भेदभाव से परेशान एक चौथाई महिलायें छोड़ देती हैं नौकरी: एसोचैम

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अपराजिता संतोष

8 मार्च अंतरर्राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण दिवस। लेकिन यह दिवस मात्र जलसा ही है। क्योंकि यदि जलसा नहीं होता तो महिलाओं के साथ भेदभाव का क्रम कब का रूक गया होता। ऐसा नहीं है कि वह घर से बाहर कदम बढ़ाने का साहस नहीं करती। जरूर करती है। लेकिन हर स्तर पर भेदभाव। नौकरी में, घर में, संबंधों में,वेतन में। हर स्तर पर उसे भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। और यदि नौकरी निजी क्षेत्र में हो तो असुरक्षा कई गुणा बढ जाती है। एसोचैम सोशल डेवलपमेंड फांउडेशन द्वारा किये गये एक सर्वे के मुताबिक एक चौथाई महिलाएं विशेष तौर पर वे महिलाएं जो कि निजी क्षेत्र में काम कर रही हैं, कई कारणों से अपना नौकरी छोड़ने को तैयार रहती हैं। किसी के लिए काम के घंटे परेशानी के सबब बने हुए हैं तो किसी के लिए देर तक काम करना परेशानी का कारण है। लैंगिक भेदभाव,कार्यस्थल पर प्रताड़ना,सुरक्षा की कमी,काम करने के खराब हालात,परिवार या फिर मां बनने के कारण,या उच्च शिक्षा पाने के लिए उन्हें नौकरी छो​ड़ना होता है।

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अंतरर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एसौचैम द्वारा किये गये सर्वे में यह कहा गया है कि ‘लगभग 40 फीसदी कामकाजी महिलायें अपने बच्चों के लालन पालन की वजह से नौकरी छोड़ देना चाहती है। फांउडेशन द्वारा 10 शहरों मे जैसे कि अहमदाबाद,बैग्लुरू,चंडीगढ़, दिल्ली एनसीआर,हैदराबाद,जयपुर,लखनउ,मुंबई, और पिछले 15 दिनो में 500 कामकाजी महिलाओ का सर्वे किया गया। इनमें से 200 कामकाजी मातायें थी। सर्वे के दौरान उनसे उनके कामकाज के विषय में पूछा गया। जो जवाब आया वो वास्तव में चौकाने वाले हैं, और महिलाओं के सशक्तिकरण की राह में फैली दुस्वारियों की वोर इशारा करती हैं ।

इस सर्वे के अनुसार लगभग 25 फीसदी महिलाएं किसी न किसी कारण से अपनी नौकरी छोड़ना चाहती हैं। इसका कारन है भेदभाव। नौकरी में, घर में, संबंधों में,वेतन में। हर स्तर पर उसे भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। किसी के लिए काम के घंटे परेशानी के सबब बने हुए हैं तो किसी के लिए देर तक काम करना परेशानी का कारण है। लैंगिक भेदभाव, कार्यस्थल पर प्रताड़ना, सुरक्षा की कमी, काम करने के खराब हालात, परिवार के हालात के कारण या फिर मां बनने के कारण,या उच्च शिक्षा पाने के लिए उन्हें नौकरी छो​ड़ना होता है।

नौकरी छोड़ने की इच्छा के पीछे सबसे प्रमुख कारण है लैंगिक भेदभाव और कार्यस्थल पर प्रताड़ना। इसके साथ ही ज्यादातर महिलाओं का यह माना है कि काम के घंटों के कारण उन्हें नौकरी छोड़ना होता है। इसके साथ ही जिन 200 माताओं का सर्वे किया गया उनमे से अलग अलग शेरोन की ८० माताएं मानती हैं की परिवार और बच्चों के साथ ज्यादा समय न बिता पाने की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला लिया।

कार्य स्थल पर प्रताड़ना की शिकायत करते हुए लगभग 30 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें कार्य स्थल पर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है। इसके साथ ही प्रमोशन में भेदभाव का सामना करना पड़ा, या फिर उन्हें कम दर्जे का काम दिया गया। इनमें से कई तो यह शिकायत भी करती हैं कि ज्यादातर मामलों में उनके द्वारा शिकायत किये जाने पर अधिकारियों द्वारा मामले को रफादफा करने का प्रयास किया जाता है,और उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है। इसके कारण उन्हें नीचा देखना पड़ा। करीब 30 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उन्हें कार्यस्थल पर शोषण झेलना पड़ा है। उन्हें पदोन्नति से वंचित किया गया और नीरस काम सौंपा गया।

इस सर्वे में शामिल ज्यादातर महिलाओं की शिकायत थी कि ज्यादातर संस्थायें जहां वे काम करती हैं, वहां भेदभाव या प्रताड़ना की शिकायत के निष्पादन के लिए कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं हैं, और नहीं कार्य स्थल पर महिलाओं को छेड़छाड़ या भेदभाव से बचाने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था है। उनकी शिकायत थी कि ज्यादातर नियोक्ता महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मसलों में बहुत ही काम चलाउ रूख अख्तियार करते है।

क्या कहता है विशाखा गाइडलाइन कानून eve-teasing newwwwwwwwwwwwwww

वर्ष 1992 में विशाखा नामक संस्था ने अन्य संगठनों के समर्थन से सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इस याचिका में कोर्ट से आग्रह किया गया था कि कामकाजी महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित कराने के लिए संविधान की धारा 14, 19 और 21 के तहत कानूनी प्रावधान किए जाएं। इस याचिका को विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान सरकार और भारत सरकार के मामले के तौर पर जाना गया।इस मामले में कामकाजी महिलाओं को यौन अपराध्, उत्पीड़न और प्रताड़ना से बचाने के लिए कोर्ट ने विशाखा दिशानिर्देशों को उपलब्ध कराया और अगस्त 1997 में इस फैसले में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की बुनियादी परिभाषाएं दीं। कोर्ट ने वे दिशानिर्देश भी तय किए, जिन्हें आम तौर पर विशाखा दिशानिर्देश के तौर पर जाना जाता है। इसके अनुसार हर कार्यस्थल जहां एक महिलाकर्मी भी हो, वहां शिकायत समिति बनाना अनिवार्य है। इसकी प्रमुख महिला ही होगी। कार्यस्थल पर महिलाओं के सम्मान की सुरक्षा के लिए वर्कप्लेस बिल 2012 भी लाया गया, जिसमें लिंग समानता, जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों को लेकर कड़े कानून बनाए गए हैं। यह कानून कामकाजी महिलाओं को सुरक्षा दिलाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन कानूनों के तहत यह रेखांकित किया गया है कि कार्यस्थल पर महिलाओं व युवतियों के सम्मान को बनाए रखने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं। अगर किसी महिला के साथ कुछ भी अप्रिय होता है तो उसे कहां और कैसे अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए ।

कार्यस्थल पर अपराध, सूचित नहीं करने पर प्रभारी भी अपराधी माना जाएगा
सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के औद्योगिक उपक्रमों और दफ्तरों में किसी महिला अधिकारी-कर्मचारी से छेड़छाड़, अनाचार, यौन शोषण का मामला सामने आने पर इसकी पुलिस को सूचना देने की जिम्मेदारी संबंधित स्थान के प्रभारी अधिकारी की होगी। भले ही ऐसे मामले में विभागीय कार्रवाई या दोनों पक्षों के बीच समझौता क्यों न हुआ हो, पुलिस को सूचना देना अनिवार्य होगा। ऐसा नहीं करने पर प्रभारी भी अपराधी माना जाएगा।

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