यम से संभव होता हैं।
पर्यावरण संरक्षण और लोकाचार

यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जिस पर्यावरण संरक्षण की बात हम महानगरों के पांच सितारा होटलों में बैठकर करते हैं। वे बातें सिर्फ बातें तक रह जाती हैं।पर्यावरण संरक्षण से इतर पर्यावरण संतुलन को अगर समझना और जानना हो तो भारत के गांवों में लौटना होगा।उसके मूल को समझा होगा, कितना पानी किस साल फसल के लिए चाहिए।पानी अगर गाँव में नहीं आया है तो वे खुश होने के बजाय चिंतित होते हैं।कोसी मैया इस साल क्यों नाराज हैं।यही स्थिति अगर पानी अधिक हो जाए तो कोसी मैया क्यों नाराज है। इस कि पड़ताल करते हैं।पानी का स्तर क्या हो। पानी के बीच कौन सी फसल बोई जाए जो पानी को शुद्ध रखें। पानी में अगर मछलियों का आना कम हो जाए तो ये लोग समझ जाते है कि पानी में मछली को मारने के लिए ‘कीटनाशक’ का प्रयोग किया गया हैं।जिसके कारण पानी में अधिक गंदगी हैं।सवाल उस घास का भी हैं जो पानी के जलस्तर को समझ सकता हैं। ईंधन के तौर पर उनका संरक्षण भी किया जा सकता हैं।उसका विशेष ध्यान यहाँ के लोग रखतें हैं। मौसम के हिसाब से अगर पक्षियों का आना नहीं हुआ तो भी वे चिंतित हो जाते हैं।इस साल पानी पहले आगया हैं।पानी में गन्दगी बढ़ गई हैं।जिसके कारण पक्षियों का प्रवास इस क्षेत्र में कम हो गया हैं।पानी ,पक्षी,घास, मिट्टी और गाँव और इनका प्रकृति प्रेम अद्भुत हैं।जिससे जगत ने जीवन चक्र कहा है उस चक्र का वास्तविक उद्देश्य ग्रामीण जन अधिक समझते हैं और जीतें भी हैं।
भारत को अपने गाँव के ओर लौटना होगा।उन्हें समझना होगा, पानी बोतल में पैक हो जाने मात्र से शुद्ध नहीं होता हैं। उसमें वनस्पतियों का क्या संपर्क है कि नहीं इसका भी ख्याल लोकाचार, लोक व्यवहार में रखा जाता हैं।पानी सभी प्राणियों के पीने और रहने योग्य है कि नहीं इसकी भी चिंता लोक जीवन में किया जाता हैं।हमें गांव और लोगों को समझना होगा। उनके जीवन शैली को जानना होगा। हमारे लिए आप के लिए पानी बोटल का मतलब शुद्ध जल का होना होता हैं लेकिन लोकाचार और व्यवहार में समाज का एक बड़ा वर्ग आपके, हमारे बोटल रूपी शुद्ध जल को प्रातः कालीन बोटल मानते क्योंकि उनकी चिंता पानी के पीने तक सिमित नहीं हैं।पानी के बीच जीवन जीने का भी हैं।जिसमें दुनिया के सभी प्राणियों को जीवन जीने का अधिकार प्राप्त हैं।
हर्षित कुमार, JNU विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं



