संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: गेहूं के शुल्क मुक्त आयात की इजाजत देने संबंधी केंद्र सरकार के फैसले पर स्वराज इंडिया के अंर्तगत चलाये जाने वाले जय किसान आंदोलन ने किसान विरोधी बताते हुए इस फैसले पर हैरानी जताई है। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि एक तरफ देश का किसान नोटबंदी के बावजूद मुश्किल परिस्थितियों में रबी फसल के बावग में लगा हुआ है, वहीं रबी की प्रमुख फसल गेहूं के आयात को शुल्क मुक्त किये जाने का यह फैसला गेहूं पर आयात शुल्क ख़त्म करना मोदी सरकार का एक और किसान विरोधी कदम है। इससे देश के किसानों की कीमत पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए मुनाफ़ा का रास्ता खुलेगा। इस फैसले का मतलब होगा गेहूं का भारी मात्रा में आयात, जिसका बड़ा फ़ायदा गेहूं व्यापार में शामिल कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होगा। करोडों भारतीय किसानों के लिए यह एक अप्रत्याशित झटका है जिसमें वो फसल के उचित मूल्य से वंचित हो जाएँगे। लगातार दो सूखे के बाद अभी बुआई के सीजन के बीच में किसानों पर यह हमला फिर से साबित करता है कि मोदी सरकार देश के इतिहास में अब तक की सबसे अधिक किसान विरोधी सरकार है।
क्या छुपा रही है सरकार
सितंबर में आयात शुल्क 20% से 10% करने का निर्णय और इसे शून्य कर देना समझ से परे है। सरकार का दावा है कि उसके पास पर्याप्त बफर स्टॉक है और पिछले साल के गेहूं की फसल भी बहुत अच्छी थी। इस साल भी मानसून अच्छा रहा और मौसम की स्थिति गेहूं के लिए उपयुक्त है। इस बार गेहूं की बंपर फसल होनी चाहिए। सरकार अपने निर्णय के बचाव में खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति को रोकने के लिए इसे एक अल्पकालिक उपाय के रूप में दिखा रही है। लेकिन इस पर कुछ सवाल उठते हैं – या तो सरकार को गेहूं उत्पादन के अपने स्वयं के डेटा और बफर स्टॉक पर विश्वास नहीं है, या सूखा राहत की नाकामी और नोटबंदी के असर को देखते हुए सरकार अच्छी बुवाई को लेकर आश्वश्त नहीं है, या फिर सरकार पहले से ही नोटबंदी से परेशान गरीब लोगों के लिए खाद्य मुद्रास्फीति की सम्भावना से डर रही है। किसी भी हाल में यह स्पष्ट है कि इस सरकार की सहानुभूति और राजनीतिक प्राथमिकता किसान के साथ नहीं है। ग्रामीण गरीब और विशेष रूप से किसान इस सरकार द्वारा किए गए विभिन्न प्रयोगों के लिए सिर्फ़ बलि का बकरा है।
तुरंत वापस लें फैसला
जय किसान आन्दोलन ने मांग किया है केंद्र सरकार द्वारा इस प्रतिगामी कदम को तत्काल वापस लिया जाए। हमने पहले से ही मांग की है कि बीज और उर्वरकों की खरीद के लिए 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों का उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए। नोटबंदी पहले से ही किसानों के लिए दुखों का पहाड़ ले आया है। ऐसे समय में यह जरुरी है सरकार किसानों की दुर्दशा को देखे, समझे और अभी से भी जागे।
