तंगहाली में खोता मतलब “बचपन” का
अनुशक्ति सिंह
हेरे विनोदवा, चलें न रे … उ खदैया में कैल रकेसबा के चैर टा काखोड़ अ दू टा सिंघी माछ मिलले रहे. अच्छा… चले चले… लेकिन माय त स्कूल जाय ले कहे रहे… की करभी स्कूल जाय के, मास्टर त रहते नै छै अ पैन बला खिचड़ी से बढ़िया काखोड़ के तरकारी, भात. माय कुछो नै कहतो… तू चले न.
हाँ, माँ सचमुच ही कुछ नहीं कहती… कहेगी भी कैसे विनोद्वा के लाये हुए माछ, डोका और कान्खोड़ से पेट तो पूरे परिवार का ही भर जाता है. स्कूल जाएगा भी तो क्या मिलेगा? मास्टर लोग सब तो रहता नहीं है और ऊपर से पनियाही खिचड़ी जिसमे न तो चावल होता है न दाल…
जहाँ नज़र उठा कर देखती है, क्या मिलाता है सिवा नंग-धडंग, पसलियाँ गिन लिए जाने की हद तक कुपोषित बच्चों के सिवा… विनोद्वा कुछ कमा कर या माछ ही मार कर लाएगा तो कम से कम पेट तो सबका भरेगा.
विनोद्वा की लगभग ऐसी ही एक कहानी को बयान करती तस्वीर

फोटो : अजय कुमार
ये तस्वीर किसी सुदूर अफ्रीकी देश की नहीं है. और, सरकार को इनको राहत पहुँचाने के लिए सोमालिया नहीं जाना पड़ेगा. ये तस्वीर गहमा-गहमी से भरे चुनाव के लिए तैयार बिहार के कोसी इलाके की है, जहाँ हर दूसरे दिन कोई न कोई वोट मांगने वाला अपने दल बल के साथ इन बच्चों के गरीब माँ-बाप का वोट मैनेज करने के लिए पहुँचता रहता है… लेकिन ‘जनता के विकास’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे इन वोट चाहकों में शायद ही किसी की नज़र इन बच्चों पर जाती है. बाकी पाठशाला और मध्याहन भोजन की पौष्टिकता की कहानी इनका शरीर खुद बता रहा है…
इस इलाके में विनोद्वा की माँ अकेली नहीं है अपने बेटे को स्कूल भेजने की जगह माछ मरने के लिए कहने वाली, अपने बेटे अकरम के साथ सब्जी बेचने वाली ‘सलमा’, 12 साल के बेटे को अगले दफे गाँव के लोगों के साथ कमाने के लिए दिल्ली भेजने को तैयार ‘कारी’ और घर-घर में काम करने वाली सुनितिया के माँ-बाप का भी यही कहना है। और शायद ऐसी ही कहानी है लगभग ग़रीबी रेखा के नीचे जिंदगी बसर करने वाले लगभग 32.7% प्रतिशत हिन्दुस्तानियों की। हाँ, गाहे-बगाहे एक आध अपवाद ज़रूर दिख जाते हैं जब कभी किसी मजदूर माँ-बाप के बच्चे आई.आई.टी जैसे संस्थानों में जगह पा लेते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि वर्तमान में भी 45 लाख(2011 की जनसँख्या गणना के अनुसार) से ज्यादा बाल-मजदूर हैं। और, भारत के कुल 44 करोड़ बच्चों में से अनुमानतः 40% कुपोषित हैं।
सच का एक पक्ष ये भी है कि देश के अधिकांश बच्चे विद्यालयों में नामांकित हैं लेकिन ठीक उसी वक़्त यह सच उस कटु-सत्य के नीचे दब जाता है जो ये बताता है कि इन बच्चों में आधे से ज्यादा बच्चे अपनी कक्षा में होने की जगह कहीं न कहीं काम पर होते हैं… हालाकिं 2006 का बाल-श्रम उन्मूलन कानून इस मज़दूरी को आपराध मानता है लेकिन इसका उपाय क्या है? दो जून की रोटी के गुलाम ये बच्चे क्या चुनना श्रेयस्कर समझेंगे, हँसते बचपन का खोखला नारा या फिर पेट भरने की सामग्री?
