शहरीकरण के शोर में दिल्ली के तालाब धीरे-धीरे अपना वजूद खोते जा रहे हैं। कुछ सालों पहले तक जिन तालाबों,पोखरों और बावड़ी में लबालब पानी भरा होता था आज उसमें से अधिकांश सूखे पड़े है। अनधिकृत कॉलोनियों से निकलने वाले सीवेज के गंदे पानी और कूड़ा तालाबों में भर गए हैं। जिससे उनके अस्तित्व पर ही ग्रहण लग गया है। सूखे तालाबों पर बिल्डर और भूमाफियाओं के साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण और अन्य सरकारी एजेंसियां अतिक्रमण करके कंक्रीट के जंगल उगा रहे हैं। जिसके कारण दिल्ली में तालाबों की संख्या दिनोंदिन कम होती जा रही है।
दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग के दस्तावेजों के अनुसार राजधानी में कुल 1012 तालाब हैं। लेकिन हाईकोर्ट में दिए अपने हलफनामें में राज्य सरकार ने स्वीकार किया है कि राजधानी में अब केवल 629 तालाब ही सही स्थित में हैं। सैकड़ों तालाब अतिक्रमण के शिकार है। कई तालाब तो अपना वजूद खो चुके है। जिसके कारण उन्हें चिहिंत ही नहीं किया जा सकता है। दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग के ‘पार्क एंड गार्डेन सोसायटी’ के आंकड़ों पर विश्वास करें तो तालाबों पर अतिक्रमण की तस्वीर बहुत भयावह है। राजस्व विभाग के दस्तावेजों के आधार पर इस विभाग ने अपने सर्वेक्षण में अधिकांश तालाबों को बदहाल अवस्था में पाया। सोसायटी अपने सर्वे में 905 तालाबों का ही भौतिक सत्यापन कर सकी। 107 तालाबों को चिहिंत नहीं किया जा सका। क्योंकि उन तालाबों पर अब कॉलोनियां आबाद हैं। जबकि 70 तालाबों पर आंशिक रूप से अतिक्रमण तो 98 तालाबों पर पूरी तरह से अतिक्रमण किया जा चुका है। वहीं पर विभिन्न सरकारी विभागों ने अतिक्रमण को कानूनी जामा पहनाते हुए 78 तालाबों पर निर्माण करके उनके अस्तित्व पर कंक्रीट का आलीशान जंगल खड़ा कर दिया है। तो 39 तालाबों पर अवैध रूप से निर्माण किया गया है।
राजधानी में तालाबों की स्थिति का जिलेवार विश्लेषण करने पर पता चलता है कि आधुनिक और पॉश कहे जाने वाले इलाकों में तालाबों का अस्तित्व खतरे में है। पार्क एंड गार्डेन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक ईस्ट जिले में कुल 54 तालाब राजस्व दस्तावेज में दर्ज है। लेकिन भौतिक सत्यापन में दो तालाबों का पता नहीं किया जा सका है। जबकि 25 तालाब सूखे, 3 पर अतिक्रमण और 19 तालाबों पर वैध और अवैध निर्माण हो चुका है। नार्थ ईस्ट जिले के 49 तालाबों में से 2 के अस्तित्व का कोई निशान नहीं मिला । जबकि 2 पर अतिक्रमण और 9 पर निर्माण किया जा चुका हैं। नार्थ जिले में कुल 156 तालाब दर्ज हैं। जिसमें से 7 अस्तित्व विहीन हो चुके हैं। पार्क एंड गार्डेन विभाग की टीम कड़ी मशक्कत के बाद भी उन तालाबों को नहीं तलाश सकी। जबकि 49 तालाबों पर अतिक्रमण होता रहा और प्रशासन की नींद नहीं टूटी। 8 तालाबों पर बस्तियां बसा दी गयी है। जिसमें से तीन अवैध और 5 वैध की श्रेणी में शामिल है। इसी तरह से नार्थ वेस्ट जिले के सरकारी रिकॉर्ड में 166 तालाब दर्ज है। जिसमें से प्रशासन 7 तालाबों की निशानदेही नहीं कर सका है। यानी अब उन पर बस्तियां बस गयी हैं। 23 तालाबों पर अतिक्रमण और 11 पर निर्माण हो चुका है। साउथ दिल्ली का नाम राजधानी के पॉश इलाकों में शामिल है। लेकिन पॉश कॉलोनियों के बाशिंदे भी जलाशयों पर कब्जा करने से नहीं चूके। जिसके कारण 120 तालाबों में से 12 का अस्तित्व ही मिट गया है। इस क्षेत्र में 29 पर अतिक्रमण और 28 तालाबों पर वैध और अवैध निर्माण करके उनक ो सदा के लिए कंक्रीट के जंगल में बदल दिया गया। साउथ ईस्ट के 39 तालाबों में से 28 तालाबों का अस्तित्व मिट चुका है। जबकि 2 पर अतिक्रमण और 5 पर कॉलोनियों के बस जाने के बाद अब सिर्फ 4 तालाब ही बचे हैं। साउथ वेस्ट दिल्ली में तालाबों की संख्या सबसे अधिक 266 है। जिसमें से 21 तालाब अस्तित्वहीन, 36 पर अतिक्रमण और 16 पर बस्तियां आबाद हो चुकी हैं। वेस्ट जिले के 75 तालाबों में से 5 का कोई पता नहीं चल सका है। जबकि 21 अतिक्रमण की शिकार हैं। 5 तालाबों पर प्रशासन ने कानून और 5 पर भूमाफियाओं ने कब्जा करके कॉलोनियां बसा दी हैं। सेंट्रल दिल्ली के 25 तालाबों में से 4 अस्तित्व विहीन हो चुके हैं। नई दिल्ली क्षेत्र के राजस्व रिाकॅर्ड के मुताबिक तालाबों की संख्या 62 है। इसमें से 17 तालाब लुप्त हो चुके हैं। 8 तालाबों पर अतिक्रमण और 7 तालाबों पर निर्माण हुआ है। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि दिल्ली सरकार के पार्क एंड गार्डेन विभाग के सर्वेक्षण में इसका कहीं जिक्र नहीं है कि निर्माण वैध है या अवैध। जबकि अन्य जिले में जिन तालाबों पर वैध या अवैध निर्माण हुआ है। उसका उल्लेख किया गया है।
राजधानी में तालबों को उनके मूल स्वरूप में वापस लाने के लिए संघर्ष कर रहे विनोद कुमर जैन कहते हैं कि, ”राजधानी के अधिकांश तालाब गंदगी,कूड़ा,अतिक्रमण और निर्माण के कारण धीमी मौत मर रहे हैं। यदि तालाबों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो एक दिन दिल्ली को भयावह रूप से जलसंकट का सामना करना पड़ेगा। राजधानी में यमुना की दुर्दशा पर तो बात होती है। लेकिन अधिकांश लोगों को पता ही नहीं है कि शहर के तालाबों,झीलों और बावड़ी किस दशा में हैं। ”
जैन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका करके राजधानी के तालाबों को संरक्षित करने की फरियाद की है। न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद यह सामने आया कि राजधानी के आधे तालाब गंदगी और अनधिकृत निर्माण के कारण समाप्त हो चुके है। न्यायालय के आदेश पर सरकारी अमला तालाबों को संरक्षित करने में लगा है। लेकिन सरकार के संरक्षण के तरीके पर पर्यावरणविद सवाल उठाने लगे हैं। जैन कहते हैं कि, ‘डीडीए जैसी संस्थाएं तालाब को बचाने के लिए जिस नीति पर काम कर रही हैं वह और खतरनाक है। तालाबों और झीलों के किनारे पार्क बनाने से वे सूख रहे हैं। मसूदपुर का तालाब इसका उदाहरण है। जिसके किनारे पार्क बनाने के बाद वह सूख गया। क्योंकि पक्का निर्माण से पानी के स्रोत सूख गए।”
