आज के समय में आप सबसे बड़ी चुनौती किसे मानते हैं…इस संबंध मे आप सभी के भिन्न मत हो सकते हैं, लेकिन अगर मैं कहूँ कि आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हमें प्राकृतिक भोजन का उपलब्ध होना। शारीरिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध भोजन है, अगर हम भोजन में भर भर के रसायन ले रहें हैं तो बीमारियों के इस दौर में सीधे तौर पर उनको आमंत्रित कर रहे हैं।
बढ़ती वैश्विक जनसंख्या के बीच जैविक खेती की संकल्पना बिल्कुल विपरीत प्रतीत हो सकती है, लेकिन इसके प्रति लगातार लोग जागरुक हो रहे हैं। जाहिर है कि लोग अगर इस संबंध में जागरुक होंगे तो भारत जैसे देश में मानव का चहुमुखी विकास होगा और रहन-सहन की गुणवत्ता भी सुधरेगी।
आज की कहानी है केरल राज्य के एक तीन उत्साही किसानों कि जो स्वस्थ खान-पान की आदतों को बढ़ावा देने के साझा जुनून से प्रेरित होकर अलग-अलग पृष्ठभूमि के होने के बावजूद साथ आकर जैविक खेती की यात्रा शुरू की है। तीन दोस्तों ने अलाप्पुझा में एक बंजर भूमि को कीटनाशक मुक्त सब्जियों के खेत में बदल दिया है।
उनके कृषि उद्यम ने अब विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक अवकाश और तनावमुक्त गतिविधि के रूप में कृषि कार्य में शामिल होने के लिए आकर्षित करना शुरू कर दिया है।
पारंपरिक खेती में कीटनाशकों और रसायनों के उपयोग में खतरनाक वृद्धि को महसूस करने के बाद सुरेश कुमार, पी के सुजीत और रोजेश पी जेवियर ने जैविक खेती की इस यात्रा को शुरू करने का फैसला किया। मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर प्रभाव के बारे में चिंतित होकर उन्होंने खेती के अनेको तरीकों पर विचार-मंथन किया और अपने कीटनाशक-मुक्त उत्पाद की खेती करने का विचार किया।
जब तीनों ने अलाप्पुझा सूबा के सामने अपना विचार प्रस्तुत किया। जिसके पास अलाप्पुझा में वंदनम में सरकारी मेडिकल कॉलेज के पास लगभग 4.5 एकड़ जमीन है। तो यह विचार सुन कर चर्च के अधिकारी तुरंत सहमत हो गए और खेती के लिए जमीन सौंप दी। अपने संसाधनों और कौशल को एकत्रित करते हुए, उन्होंने बंजर भूमि को एक संपन्न जैविक खेत में बदल दिया। जबकि सुजीत एम-टेक स्नातक हैं और एक ग्राम अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। सुरेश कुमार दूरदर्शन तिरुवनंतपुरम के कृषि दर्शन कार्यक्रम के लिए उत्पादन नियंत्रक के रूप में काम करते हैं और रोजेश एक किसान हैं।
अब वे खेत में करेला, लौकी, तुरई, टमाटर, कद्दू, भिंडी, खीरा, मटर, बैंगन, हरी मिर्च और ब्रॉड बीन्स जैसी सभी प्रकार की सब्जियों की खेती करते हैं।
सुरेश कुमार ने मीडिया को बताया “हम अपनी उपज सीधे लोगों को बेचते हैं। हमारे खेत में उगाई गई सब्जियों की भारी मांग है। लोग जानते हैं कि हम किसी भी प्रकार के कीटनाशकों का उपयोग नहीं करते हैं। हम हर दिन तीन घंटे खेत पर काम करते हैं।”
उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य अधिक बंजर भूमि को खेतों में बदलना है। जहां हम पोषक तत्वों से भरपूर, रसायन मुक्त सब्जियां पैदा कर सकें।” चूंकि यह क्षेत्र ढीली मिट्टी के लिए जाना जाता है इसलिए तीनों ने मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए खाद, फसल चक्र और प्राकृतिक कीट नियंत्रण विधियों का उपयोग करते हुए टिकाऊ कृषि पद्धतियों के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया। उन्होंने जैविक खेती के सिद्धांतों को अपनाया। यह सुनिश्चित करते हुए कि उनकी उपज न केवल उपभोग के लिए सुरक्षित है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है।
उनकी पहल के बारे में बात तेजी से फैल गई और जल्द ही स्थानीय निवासी और मेडिकल कॉलेज में काम करने वाले डॉक्टर उनके पीछे आ गए। और उनसे सब्जियां खरीदकर उनका जोरदार समर्थन कर रहे हैं। सुरेश कुमार ने कहा, “फार्म अब एक आंदोलन है जो दर्शाता है कि इस प्रकार की छोटी पहल समाज में महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है और एक सामान्य कारण के लिए सामुदायिक जुड़ाव पैदा कर सकती है।”
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