पूजा
नई दिल्ली: इस समय खेतो में रबी सीजन की फसलें बोई जा रही हैं। जिसमें किसान हरी सब्जी की खेती पर ज्यादा ध्यान दे रहे है। हरी सब्जी सेहत के लिए फायदेमंद मानी जाती है। वहीं, लोग खुद को सेहतमंद रखने के लिए हरी सब्जी का ज्यादा सेवन करते है। वहीं, बाजारों में पूरे साल सीजन के हिसाब से हरी सब्जियों की डिमांड भी रहती है। साथ ही ऐसी कई किस्में हैं जो सब्जियों की खासियत को बढ़ा देती हैं। हम बात कर रहे है, तोरई की तीन ऐसी किस्म जो किसानों को कम दिनों में अच्छा उत्पादन देती हैं। तोरई की इस किस्म की किसानों में खूब डिमांड रहती है। खास बात यह है कि गर्मियों के सीजन में तोरई की मांग बेहद ज्यादा रहती है। इसके अलावा किसान इस किस्म की खेती करके बेहतर उपज और कमाई कर सकते हैं।
तोरई की ये तीन खास किस्में
1. माया किस्म ये तोरई की एक प्रमुख किस्म है। यह किस्म भारतीय बंपर उपज के लिए जानी जाती है। इसके फल मध्यम गूदेदार और पतले आकार होते हैं। इस किस्म की उत्पादन क्षमता 130 से 160 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। ये किस्म कई रोगों से लड़ने में सक्षम है। वहीं, इस किस्म की पहली तुडाई 60 दिनों में होती है। यह किस्म डाउनी इमलड्यू रोग प्रतिरोधी है।
2. पूसा सुप्रिया
तोरई की पूसा सुप्रिया किस्म के बीज की ये खासियत होती है। इसके फल चिकने और बिना बालों वाले होते है। इस किस्म की तोरई हल्के हरे रंग की होती है, इसके एक बेल में 12 से 16 फल आता है। साथ ही यह किस्म वसंत, गर्मी और खरीफ मौसम के लिए उपयुक्त है। इसके गर्मी वाले फलों की तुड़ाई 50-53 दिन में और खरीफ में उगाए गए फल 45 दिन में तैयार हो जाते हैं और औसत उपज 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
3. पंत चिकनी तोरई 1
चिकनी तोरई एक लोकप्रिय किस्म है, कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर द्वारा विकसित किया गया है। इस किस्म के फल हरे, बेलनाकार और लंबे होते हैं। यह 50 से 55 दिनों में पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। खास बात यह है, यह किस्म 140 से 170 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देती है।
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तोरई की खेती
तोरई की खेती के लिए 25 से 37 डिग्री सेल्सियस तापमान उचित माना जाता है। और उच्च कार्बनिक पदार्थों से युक्त और अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ मृदा की आवश्यकता होती है। साथ ही, मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। यह किस्म किसानों को 130 से 140 से क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देती है। इसके अलावा पौधों के विकास के लिए बुवाई के समय 20 किलो नाइट्रोजन की मात्रा और 30 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहिए। इसके बाद समान रूप से दूसरी खुराक पौधों में फूल आने के समय देनी चाहिए।


