सूखा पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को एक महीना से अधिक, लेकिन सरकारें खानापूर्ति में व्यस्त

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संतोष कुमार सिंह

देश के प्रमुख जनसंगठनों ने केंद्र व राज्य की सरकारों पर सूखे की स्थिति से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये निर्देश का जानबूझकर अवमानना का आरोप लगाया है। स्वराज अभियान ,मजदूर किसान शक्ति संगठन, एकता परिषद,जल बिरादरी, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, सूचना एवं रोज़गार अभियान, राइट टू फूड कैम्पेन, पीपुल्स एक्शन फॉर एम्पलॉयमेंट गारंटी से जुड़े प्रतिनिधि आज एक मंच पर आये, और सरकार से गुहार लगाई कि सुप्रीम कोर्ट के ए​तिहासिक फैसले को जमीन पर उतारने की गुहार लगाई। इतना ही नहींसुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वराज अभियान की सूखा राहत याचिका पर दिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद विभिन्न जन आंदोलनों ने सूखा राहत कार्यों की जमीनी स्थिति पर निगरानी के लिए पहल की। स्वराज अभियान ने एकता परिषद, जल बिरादरी और जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के साथ मिलकर लातूर से महोबा (21 मई से 31 मई) की जल हल पदयात्रा आयोजित की। इसी तरह की यात्रा तेलंगाना (2 जून से 4 जून) में और चंबल से बुंदेलखंड (6 जून से 14 जून) के लिए आयोजित की गई। सूचना एवं रोज़गार अभियान, राइट टू फ़ूड कैंपेन और पीपल्स एक्शन फ़ॉर एम्प्लॉयमेंट गारंटी के द्वारा जयपुर और भोपाल में राज्य स्तरीय जन सुनवाई का आयोजन किया गया।

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इन सारे जमीनी आकलनों में यह दुखद सच सामने आया है कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले का कई मायनों में उल्लंघन हो रहा है:

  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों में खाद्यान्नों की सार्वभौमिक पहुँच कहीं नहीं है; भूख से निपटने के इस महत्वपूर्ण निर्देश का पालन कोई भी राज्य नहीं कर रही है; इस संदर्भ में केंद्र सरकार भी जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं है।
  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा कड़ी टिप्पणियों के बाद भी समय पर फंड जारी नहीं करके मनरेगा को नुकसान पहुँचाया जा रहा है; सूखा आपदा के वक्त में भी भुगतान में देरी और टारगेट को पूरा करने में खराब प्रदर्शन जारी है।
  • अच्छे मानसून के पूर्वानुमान के बाद भी सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसान अगली फसल लगाने को तैयार नहीं हैं, उन्हें अभी तक फसल नुकसान का मुआवजा नहीं मिला है और न ही नया लोन मिल रहा है। हालांकि इस संदर्भ में कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि सरकारी नीतियों को धर्म मानते हुए (religiously) पालन किया जाए।
  • आधे से ज्यादा राज्यों में गर्मी की छुट्टियों के दौरान स्कूलों में मिड डे मील नहीं दिया गया है।

 यात्रा और बातचीत के दौरान देश के कई हिस्सों में, विशेषकर मराठवाड़ा और बुंदेलखण्ड में भयावह स्थिति सामने आयी। हमने पाया कि:

  • मराठवाड़ा में पानी का अकाल है और पानी माफिया की वजह से स्थिति और बदतर हो गई है।
  • बुंदेलखंड में पशुओं के लिए अकाल है और चारा उपलब्ध कराने में राज्यों की घोर उपेक्षा की वजह से स्थिति बदतर हो गई है।
  • कई राज्यों में जमीन, पशु और दूसरी संपत्तियों की मजबूरन बिक्री हो रही है।
  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीण आबादी का मज़बूरी में व्यापक पलायन हो रहा है, जिसमें जमीन वाले किसान भी हैं। यह पलायन मौसमी मजदूर स्थानांतरण से अलग और कहीं ज्यादा मात्रा में है।

इन संगठनों ने सभी सरकारों, विशेष रूप से केंद्र सरकार से अपील किया कि कि कोर्ट के आदेशों का अक्षरश: और उसकी भावना के अनुरूप पालन हो। हालांकि देश एक अच्छे मानसून की उम्मीद कर रहा है लेकिन यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि अच्छी बारिश से सूखाजन्य सभी समस्याएं खत्म नहीं होंगी। सभी 13 सूखा प्रभावित राज्यों में सूखा राहत निगरानी के लिए कई जन आंदोलनों और संगठनों ने एक साथ आने का निर्णय किया है। 1 अगस्त को इस केस की अगली सुनवाई में यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को पेश किया जाएगा।

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किसने क्या कहा

स्वराज अभियान से जुड़े योंगेद्र यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के सूखे को लेकर दिये गये एतिहासिक फैसले के एक माह बाद भी जमीन पर इसे लागू किये जाने की कोई स्थिति नहीं दिख रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों की भूमिका तो है, लेकिन केंद्र सरकार की भूमिका काफी दुखद है।

एकता परिषद के पीवीराजगोपाल ने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू किया गया होता तो जमीन पर ये स्थिति नहीं होती। आज स्थिति यह है कि सूखे का सबसे ज्यादा प्रभाव अनुसूचित जाती,जनजाती और महिलाओं पर हुआ है। सूखे के कारण बुदेलखंड से लाखों की संख्या में पलायन हुआ है। ऐसे में गांव में बच गये बुजुर्गो और बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नही है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त खाद्व सुरक्षा अभियान के कमिश्नर हर्ष मांदेर ने कहा आज की स्थिति में हमारी सरकार वो कदम भी नहीं उठा रही, जो उपनिवेशिक सरकारें सूखे की स्थिति में उठाती थी। अर्थात हमारी लोकतांत्रिक सरकार जनता का ख्याल कोलोनियल सरकार से भी कम कर रही है।

​दीपा सिन्हा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सूखा प्रभावित क्षेत्रों में छुटटी के दौरान भी मिड डे मिल देने का आदेश दिया था। लेकिन किसी भी राज्य सरकार ने इस आदेश का पालन नहीं किया। आज स्थिति यह है कि स्कूल खुलने जा रहे है। जिन बच्चों को डायरिया या कुपोषण होना था, हो गया।

निखिल डे ने मनरेगा के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हवाले से कहा कि अदालत में संयुक्त सचिव द्वारा हलफनामा देकर कहा गया था कि सूखे प्रभावित ईलाके में 150 दिन का रोजगार दिया जाएगा। लेकिन स्थिति यह है कि काम देना तो दूर जो काम किया गया है उसका भुगतान भी नहीं किया गया। यहां तक कि भुगतान न होने की​ स्थिति मे मुआवजे को तो ​कहीं भी ठीक से लागू नहीं किया गया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि यदि सरकारे सर्वोच्च अदालत की बात नहीं मानेंगी तो फिर किसकी मानेंगी।

एनएपीएम के डॉ सुनीलम ने कहा कि एक तरफ किसान को घोषित मुआवजा नहीं मिल रहा,दूसरी तरफ बैंक उन्हें डिफॉल्टर साबित कर नया लोन नहीं दे रहे। ऐसे में किसान के पास साहूकार के यहां जाने के सिवा कोई विकल्प नही। इस परिस्थति में किसानों के आत्महत्या की घटनाये बढ़ेंगी।

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