राजधानी के सीवेज और कूड़ा के लिए सही व्यवस्था न होने का खामियाजा भलस्वा झील भुगत रहा है। यह झील 50 हेक्टेयर में फैला था। लेकिन आज वह गंदगी से भर गया है। दिल्ली नगर निगम क ा कूड़ा वहां डंप होता रहा है। हौज खास तालाब में जलकुंभी भर गयी है तो नीला हौज खास झील भी उपेक्षा और बदहाली के कारण धीमी मौत मरने को अभिशप्त है। कड़कड़डूमा झील से यमुना का पानी रिचार्ज होता रहा है। लेकिन प्रशासन ने इस झील को अंबेडकर पार्क में बदल दिया है। पूर्वी दिल्ली के खिचड़ीपुर में 1875 वर्गमीटर का एक तालाब राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है। दिल्ली विकास प्राधिकरण का उस पर मालिकाना हक है। लेकिन यह तालाब अतिक्रमण की चपेट में है। तालाब के बगल से गुजरने वाली सड़क और नगर निगम के सकूल ने इसके फैलाव को काफी कम कर दिया है। अब डीडीए यहां पर स्मृति वन बनाने का ऐलान किया है। राजधानी में तालाबों पर बिल्डर और भूमाफिया की ही वक्र दृष्टि नहीं है। डीडीए, एमसीडी और अन्य सरकारी संस्थाएं भी तालाबों क ी जमीन हड़पने की नीति पर चल रहे हैं। कल्याणपुरी में तो एक तालाब के अंदर से ही मेट्रो लाइन गुजर रही है। तालाब में मेट्रो पिलर बन रहा है। स्थानीय नागरिकों और पर्यावरणविदो के विरोध के बावजूद डीएमआरसी पर कोई असर नहीं हो रहा है। तालाबों के लिए कानूनी लड़ाईं लड़ रहे वकील अरविंद साह कहते हैं कि, ‘1990 के बाद दिल्ली में आवासीय क्षेत्र बढ़ता जा रहा है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में तालाब गंदगी और अतिक्रमण के शिकार हो रहे हैंं।’
दिल्ली में तालाबों पर हो रहे अतिक्रमण और उनके वजूद पर खतरे को देखते हुए गैर सरकारी संस्था ‘फोरम फॉर ऑर्गनाइज्ड रिसोर्स कंजरवेशन एंड इन्हेंसमेंट’ (फोर्स) ने एक अध्ययन किया है। ‘सेनिटेशन वीआंड सीवर्स एंड मैपिंग ऑफ वाटर बॉडीज’ प्रोजेक्ट के तहत हुए अध्ययन में यह पता लगाने की कोशिश की गयी है कि दिल्ली के पुनर्वास कॉलोनियों और तालाबों में क्या कोई संबंध है? जर्मन संस्था ‘जीआईजेड ‘ के सहयोग से संस्था ने यह काम किया।
फोर्स की अध्यक्ष ज्योति शर्मा कहती हैं कि हमें ऐसा महसूस होता था कि दिल्ली की पुनर्वास कॉलोनियां तालाबों या उसके आसपास बसायी गयीं हैं। दूसरा,लंबे समय से पानी पर काम करते हुए मैं इसकी सच्चाई जानना चाहती थी कि क्या आज भी तालाबों का उद्देश्य बचा है? वह कहती हैं कि दरअसल,तालाबों का उद्देश्य वर्षा जल को इकट्ठा करना था। जिससे भूजल का स्तर बना रहे और पानी रिचार्ज होता रहे। तालाबों और बावड़ी का पानी ही पहले पीने और सिचाईं के काम आता था। आधुनिक विकास के मॉडल में तालाब और पानी के परंपरागत स्रोत उपेक्षित हो गए। विकास के अंधी