बिहार के गांवों में टीकाकरण तेज,मृतकों के आंकड़ों को लेकर ठनी हुई है रार,आंकड़ों को झुठलाती सरकार

पंचायत खबर टोली
पटना: बिहार में कोरोना से बचाव के लिए गांवों में टीकाकरण अभियान बहुत तेजी से चल रहा है। शहर से लेकर कस्बे तक,कस्बे से लेकर गांव तक,गांव से लेकर टोले तक टीकाकरण का काम बहुत तेजी से चल रहा है। पंचायत सरकार इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है। मुखिया से लेकर वार्ड तक सभी इस काम में लगे हुए हैं। स्वयंसेवी संगठन भी अपने स्तर पर लोगों को राहत दे रहे हैं। कोरोना से बचाव के लिए ​चलाए जा रहे टीकाकरण अभियान में बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी कर रहे हैं।                     …गांवों में टीकाकरण
लेकिन इस बीच कोरोना के दूसरे लहर के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई थी और ​मृतकों के आंकड़ों को लेकर असमंजस की स्थिती है। सरकार अपने ही आंकड़ों को झुठलाती नजर आ रही है।मृतकों की संख्या में कम करके बताई जा रही है। सरकार ने करीब 72 प्रतिशत मृतकों के आंकडें को छिपा लिया था। हाईकोर्ट ने जब जिलावार आंकड़ा प्रस्तुत करने को कहा तो यह हेराफेरी उजागर हुई। पर हाईकोर्ट अभी संतुष्ट नहीं है। सरकार 7 जून तक मृतकों की संख्या 5424 बता रही थी, 8 जून को एकाएक इसमें 3951 जुड़ गए और तब मृतकों की संख्या 9,375 बताया गया। कुछ नए मामलों को जोड़ दे तो आज की तारीख में मृतकों की संख्या 9,514 हो गई है।                                                                                                                                … गांवों में टीकाकरण

लेकिन विपक्षी पार्टियां इससे संतुष्ट नहीं हैं। भाकपा, माले ने कहा है कि संख्या लाख के आसपास होनी चाहिए। सही संख्या जानने के लिए सरकार गांववार सर्वेक्षण कराए। पार्टी अपने तंत्र से इसे कर रही है। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने तो इस मामले की न्यायिक जांच की मांग कर दी है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जानबूझकर मृतकों के आंकड़े में हेरफेर की है।
वैसे सरकारी सूत्रों का भी कहना है कि मृतकों की संख्या का बढ़ना तय है क्योंकि इनमें उन निजी अस्पतालों में हुई मौतों का आंकड़ा शामिल नहीं है जिन्होंने अभी तक पूरा आंकड़ा नहीं भेजा है। इनमें राज्यभर के छोटे-बड़े शहरों के निजी अस्पतालों के अलावा राजधानी पटना के अस्पताल भी शामिल हैं। पटना के सिविल सर्जन ने 28 निजी अस्पतालों को पत्र लिखकर तीन दिन के भीतर अर्थात 11 जून तक मृतकों के पूरे आंकड़े भेजने के लिए कहा है। लेकिन अभी सारे आंकडे पहुंचे नहीं हैं। मुख्य रूप से कोरोना की दूसरी लहर में अप्रैल-मई 21 में हुई मौतों के आंकड़ें दर्ज नहीं हुए हैं।                                                                                                 … गांवों में टीकाकरण
पटना हाईकोर्ट ने कोरोना मामले पर सुनवाई करते हुए 11 जून को मृतकों के इस आंकडे पर असंतोष जताया। अदालत ने कहा कि कोरोना मृतकों का आंकड़ा इकट्ठा करने में अधिकारियों की ओर से हुई त्रुटि एक गंभीर मामला है। उसने जन्म और मृत्यु के आंकड़े पारदर्शी तरीके से रखने का ठोस व्यवस्था करने का निर्देश दिया। एक्टिविस्ट चिकित्सक डॉ शकील ने कहा कि सरकार ने पहले केवल सरकारी अस्पतालों में हुई मृत्यु के आंकड़ों को प्रचारित किया। उसने सरकारी चिकित्सा व्यवस्था से बाहर हुई मौतों का कोई हिसाब नहीं रखा। इसतरह वास्तविक संख्या इससे तीन-चार गुना ज्यादा तो होगी ही।

