अनुशक्ति सिंह
रुनिया माय कहाँ जा रही हो?
“भोट देने जा रहे हैं दीदी…”
बनगामा वाली भी भोट देने जा रही है. सुदमिया की चाची और गोनर की कनिया भी साथ में आ रही है… गज़ब. पूरा महिला समुदाय उमड़ा हुआ है. हो भी काहे नहीं… इहाँ मुखिया के चुनाव में लोग जोर लगा देते हैं, अबकी तो विधान-सभा का चुनाव् होने वाला है. पिछले बार तो दिल्ली वाले राजा जी चुने गए थे. इस बार पटना वाले राजा बाबू का चुने जाने वाले हैं. खूब तहलका मचा हुआ है. दिख भी रहा है… जितना भी चरण पूरा हुआ है सब में वोटिंग बूथ पर महिला लोगों की लम्बी कतार देख कर मीडिया वाला ही नहीं नेताजी लोग भी भौंचक्क हुए पड़े हैं.
ऐसे समय में जब लोगों को वोट वाले दिन घर से बाहर निकालने की खूब कवायद हो रही है और सिर्फ ५४ फीसद पुरुषों ने वोट किया है उस वक़्त लगभग साठ फीसदी महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है. ये बिहार की महिलायें कब से इतनी जागरूक हो गयीं हैं कि अपना मत के बारे में जान गयीं हैं? जिस समुदाय को न किसी जाति में रखा, न किसी धर्म में, वो कब से इतनी बड़ी संख्या में वोट कब से करने लगीं? डाटा खंगाला जा रहा है… रिकॉर्ड चेक किया जा रहा है. हिसाब लगाया जा रहा कहीं फ्री साइकिल का कमाल तो नहीं है या फिर मुफ्त वाले स्कूटी का? वैसे किसी ने न रुनिया के माई से पूछा कि वो जब वोट डालने जा रही थी तो उसका घरवाला क्यों नहीं उसके साथ वोट डालने गया? सुदमिया की चाची और गोनर की कनिया से भी किसी ने उसके घर के मर्दों के बारे में नहीं पूछा… अगर पूछते भी तो क्या जवाब आता? कहाँ से आते इन घरों से मर्द वोट डालने को, जब ये लोग गाँव-शहर तो छोडिये राज्य में भी नहीं होते. यहाँ गौरतलब ये है कि प्रवासी बिहारियों की एक बड़ी संख्या राज्य से बाहर है और इसमें ज्यादा तादाद उनलोगों की है जो रोजगार के सिलसिले में अपने गाँव घर को छोड़ कर गए हैं. कहाँ से और कैसे वोट कर पायेंगे? हर बार सरकार आती है, रोजगार के नए मौके मुहैया करवाने के वादे करती है लेकिन नतीजा वाही, ढ़ाक के तीन पात. न नये रोजगार के अवसर आते हैं, न पलायन रुकता है. फिर वोट करने वाले लोग आयेंगे तो कैसे और कहाँ से? ऐसा नहीं है कि राज्य से बाहर रोजगार तलाश रहे इन बिहार निवासियों की इच्छा चुनाव का हिस्सा बनने और वोट डालने की नहीं होती लेकिन ‘क्या करें’ और ‘कैसे करें’? इसलिए उनके घर की औरतों ने जिद ठानी है अपना प्रतिनिधि चुनने की जो उनकी समस्या सुनसुन सके और रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा कर सके ताकि ये महिलायें अपने पति/बेटे और भाइ को बिना त्यौहार के भी घर में देख सकें.
वैसे छठ आने वाला है, रेलगाडियों में भीड़ बढ़ने लगी है. नेताजी लोग उम्मीद कर रहे हैं कि अब ज्यादा वोट उनकी झोली में गिरेगा. हो सकता है उनकी उम्मीद फल जाए… पुरुषों का मत प्रतिशत भी बढ़ जाए लेकिन यहाँ महिला वोटरों की बढती तादाद के पीछे निर्णायक भूमिका निभाने वाले एक दूसरे पक्ष को भी नज़रअंदाज नही किया जा सकता है… ये है इन महिलाओं के अपने पसंदीदा नेताजी के प्रति समर्थन. अब हमारी पड़ोस वाली सलायगढ़ वाली काकी ‘मोदी सरकार’ को ही वोट करेगी क्योंकि उन्होंने उसका अकाउंट खुलवाया है जबकि मलार वाली चाची उनकी बेटी को साइकिल देने वाले तीर छाप वाली पार्टी को… महिलायें सच में जागरूक हो रही हैं. अपना भला बुरा समझ रही हैं. और आंकड़े भी उनकी बढती भागीदारी की गवाही देते हैं…
फोटो : अजय कुमार