दौड़ में महानगर,शहर और गांव परंपरागत चीजों को हेय दृष्टि से देखने लगे। जिसके कारण दिल्ली ही नहीं पूरे देश में तालाब,कुएं,बावड़ी और झील बेकार हो गए। शहरों में तालाबों का इस्तेमाल कॉलोनियों से निकलने वाले गंदे पानी को इकट्ठा करने में किया जाने लगा। कॉलोनियों के सीवेज और कूड़ा तालाबों में जाने लगा। धीरे-धीरे तालाब गंदगी के केंद्र बन गए। जिसे हर कोई हटाने के लिए सोचने लगा।
इसके बाद फोर्स ने दिल्ली में जितने भी तालाब और पुनर्वास कॉलोनियां हैं सबकी ज्योग्राफिक इंफारमेशन सिस्टम (जीआईएस) मैपिंग करायी। शुभम मिश्र ने 629 तालाबों को चिंहित करके जीआईएस मैपिंग की। संस्था ने राजधानी के छह कॉलोनियों का चयन करके अध्ययन किया। जिसमें मंगोलपुरी, मंगलापुरी, साबदा घेवड़ा, कल्याणपुरी, मदनपुर खादर और जहांगीरपुरी को अध्ययन के लिए चयनित किया गया। गौरतलब है कि ये सब अनधिकृत कॉलोनियां है। आवासीय योजना के अनुसार किसी भी कॉलोनी के बसने के पहले वहां पर पीने का पानी, सीवर और बिजली की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए। लेकिन दिल्ली के अधिकांश अनधिकृत कॉलोनियों के उनके अस्तित्व में आने के 10 से 26 साल बाद सीवरलाइन पड़ा। जिसके कारण उस क्षेत्र के अधिकांश तालाब सीवर के पानी डंप करने के लिए इस्तेमाल किए जाने लगे। इन सब क्षेत्रों में तालाब सीवरेज और कूड़ा डालने के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। संस्था ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि अधिकांश पुनर्वास एवं अनधिकृत कॉलोनियां तालाबों या उसके आसपास ही बसाए गए हैं। कुछ कॉलोनियां तो तालाबों में ही बसी है। जिसके कारण वहां आज भी सीवरेज की समस्या बनी हुई है। सीवर हमेशा ऊ पर से नीचे की तरफ जाता है। लेकिन अनधिकृत कॉलोनियां पहले से ही नीची जमीन पर बसी हैं। इसलिए वहां पर आज भी सीवरलाइन बिछाना बड़ा मुश्किल काम साबित हो रहा है। ज्योति शर्मा कहती हैं कि, ‘दिल्ली के अधिकांश तालाब सूखे या अतिक्रमण के शिकार हैं। दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग के अधीन तालाबों की स्थिति सही है। क्योंकि वे सब गांव में स्थित हैं। डीडीए के अधीन तालाब दुर्दशाग्रस्त है।’
नदी बचाओ आंदोलन से जुड़े कपूर सिंह छिकारा कहते हैं कि,’ दिल्ली में तालाब, बावड़ी, कुएं, ढेकली और नहरों का जाल बिछा था। दिल्ली में पहली नहर 1860 में बनी थी। तब यह पंजाब राज्य का एक सूबा हुआ करता था। तालाबों के पानी का उपयोग सिचाईं में होता था। तालाबों में इकट्ठा वर्षाजल यमुना के पानी को रिचार्ज करता था।’ लेकिन सरकार की उदासीनता ने तालाबों को गंदगी इकट्ठा करने का केंद्र बना दिया है। अतिक्रमण को बढ़ावा दिया है। आज दिल्ली पेयजल के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सीमा में पानी के परंपरागत स्रोत सूख रहे हैं। जिसके कारण राजधानी के कई इलाकों में भूजलका स्तर गिरता जा रहा है।