कोरोना से मृत्यु के आंकड़े सही नहीं होने के कुछ तकनीकी कारण भी है। जैसे जांच का ही कम होना, जांच की रिपोर्ट का मृत्यु के बाद आना, जांच-रिपोर्ट में कोरोना निगेटिव बताया जाना जबकि मरीज में कोरोना के सारे लक्षण कोरोना का होना इत्यादि। इसतरह के कई मामले सामने आए हैं।
फेफड़े के गंभीर संक्रमण की वजह से सीतामढ़ी की सुमनरानी की मृत्यु नालंदा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल में 21 मई को हुई जो कोरोना के इलाज के लिए नामित अस्पताल है। पर उनका नाम कोरोना मृतकों की सूची में नहीं है क्योंकि आरटी-पीसीआर जांच की रिपोर्ट मृत्यु के दो दिन बाद आई और उस रिपोर्ट में उन्हें कोरोना निगेटिव बताया गया है। परन्तु सीटी-स्कैन में उनके फेफड़े में बेहद गंभीर संक्रमण का पता चला। इसलिए उनका इलाज कोरोना के प्रोटोकाल के अनुसार ही हुआ। सीतामढ़ी में एक सरकारी हाईस्कूल में विज्ञान शिक्षक सुमनरानी को तेज बुखार और खांसी हुई, फिर अत्यधिक कमजोरी हो गई, स्थानीय चिकित्सकों के इलाज से सुधार नहीं होने पर उन्हें पटना, नालंदा मेडिकल कालेज व अस्पताल ले जाया गया। बाद में उन्हें सांस लेने में तकलीफ और बेचैनी होने लगी। सभी लक्षण कोरोना के हैं, कोराना के लिए निर्धारित दवाएं ही दी गई, पर कोई सुधार नहीं हुआ। और उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के दो दिन बाद आरटी-पीसीआर जांच रिपोर्ट आया तो वे कोरोना निगेटिव थी।                                                                    … गांवों में टीकाकरण
दूसरा मामला मुजफ्फरपुर जिले के एक किसान राजेश राय का है जिन्हें बुखार, खांसी और बदन में दर्द की शिकायत हुई, प्रखंड स्तर पर सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र में हुई रैपिड एंटीगन टेस्ट में कोराना निगेटिव आया। उनका इलाज स्थानीय झोलाछाप चिकित्सक करते रहे। तीन दिन बाद उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी। उनका परिवार उन्हें पास के निजी अस्पताल में ले गए जहां उनके शरीर का ऑक्सिजन स्तर घटकर 50 हो गया। डाक्टरों ने उन्हें मुजफ्फरपुर ले जाने के लिए कहा, पर रास्ते में उनकी मृत्यु हो गई। उनका नाम भी कोरोना मृतकों में नहीं शामिल है क्योंकि वे कोरोना पाजिटिव नहीं थे। इसतरह के मामले राज्यभर में हैं, उनका पता लगाना सरकारी तंत्र के लिए भी कठिन होगा।
सरकार ने जिला स्तर पर दो विशेषज्ञ समितियों का गठन किया है जिसमें सिविल सर्जन, अतिरिक्त मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी और एक वरिष्ठ चिकित्सा पदाधिकारी के अलावा मेडिकल कालेज असपताल के प्रिंसिपल, अधीक्षक और मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष को रखा गया है। इस समिति को कोरोना के मृत्यु का सही आंकडे की छानबीन करनी है।                                  … गांवों में टीकाकरण
उल्लेखनीय है बिहार में सरकारी अस्पतालों की कमी, अस्पतालों में आईसीयू,आक्सिजन, वेटिलेटर इत्यादि की कमी की वजह से ढेर सारे मरीज घर पर ही रहे या एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल की ओर दौड़ लगाते रहे। इसमें रास्ते में एंबुलेंस में या अस्पताल के बाहर उनकी मृत्यु होती रही। इनकी गिनती कैसे होगी, यह भी एक समस्या है।

इन सब के बावजूद कोरोना से लड़ने के लिए बिहार सरकार और प्रदेश की पंचायत सरकार ने पूरी तरह से कमर कस लिया है। तूफान से उपजी परिस्थिती और आगामी दिनों में होने वाले बाढ़ के मद्देनजर सरकार अधिक से अधिक लोगों को टीकाकरण के दायरे में लाकर उन्हें सुरक्षित करना चाहती है। यही कारण है कि हर स्तर पर टीकाकरण अभियान काफी तेजी से चल रहा है और लोग बढ़ चढ़कर इसमें हिस्सेदारी कर रहे हैं।                                                                                                              … गांवों में टीकाकरण

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