
अनुशक्ति सिंह
कुसुमा बड़ी उदास है.. कह रही है कि “कोनो रास्ता नहीं दिखा था तो इ बिज़नस में आई थी. देश–विदेश का क्लाइंट लोग था. एक साल में 5/6 लाख का कमाई तो हो ही जाता था. लेकिन सरकार ने अब इस बिज़नस पर भी रोक लगा दिया है तो पता नही क्या करेगी.” कुसुमा ही नही उसके साथ आई रुनु और मीनकी भी तो इसी के सहारे घरबार बनाने और बसाने का सोचा था. लेकिन सरकार तो जैसे उसके अरमानो पर पानी फेरने के लिए ही बैठी है.
पिछले दिनों सरकार ने लगभग ६३ अरब रूपये के एक व्यापार पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर के रोक की बात की है … किस चीज़ का व्यापार है ये? क्यों सरकार को इस पर रोक लगाने की ज़रूरत महसूस होने लगी? इस व्यापार को सरोगेसी कहते हैं… सरोगेसी जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘कोख को किराए पर देना.’
नहीं ‘चोरी–चोरी चुपके चुपके’ फिल्म की तरह नहीं. आजकल सब आधुनिक हो गया है… लेकिन विज्ञान अभी इतना भी उत्तर आधुनिक नहीं हुआ है कि बच्चे के जन्म के लिए माँ की आवश्यकता ही न हो. तो क्यों न फायदा उठाया जाए विज्ञान के विकास का और उन लोगों की मजबूरी का जो अपने और अपने बच्चे की बेहतर जिंदगी के लिए अपने कोख को किराए पर लगाने से भी पीछे नहीं हटते हैं.
बहुत फलता फूलता व्यापार है. गुजरात में बेबी फैक्ट्री है तो झारखड से लड़कियां और औरतें आयातित होती हैं. माँ बनने बनाने का व्यपार, बेचने वाले ढेर सारे हस्पताल (बेबी फैक्ट्री) और खरीदने वाले देश–विदेश के लोग.
माँ बनना – औरत होने का सबसे सुन्दर और शक्तिशाली रूप – लेकिन जब इसी रूप का व्यवसायीकरण हो जाए तो शोषण की शुरुआत हो ही जायेगी. और शायद इसी शोषण को भांपते हुए सरकार ने हलफनामा दायर किया है. क्या–क्या लिखा है इस हलफनामे में?
एक नज़र –
1. सरकार सरोगेसी (किराए की कोख) के व्यवसायीकरण के पक्ष में नहीं है.
2. सिर्फ़ परोपकार के उद्देश्य से ही किराए की कोख को अनुमति दी जाएगी वह भी सिर्फ़ ज़रूरतमंद भारतीय शादीशुदा निसंतान के लिए. इसके लिए कानून एक स्थापित एक संस्था से अनुमति लेनी होगी.
3. सरकार सरोगेसी की व्यावसायिक सेवा पर रोक लगाएगी और ऐसा करने वालों को सज़ा देगी.
4. सिर्फ़ भारतीय दंपत्तियों के लिए ही सरोगेसी की अनुमति होगी.
5. कोई विदेशी भारत में सरोगेसी की सेवाएं नहीं ले सकता.
6. सरोगेसी से जन्मे शारीरिक रूप से अक्षम बच्चे की देखभाल का ज़िम्मा नहीं लेने वाले माता–पिता को सज़ा दी जाएगी.
7. इस कानून को तैयार करने में सरकार को कुछ समय लगेगा.
इतने लम्बे–चौड़े हलफनामे की आखिर सरकार को क्यों ज़रूरत पड़ी. अगर इस सवाल का जवाब चाहिए तो आपको बीबीसी की एक पुरानी रपट देखनी पड़ेगी जो बेबी फैक्ट्री के नाम से मशहूर गुजरात के आणंद शहर के एक आइवीऍफ़ क्लिनिक के नियम कानून को देखकर पता चल जाएगा. इस क्लिनिक के नियमों के अनुसार –
- सरोगेट माताएं एक डोरमेट्री में रहती हैं…
- १० माताएं एक कमरा शेयर करती हैं
- डॉर्मेट्री में गर्भावस्था के दौरान सेक्स वर्जित है. यहां के नियम के अनुसार, किसी भी दुर्घटना के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है, न अस्पताल, न डॉक्टर और न संतान चाहने वाला दंपति.
- अगर सरोगेट माता जुड़वां बच्चों को जन्म देती है तो उसे करीब सवा छह लाख रुपए मिलता है और यदि पहले ही गर्भ गिर गया तो उसे करीब 38,000 रुपए देकर विदा कर दिया जाता है.
- बच्चा चाहने वाले दंपति से अस्पताल हर सफल गर्भवास्था के लिए करीब 18 लाख रुपए लेता है और इसमें से सिर्फ 5 लाख माता को मिलता है.
अब जानते हैं क्या कहना है आणंद के इस अस्पताल को चलाने वाली डॉक्टर नयना पटेल का सरकार के इस फैसले पर –
सरोगेसी में किसी भी महिला का शोषण नहीं होता क्योंकि सिर्फ व्यस्क महिलायें कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही गर्भ धारण करती है. सरकार के इस फैसले से मेडिकल टूरिज्म इन इंडिया और मेक इन इंडिया को बड़ा झटका पहुंचेगा, साथ ही राजस्व का भी नुक्सान होगा.
अब कुसुमा की सुने तो उसकी रोजी–रोटी पर लात पड़ गयी, डोक्टर पटेल को मेक इन इन्डिया की परवाह है और केंद्र की सरकार इसे शोषण के खिलाफ अपना कदम बता रही है. अब क्या कहा जाए इसे? रोक मातृत्व के व्यवसायीकरण पर या फिर नुकसान अरबों का …