बिहार में टी हब किशनगंज में चाय की खेती करेंगी जीविका दीदियां

पंचायत खबर टोली
किशनगंज: जीविका दीदियां अब चाय की खेती करेगी। किशनगंज में चाय बगान का पंजीकरण हुआ है।  चाय कंपनी का नाम महानंदा जीविका महिला एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड रखा गया है। भारत सरकार के कारपोरेट मामलों के मंत्रालय से 14 जून को इसका प्रमाणपत्र मिल गया। यह जीविका दीदियों के चाय की खेती में उतरने का पहला चरण है। उनकी उपजाई चाय की ब्रांडिंग किस नाम से होगा, यह अभी तय नहीं हुआ है।
बिहार के पूर्वी जिला में चाय की खेती एक अर्से से होती रही है। किशनगंज के पोठिया प्रखंड के किचकीपाड़ा कुसियारी में बिहार सरकार की चाय प्रोसेसिंग व पैकेजिंग यूनिट है जिसे सरकार ने दस साल के लिए लीज पर दे दिया है। लीज समाप्त होने में करीब साढे तीन साल बचा है। इस प्रोसेसिंग व पैकेजिंग यूनिट को जीविका दीदियों को देने का फैसला सरकार ने किया है। 2024 में इस यूनिट के मिलने के बाद जीविका दीदी की चाय कंपनी का कारोबार आगे बढ़ेगा।

इस बीच चाय की खेती से जुड़ी जीविका दीदियों का उत्पादक समूह तैयार किया गया है। 15 उत्पादक-समूह तैयार किया जाना है। इसमें से सात समूह तैयार हो गए हैं। एक समूह में 40 से 50 दीदी रहती है। इन समूहों से जुड़ी जीविका दीदियों को चाय उद्योग के हर पहलू की जानकारी दी जाएगी। ताकि कंपनी शुरू होने पर चाय की खेती से लेकर मार्केटिंग तक के काम वे स्वयं कर सकें।
इस चाय कंपनी के निदेशक मंडल से लेकर शेयर धारक तक जीविका दीदी ही होगी। जिस जीविका दीदी का जितना पैसा कंपनी में लगाया जाएगा, उसे उतने शेयर मिलेगे। निदेशक मंडल में पांच शेयर धारक होगे। इनका चयन सर्वसम्मति से या मतदान के माध्यम से किया जाएगा। महानंदा जीविका महिला एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड नाम से रजिस्टर्ड की गई इस कंपनी से जुड़े बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में शामिल जीविका दीदी को प्रशिक्षण दिया जाएगा।                                                               

तीन प्रखंडों में होती है चाय की खेती
उल्लेखनीय है कि पारंपरिक खेती छोड़ सीमांचल के बहुत सारे किसान चाय की खेती कर रहे हैं जिनकी न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी मांग है। ऐसा भी नहीं है कि ये सिलसिला अभी शुरू हुआ हो। लगभग एक दशक से यहां के किसान एक दशक से चाय की खेती कर रहे हैं। यहां चाय का उत्पादन लगभग 60 मिलियन किलो प्रति वर्ष होता है। यहां पर तकरीबन 25 हजार एकड़ भूमि पर चाय के बागान हैं। इस क्षेत्र में सालाना लगभग 60 मिलियन किलो चाय का उत्पादन होता है। किशनगंज के पोठिया, ठाकुरगंज, बहादुरगंज और दिघल बैंक इलाके में बड़े पैमाने पर चाय की खेती होती है। इस ईलाके में सीटीसी चाय का उत्पादन होता है. बड़ी संख्या में छोटे किसान चाय उत्पादक हैं। जिला किशनगंज में कुल 7 ब्लॉक हैं, इनमें से सिर्फ 3 ब्लॉक यानी कि पोठिया, ठाकुरगंज, व किशनगंज में ही चाय की खेती होती है। यानी पूरे बिहार में सिर्फ यही 3 ब्लॉक हैं जहां चाय की खेती होती है।
चाय की खेती से दूर हुई बेरोजगारी
किशनगंज के चाय पत्ती बागान के मालिक का कहना है कि किशनगंज में चाय की खेती से बेरोजगारों को रोजगार मिला है. मजदूरों का पलायन भी रुका है। वातावरण में नमी आई। बारिश होने लगी और यहां की मिट्टी में भी बदलाव साफ दिख रहे हैं। चाय की खेती के प्रति किशनगंज के लोगों के साथ-साथ बाहरी लोगों का भी रुझान बढ़ता गया। किशनगंज की जलवायु खास तौर पर चाय की खेती के लिए काफी सही मानी जाती है। जिले में 30 एकड़ में चाय की खेती से हजारों मजदूरों को रोजगार मिल रहा है।


दफ्तरी परिवार ने शुरू की चाय की खेती
जिले में चायपत्ती की खेती की शुरुआत वर्ष 1992 मे दफ्तरी परिवार ने की थी। सबसे पहले किशनगंज जिले के पोठिया प्रखंड से छोटे पैमाने पर शुरु की गई। सबसे बड़े चाय के किसान सुनील दफ्तरी का कहना है कि जब उनके दादा जी ने चाय की खेती की शुरुआत की थी तो उन्हे इसका अंदाजा नहीं था कि आने वाले समय में किशनगंज अपने चाय से पहचाना जाएगा। आज किशनगंज में 25 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन पर चाय की खेती की जा रही है और 6 6 टी प्रोसेसिंग की कंपनी है, जो यहां के किसानों की पत्ती खरीदते हैं और उनकी चाय तैयार करके बाजार में उपलब्ध कराते हैं


खेती से होता है अच्छा मुनाफा
1 किलो नॉर्मल चाय के निर्माण में 100 से लेकर 150 रुपये तक की लागत आती है। जबकि उत्तम दर्जे की चाय निर्माण में 250 से लेकर 300 रुपये तक का खर्च आता है। गौरतलब है कि किशनगंज में सिर्फ चाय ही नहीं बल्कि ग्रीन चाय का भी उत्पादन किया जाता है। आज ज्यादातर किसान अपनी पारम्परिक खेती को छोड़कर चाय की खेती में जुट गए हैं। ऐसे में यदि जीविका दीदीयां इस काम को आगे बढ़ाती हैं तो निश्चित रूप से इस उद्योग में तरक्की होगी और बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार मिलेगा।

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