अनुशक्ति सिंह
कौने दिशा में लेके चला रे बटोहिया,
ठहर ठहर, सुहानी सी डगर,
ज़रा देखन दे, ज़रा देखन दे …
30 साल पहले जब रामफल की बीवी नोनैती वाली नदी के इस पार अपने ससुराल आई थी तो बिलकुल रूपा-गूंजा सी किलक रही थी… ज्यों-ज्यों नाव नदिया की धारा को चीरते हुए उसे अपने गंतव्य के करीब ला रहा त्यों-त्यों उसको सहरसा के मीरा सिनेमा में २ साल पहले देखा हुआ नदिया के पार वाला ये गाना याद आ रहा था… धार को पार कर ससुराल. शुरू-शुरू में तो बड़ा उत्साह था कि ‘नाह पर चैध के ओये पार जैबे’ लेकिन जब लौटते साल ही बरसात में उमड़ी नदी ने उसके जवान देवर को लील लिया तो सारा उत्साह कहीं काफूर हो गया… तब से जितनी बार भी उसका या घर के किसी और जन का गाँव से बाहर जाना होता है, कमला/कोसी मैया को सौ कबूला भख्ती है… सुन तो अपने बियाह के साल से ही रही है कि इस बार पुल बन जायेगा …लेकिन तीस बरस बीत गए, नोनैती नबकी कनिया से बुढिया हो गयी है. दो बरस पहले बेटा का भी बियाह कर दिया है लेकिन पुल अब तक नही बना… वो तो भला हो कि बेटा रहता सहरसा में है नहीं तो नाह से आने-जाने वाले इस गाम में कोई बाप अपनी बेटी भी नहीं बियाहना चाहता है… अ जब भी कोई गाम से बाहर आता-जाता है, नोनैती वाली का कलेजा भी तो धुक-धुक करता रहता है … एक ठो नाह और उस पर दुनिया भर का लोग … कहीं पलटिये गयी तो… ई नाह वाला सब भी तो पैसा कमाने के लिए एक ही बार में बोझा लाद देता है. गरीब-गुरबा के जान का मोह किसको है… न तो सरकार को पुल बनाने का सूझता है न ही नाव वाला कम आदमी लादता है. खाली भोट के समय में कह के जाता है सबठो कि “माय जी वोट हमरे देबे, अबरी त पुला बैन क रहते’.
चमकदार पटना, दमक्दार मुख्यमंत्री बाबू, ओहदेदार नेता और अधिकारी लोग… बिहार में इतने साल में खूब विकास हुआ है. राज्य के कोने-कोने को जोड़ दिया गया है… पुल और सड़क का जाल बिछा दिया गया है… लेकिन जब सच में ऐसा है तो फिर ‘नोनैती वाली’ कहाँ से आ गयी? क्यों रह गया उसका गाँव.. क्यों पुल के अभाव में जाती हैं जानें उसके गाँव जैसे कई गाँव में?
कहने को तो इतने दशक बीत गए हैं, और ज़माना कहाँ से कहाँ चला गया है लेकिन कोसी इलाके के कई गाँवों में जिंदगी जैसे ठहर सी गयी है. महानगरों में भले ही फ्लाई-ओवेरों का जाल सा बिछ गया है लेकिन इन जगहों पर लोग एक अदद पुल तक के लिए तरस गए हैं और जो पुल है भी तो, उसके न होने से ही जिंदगी ज्यादा सुरक्षित रहती.
अगर आंकड़ों का हिसाब किताब देखा जाए तो सिर्फ बिहार राज्य पुल निर्माण विभाग की वेबसाइट के अनुसार सिर्फ २०१५-१६ के वित्तीय वर्ष में ही राज्य सरकार ने कम से कम ९९२ करोड़ रुपयों की पुल निर्माण की परियोजना पारित की है.
इसी वेबसाइट पर उन पुलों का भी ज़िक्र है जिसका निर्माण “मुख्यमंत्री सेतु निर्माण योजना” के तहत कोशी प्रमंडल के तीनों सहरसा, सुपौल और मधेपुरा के भिन्न इलाकों में हुआ है,लेकिन उनकी आरसीसी से लेकर पहुँच पथ को भी जोड़ लिया जाए तो इन पुलों की कुल संख्या सिर्फ 14 है. नदियों और धाराओं से घिरे इस प्रमंडल के काफी हिस्सों में लोग आपस में जुड़ने के लिए अभी भी पुरातन तरीकों पर निर्भर हैं.
कहीं दुल्हनिया अभी भी नाव पर चढ़ कर ससुराल आती है तो कहीं बांस से बने चचरी पुलों का सहारा है और कई जगहों पर सरकार ने खुद को जुगाड़बाज साबित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है… हाँ, ये ज़रूर हो सकता है कि आगामी चुनाव में सरकार अपने इसी जुगाड़ की व्यवस्था का खूब दम भरते नज़र आये और जनता भी अंततः ये मानने के लिए तैयार हो जाए कि इससे ज्यादा उनके नसीब में नही है…
अगर आप कोसी के ग्रामीण इलाकों की सैर पर निकलें तो कहीं लोहे के काम चलाऊ पुल के सहारे नदी पार करते तो कहीं झूलते हुए पुल से गाडी को पास करवाने की कवायद करते हुए लोगों को देखने का नज़ारा आम हो जाता है. कभी कभी तो खुद भी भूल जायेंगे कि ये इक्कीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक है या बीसवीं शताब्दी का कोई शुरूआती साल… हाँ, बीच में बजने वाली मोबाइल की धुन ज़रूर आपके भ्रम को तोड़ सकती है.
छाया – अजय कुमार

