पर्यावरण के साहित्य गुरु थे अनुपम मिश्र

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rajendra-singhराजेंद्र सिंह

अनुपम मिश्र ऐसे व्यक्ति थे, जो मानवता और प्रकृति के बीच गहरे रिश्ते बनाने का काम जीवनभर करते रहे। वे पानी पर्यावरण पर काम करने वाले पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने जो भी कुछ लिखा, उसमंे भारतीय ज्ञान तंत्र को भारत के विकास से होने वाले खतरों के प्रति हमेशा आगाह किया। उनकी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ इसका प्रमाण है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, गोवा से लेकर गुवाहाटी तक पूरे भारत में पानी का अद्वितीय परम्परागत जल प्रबंधन था। अपनी सारी साहित्यिक रचनाओं में इस देश के गरीब से गरीब के ज्ञान की प्रशंसा, उनके ज्ञान को उभारने का काम अनुपमजी ने निरंतर किया। उन्हें पानी पर्यावरण का साहित्यिक गुरु कह सकते हैं। उनका जाना बहुत दुखद है। उन्हें हमारे बीच और 30 साल रहना चाहिए था। दुख इस बात का भी है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने उनके काम को कभी पर्याप्त पहचाना नहीं। 26 जनवरी को पद्‌म-अलंकरणों की सूची देखेंगेे तो उनकी बराबरी का एक आदमी नहीं मिलेगा, साहित्य की दुनिया में और सेवा की दुनिया में।

talab-2660x330मैं तो उन्हें 50 साल से जानता था, जब हम बहुत छोटी उम्र के थे तब से। वे करीब 67 साल के थे और उन्होंने काम शुरू कर दिया था 16-17 की उम्र में। तब वे सोशलिस्ट साइंटिस्ट फोरम के सक्रिय कार्यकर्ता थे। काम तो किया पर कभी चमचागिरी नहीं की, लेकिन आजकल जो सरकारों की चमचागिरी नहीं करता, उन्हें कोई नहीं पूछता। वैसे लोगों ने बहुत पुरस्कार दिए उन्हें। इससे उनका घर भरा पड़ा है, लेकिन ताज्जुब की बात है कि सरकारों नेताओं को क्या हो गया, इनकी खोपड़ी किसने खराब कर रखी है। उन्हें क्यों नहीं समझ में आता कि कभी-कभार उन्हें भी ढूंढ़ लो, जो तुम्हारे दरबार में आकर हाजिरी नहीं देता। मैं तो उनके निजी जीवन, सामाजिक जीवन का साथी हूं। उनके साहित्यिक जीवन का साथी नहीं हूं, क्योंकि साहित्य की जो शैली थी वह बहुत गहरी और ऊंची थी, वह मेरी नहीं हैं। हम दोनों 40 साल से साथ थे। वे हमारे तरुण भारत संघ के 30 साल तक अध्यक्ष भी रहे। 1986 में जब तरुण भारत संघ ने अलवर जिले में कुछ तालाबों के काम शुरू किए थे, तब अनुपम, प्रभाष जोशी और उत्तराखंड के चंडी प्रसाद भट्‌ट तीनों जल चेतना यात्रा में सरिस्का के 1100 वर्ग किलोमीटर के इलाके में पैदल घूमे थे। उसके बाद उन्होंने पूरे भारत में जो परम्परागत जल प्रबंधन था, उस पर दो मूल्यवान पुस्तकें लिखीं-‘आज भी खरे हैं तालाब’ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें।’ वे प्रामाणिक बातें करते थे, नपे-तुले शब्दों में बोलते थे। कभी किसी से डरते नहीं थे। उन्हें कभी यह भय सताता नहीं था कि इसे सच्ची बात कह दी तो यह मेरा नुकसान कर सकता है। उन्हें सच को तौलिए में लपेट के मारना नहीं आता था, वह सच्ची बात को सीधा बोलते थे।

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 एक बहुत प्रामाणिक वाकया बताता हूं कि सुरेश प्रभु जब नदी जोड़ो योजना के अध्यक्ष थे। तब उनसे कहा, ‘ये नदियों के प्रवाह का काम प्रभु (सुरेश) का नहीं है, प्रभु (प्रकृति ईश्वर) का है। प्रभु जहां नदियों को जोड़ना होता है वहां जोड़ते हैं। फिर उनसे कहा कि नदियों को नहीं जोड़ना चाहिए, बल्कि नदियों से लोगों को जोड़ना चाहिए। जब लोग नदियों से जुड़ेंगे तो फिर तुम्हें नदी जोड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।’ अनुपम बहुत विलक्षण विद्वान थे और प्रकृति पर्यावरण के प्रति स्नेह सम्मान को वे व्यवहार में भी लाने की कोशिश करते थे।

