अक्षत सरोत्री
देहारादून: उत्तराखंड में 2.80 लाख हेक्टेयर में प्रतिवर्ष लगभग 5.5 लाख टन धान उत्पादन होता है। राज्य के 13 जनपदों में धान के कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत ऊधमसिंह नगर में है।
जी.बी. पंत कृषि वि.वि. के सूत्रकृमि विशेषज्ञ डॉ. सत्य कुमार ने बताया कि धान की फसल पर आक्रमण करने वाले कीटों व रोगों की तरह पादप परजीवी सूत्रकृमियों के आक्रमण से उत्पादन में कमी आ रही है।
जड़गांठ सूत्रकृमि से संक्रमित धान के पौधों में पोषक तत्वों व जल का अभाव होता है। ऐसे पौधों में बौनापन, पत्तियां पीली व आकार में छोटी, पेड़ों में कल्लों का कम बनना व पेड़ों में बालियां कम एवं आकार में छेटा होना आदि पौधे के वायुवीय भागों में लक्षण पाए जाते हैं क्योंकि यह सूत्रकृमि जड़ में मौजूद अंतः परजीवी सूत्रकृमि हैं।
तराई-भाबर क्षेत्र में बहुतायत में पाया जाने वाला दूसरा सूत्रकृमि धान का जड़ सूत्रकृमि है। जो वल्कुट एवं पैरन्काइमा ऊतकों की कोशिकाओं में घूमते हुए कोशिका द्रव्य चूसता है जिससे जड़ों में शृंखला बनने से सड़न उत्पन्न हो जाती है। ऐसी जड़ें भूमि से पर्याप्त जल व पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं कर पाती हैं।
सूत्रकृमि (Nematodes) छोटे, पतले, खंडहीन तथा धागे जैसे द्विलैंगिक प्राणी होते हैं, जिनके पाद नहीं होते। इन्हें ‘गोल कृमि’ या ‘धागा कृमि’ भी कहा जाता है।
इनकी अनेक प्रजातियां पौधों की जड़ों तथा उनके भूमिगत भागों पर आश्रित रहती हैं, जबकि कुछ पौधों के वायवीय भागों पर भी आक्रमण करती हैं। पौधे की वायवीय जड़ें तने से निकलती हैं और जमीन की सतह से ऊपर बढ़ती हैं। जड़ें तनों और पत्तियों को विकास के लिए पानी और पोषक तत्व प्रदान करती हैं।
