Tulasi Vivaha: तुलसी विवाह की पूजा हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण और विशेष अवसर होता है। जो विशेष रूप से दिवाली के समय मनाया जाता है। यह पूजा भगवान विष्णु और तुलसी के विवाह के रूप में होती है यह पूजा विशेष रूप से सुख, समृद्धि, और घर में शांति के लिए की जाती है। तुलसी विवाह के पूजा में कुछ चीजों की जरूरत होती है। जिसके बाद ही व्रत को पूरे विधि विधान से किया जाता है इसलिए आईये जानतें है तुलसी विवाह में पूजा के दौरान जरूरत पड़ने वाली सामान की पूरी लिस्ट।

तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त
13 नवंबर की शाम 5:29 बजे से लेकर शाम 7:53 बजे तक रहेगा। इस दौरान आप तुलसी विवाह कर सकते हैं और पूजा कर सकते हैं।
तुलसी विवाह पूजा सामग्री
पूजा में तुलसी का पौधा सबसे महत्वपूर्ण होता है जो भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है। घी के तेल का दीपक जलाना चाहिए और जो पूजा की रोशनी और सकारात्मक ऊर्जा को दर्शाता है। गंगाजल का प्रयोग विशेष रूप से शुद्धि के लिए किया जाता है। चंदन का लेप पूजा स्थल पर करना शुभ होता है तिलक करने के लिए कुमकुम और रोली का प्रयोग करें। तुलसी, गुलाब, और अन्य शुभ फूलों का प्रयोग किया जाता है। तुलसी की पत्तियां भगवान विष्णु और तुलसी विवाह में प्रमुख रूप से चढ़ाई जाती हैं। साथ ही पूजा में केले, सेब, नारियल आदि फल चढ़ाए जाते हैं। सुपारी, लौंग, इलायची इनका पूजा में खास महत्व है। तुलसी विवाह में सिंदूर का उपयोग भगवान विष्णु और तुलसी के विवाह के प्रतीक रूप में किया जाता है। तुलसी माता को लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, आलता जैसे सुहाग का सामान अर्पित किया जाता है। कलश में जल भरकर रखा जाता है और इसे पूजा के दौरान इस्तेमाल किया जाता है।
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तुलसी विवाह पूजा विधि
सुबह स्नान करने के बाद सबसे पहले तुलसी के पौधे की अच्छे से सफाई करें। तुलसी के पास दीपक जलाएं और पूजा स्थान को साफ करें भगवान विष्णु और तुलसी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। शंख, घंटी और दीपक बजाकर वातावरण को शुद्ध करें। चंदन, कुमकुम और फूलों से भगवान की पूजा करें फिर तुलसी की पत्तियों को भगवान शालिग्राम के सामने रखें और उन्हें चढ़ाएं। आखिर में लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी जैसे सुहाग के सामान, नारियल, फल, मिठाई और अन्य सामग्री तुलसी मां को अर्पित करें और उनसे आशीर्वाद की कामना करें।
पौराणिक कथा
तुलसी और शालिग्राम के विवाह से जुड़ी कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताई गई है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में तुलसी जिनका एक नाम वृंदा है। शंखचूड़ नाम के असुर की पत्नी थी। शंखचूड़ दुराचारी और अधर्मी था। देवता और मनुष्य सभी इस असुर से त्रस्त थे। तुलसी के सतीत्व के कारण सभी देवता मिलकर भी शंखचूड़ का वध नहीं कर पा रहे थे। सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु और शिवजी के पास पहुंचे और उनसे दैत्य को मारने का उपाय पूछा। उस समय भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण करके तुलसी का सतीत्व भंग कर दिया। जिससे शंखचूड़ की शक्ति खत्म हो गई और शिवजी ने उसका वध कर दिया। बाद में जब तुलसी को ये बात पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। विष्णुजी ने तुलसी के श्राप को स्वीकार किया और कहा कि तुम पृथ्वी पर पौधे और नदी के रूप में रहोगी और तुम्हारी पूजा भी की जाएगी। मेरे भक्त तुम्हारा और मेरा विवाह करवाकर पुण्य लाभ प्राप्त करेंगे। उस दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी का दिन था। तुलसी नेपाल की गंडकी और पौधे के रूप में आज भी धरती पर हैं। गंडकी नदी में ही शालिग्राम मिलते हैं।
