इन दिनों हरियाण एक फैसले पर पूरे देश में बहस चलने चल रही है अदालत का भी दरवाजा खटखटाया गया है ।
हरियाणा विधानसभा ने बहुमत से यह प्रस्ताव पारित किया कि पंचायत चुनाव लड़ने के लिए आप को न्यूनतम योग्यता की आवश्यकता है. हरियाणा पंचायती राज (संशोधन) बिल ने पहले से चले आ रहे पंचायती राज अधिनियम को संशोधित कर दिया है और अब कुछ महिनों में हरियाण में होनेवाले पंचायत चुनावों के लिए शैक्षिक योग्यता की शर्त तथा घर में टॉयलेट होने को अनिवार्य बनाया है….
अनुसूचित जातियों एवं महिलाओं के लिए छठवीं-सातवीं की योग्यता तथा सामान्य श्रेणी के लिए हाइस्कूल को अब पंचायत प्रमुख के पद के लिए अनिवार्य बनाया गया है, जबकि साधारण पंच के लिए अनुसूचित जातियों/महिलाओं के लिए पांचवीं कक्षा की योग्यता तय की गयी है.
प्रस्तुत कानून बनाने के पहले हरियाणा सरकार ने आदेश जारी किया था, तो उसे अदालती चुनौती दी गयी थी और पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट ने सरकार के इस आदेश पर रोक लगा दी थी. अब उस अदालती बाधा को दूर करने के लिए ही बिल लाया गया है.

एक क्षेपक के तौर पर बता दें कि इस मामले में हरियाणा को अग्रणी नहीं कहा जा सकता. इसके पहले राजस्थान सरकार ने ऐसे नियमों का ऐलान कर दिया था और इसके आधार पर वहां चुनाव भी संपन्न हो चुके हैं.
फिर भी हर कोई अपना अपना तर्क दे रहा है…..कोई इसे गरीबों और वंचितों को पंचायत चुनाव से बाहर करने की साजिश बता रहा है तो कई लोग इसे जातिगत नजरीए से जोड़ रहे है। तो कोई इसे निरक्षरों को पंचायत से बाहर करने की साजिश बता रहा है .. इस पर बहस होनी भी चाहिए ……क्योंकि विकास को अमली जामा पहनाना इसी जन संसद में होता है। दिल्ली की संसद तो केवल इसकी रूपरेखा तैयार करती है और कानून बनाती है।
अकसर सुनने में आता है कि पंचायतों में लाखों रुपये का फंड आता है और उसमें गबन की शिकायत आती है. ऐसे मामलों में तहकीकात करने पर चुने हुए प्रतिनिधि यही तर्क देते हैं कि चूंकि वह शिक्षित नहीं हैं, और किस कागज पर उनसे अंगूठा लगवाया गया, इसको वे पहचान नहीं सके…..और भी बहुत सारे मामले आते रहते हैं पर हानि तो उस पंचायत के लोगों की ही होती है…..विकास को अमली जामा पहने में बाधा तो होती है । हम लाख उपर के तंत्र को दोष दे लें पर पंचायतों में सुधार लाये बिना विकास और प्रगति की कलपन नही हो सकती।
इसलिए बहस तो होनी ही चाहिए । पर बहस में कुछ सार्थकता भी होनी चाहिए । बहस ये नही है निरक्षरों को बाहर करने की साजिश है बहस ये होनी चाहिए कि पंचायत से निरक्षरता को बाहर भगाना चाहिए । मुखिया और सरपंच लोग चुनाव जीतते ही बेलोरो और स्कॉरपियो खरीदने का होर लगा देते हैं तो क्या वे साक्षर नही हो सकते । वैसे भी ये जन प्रतिनिधि देश में सर्व शिक्षा अभियान के वाहक हैं । जब खुद ही साक्षर नहीं होंगें तो बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक कैसे करेंगे।
~ चंदन कुमार