 वे सच्ची वैज्ञानिकता और साहित्यिक गहराई के साथ काम में जुटते थे। उनके जुड़ने से काम, विचार और भविष्य के चिंतन तीनों बातों को गहराई मिलती थी। उनके मन में कोई ऊंच-नीच नहीं रहती थी। समता, सादगी और सहजता, उनके जीवन का अद्वितीय व्यावहारिक पक्ष था। 1986 में जब गोपालपुरा गांव में पेड़ लगाने पर अलवर के कलेक्टर ने मुझ पर 5,555 रुपए जुर्माना लगााया था, तब अनुपमजी, प्रभाष जोशी, चंडी प्रसाद भट्‌ट और अनिल अग्रवाल को लेकर अलवर आए। इन्होंने सीधा सवाल किया कि ये पेड़ किसलिए लगे हैं तो प्रशासन को यह पता था कि ये पेड़ वहां मिट्टी का कटाव रोकने के लिए, तालाबों की सिल्ट रोकने के लिए लगे थे, करीब 150 एकड़ जमीन में। विवाद बहुत बढ़ा। अंत में कलेक्टर का ट्रांसफर हो गया। किंतु अनुपमजी उन कलेक्टर महोदय को गांव में लेकर आए और दिखाया-समझाया। उनका सम्मान समारोह आयोजित किया। उन्हें अहसास कराया कि कभी-कभी कलेक्टर को जनता के बीच जाकर संवाद करना चाहिए, समझना चाहिए, केवल नेताओं के कहने से निर्णय लेना ठीक नहीं होता पेड़ तो इसलिए लगाए गए क्योंकि वहां पेड़ लगाना जरूरी था, वहां कोई कब्जा करने की बात थोड़े थी। वे भय लोभ, लालच और द्वैष से मुक्त इंसान थे और ये केवल तारीफ के लिए कहे गए शब्द नहीं हैं। 1998 में बाड़मेर में बाढ़ आई। शहर के शहर डूब गए। उन्होंने वहां पहुंचने पर तुरंत कहा कि पता है ये डेम क्यों बहे? डेम का सीमेंट कंक्रीट सख्त सतह पर ही जुड़ सकता है। रेत या मिट्‌टी में वह टिक नहीं सकता। सरकारी इंजीनियरों ने डेम कंस्ट्रक्शन के मैनुअल में जो था, उसके अनुसार डेम बना दिया। सात फीट की फाउंडेशन खोदनी थी, खोद दी, हार्ड रॉक मिली की नहीं मिली, बस डेम बना दिया। इतने नीचे सीपेज से पानी तो जा सकता है। जब पानी आया तो सात फीट नीचे की रेत और मिट्‌टी बहाकर ले गया और डेम ढह गया। एक साहित्यिक आदमी जो सिविल इंजीनियर नहीं है है बता रहा है कि इसलिए डेम ढहा। फिर हमने इंजीनियर बुलाकर पूछताछ की तो पता चला कि बात सही निकली। अपनी बात पर अनुपमजी को बहुत भरोसा होता था लेकिन, जब तक दूसरे पक्ष से उसे सिद्ध कर लें तब तक सार्वजनिक रूप से वह किसी से कहते नहीं थे।

saabha4d3caa3baa2अनुपम इस मामले में बहुत विलक्षण थे। जब यमुना गंगा की सफाई का काम चल रहा था तो वह अपनी शैली में कहा करते थे, ‘गंगा का बाप जाए या गंगा का भेजा सरकार में जाए, लेकिन वह गंगा-यमुना को साफ नहीं कर पाएंगे, क्योंकि जिस तरह से वह काम कर रहे हैं वह नदियों को साफ करने का नहीं बल्कि उन्हें और गंदा करने का ही है। नदियों को अपनी आज़ादी चाहिए जैसे इंसान को आज़ादी चाहिए। जब से हमने नदियों का आज़ादी छीनी है, नदियां नाला बन गई हैं। इनको दोबारा नदी बनाना तब तक संभव नहीं है जब तक इनका पर्यावणीय प्रवाह सुनिश्चित नहीं होगा।’ (भाष्कर से साभार)

 

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