संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली:स्वराज अभियानियों का जल—हल यात्रा समाप्त हुआ। योगेंद्र और उनके साथी कंक्रीट के जंगल में लौट आये हैं, अर्थात दिल्ली आ गये है। लेकिन मन में बसा मराठवाड़ा और बुंदेलखंड की प्यास। हो भी क्यों न जब सरकार आत्मतुष्ट हो जाती है तो जनता के हरकारों अर्थात सिविल सोसाईटी को आवाज लगाना होता है,उनके दर्द के साथ अपनी आवाज मिलानी पड़ती है,जिनकी आवाज हुक्मरानों को केवल चुनाव होने पर अच्छे दिन के सपनों तक न सिमट जाये।
मराठवाड़ा और बुंदेलखंड के 10 दिवसिय यात्रा के समापन पर मीडिया से बात करते हुए योगेंद्र यादव ने कहा कि एकतरफ जहां मराठवाड़ा में पीने के पानी साथ ही अन्य तरीके से इस्तेमाल के लिए पानी का संकट बेहद गंभीर हो गया है। सरकार मानसून का बाट जोह रही है। लेकिन सरकार के पास ऐसा कोई प्लान नही है कि यदी मानसून लेट हो जाता है या कमजोड़ पर जाता है। कुछ इलाके में वारिश नहीं होती है तो कैसे निपटा जाएगा। पानी की कमी पहले से ही एक पानी संकट में बदल गया है और तेजी से पानी के अकाल की ओर बढ़ रहा है। लोग पानी के अन्तिम संभव भंडार का उपयोग कर रहे हैं। बड़ी संख्या में गाँव के लोग बाहरी और कभी कभी मिलने वाली टैंकरों के पानी पर पूरी तरह से निर्भर हैं। कई गांवों में ये पानी के टैंकर 15 से 20 दिनों में केवल एक बार आते हैं और वो भी एक घंटे से भी कम समय के लिए। दुर्भाग्य से इस जल संकट का इस्तेमाल बेलगाम मुनाफाखोरी के लिए हो रहा है। राजनीतिक संरक्षण वाले निजी टैंकर आपूर्तिकर्ताओं की चाँदी है। बॉटलिंग प्लांट उग आए हैं और पानी की खुदरा बिक्री खूब हो रही है। त्रासदी यह है कि पानी के लिए अमीर की तुलना में गरीब अधिक भुगतान कर रहा है। पानी के सार्वजनिक वितरण में दलित, अन्य सीमांत समुदाय और गरीब उपेक्षित हैं। इसलिए हम अनुशंसा करते हैं कि महाराष्ट्र सरकार पानी की मुनाफाखोरी की जाँच करें और सार्वजनिक उपयोग के लिए और अधिक निजी बोरवेल का अधिग्रहण करे। पानी की चोरी या विचलन या पानी बॉटलिंग संयंत्रों द्वारा इसके उपयोग को तत्काल रोका जाना चाहिए। एक आपात योजना तैयार की जानी चाहिए जिससे मानसून में देरी या राज्य के कुछ हिस्सों में कमी होने पर त्वरित काम हो सके।वहीं बुंदेलखंड में जानवरों के लिए अकाल आ गया है, मुनष्यों के लिए अकाल अभी नहीं आया है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश: एमपी के गांवों में टैंकर आपूर्ति में वृद्धि करने की जरुरत है; उत्तर प्रदेश में कुछ गांव अभी भी बाकी हैं वहाँ बेहतर आपूर्ति की जरूरत है।
बुंदेलखंड के बड़ी संख्या में पशुओं की मौत
योगेंद्र यादव कहते हैं कि एक तरफ जहां देश में गौ हत्या को लेकर रोजाना सवाल खड़े होते हैं, वहीं सूखा प्रभावित ईलाके में रोजाना गायें मर रही हैं।मनुष्यों से कहीं ज्यादा घरेलू एवं जंगली जानवरों को प्रभावित कर रहा है। लोगों के पास तो कुछ सुरक्षा है, जानवरों के पास वो भी नहीं है। हमारे अवलोकन से यह स्पष्ट है कि बुन्देलखंड में पशुओं के लिए अकाल की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। हर गाँव में जहाँ भी हम गए सूखा की वजह से पिछले महीने में 10 से 100 पशुओं की मौत की रिपोर्ट है। अगर 30 पशुओं की मौत का उदार औसत भी लें तो प्रति गाँव प्रतिदिन एक पशु की मौत हो रही है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के 13 जिलों में कुल 11,065 गांव हैं। इस अनुमान से इस साल मई के महीने में 3 लाख पशुओं की मौत हो चुकी है। और, इस अनुमान में नीलगाय, बंदरों और हिरण जैसे जंगली जानवरों को शामिल नहीं किया गया है। बारिश अभी भी तीन से चार सप्ताह दूर है। गर्मी की अगर दूसरी लहर आती है तो यह आँकड़ा बहुत बढ़ सकता है। सभी राज्यों से चारे की कमी की रिपोर्ट है। पशु शिविर योजना बीड में (और उस्मानाबाद में आंशिक रूप से) कार्य कर रही है लेकिन यह कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है। इसलिए हम अनुशंसा करते हैं कि सरकार युद्ध स्तर पर पशुओं के संरक्षण के लिए काम करे। चूंकि अब नए पशु शिविर खोलने का समय नहीं है, हम सुझाव देते हैं कि जहाँ से भी सूखा की वजह से मवेशियों के मौत की सूचना है उन सभी ब्लाकों में चारे का व्यापक और उदार वितरण किया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय का आदेश, लेकिन जमीन पर कोई अम्ल नही
मनरेगा: सूखा प्रभावित आबादी को, विशेष रूप से गरीबों को रोजगार देने वाला मनरेगा सूखा से निपटने के लिए एक प्रभावी उपकरण है। वास्तव में, महाराष्ट्र का ईजीएस मॉडल इस राष्ट्रीय योजना का पुरवर्ती है। दुर्भाग्य से राज्य में इस योजना को ऐसे समय में एक मजाक बना दिया गया है जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। अधिकांश गांवों में जहाँ हम पदयात्रा के दौरान गए में लगभग किसी के पास नौकरी-कार्ड नहीं था या उन्हें भुगतान नहीं मिला था जबकि सरकारी आंकड़ों में उन गांवों में नौकरी-कार्ड की बड़ी संख्या दिखाई गयी है। यह स्पष्ट है कि इस योजना पर स्थानीय शक्तिशाली लोगों और नौकरशाहों द्वारा कब्जा कर लिया गया जो सूखा राहत के लिए बने पैसे को हजम कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में भी राज्य जैसे कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने की कानूनी बाध्यता से बिल्कुल अनजान है। वस्तुतः मनरेगा का कोई काम नहीं हो रहा है और राज्य के स्वयं के लक्ष्यों में से केवल 30% हासिल किया गया है। गरीब को रोजगार प्रदान करने के लिए मनरेगा का उपयोग करने का कोई प्रयास दिखाई नहीं दिया। उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र, विशेष रूप से महोबा जिले में, एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मनरेगा का इस्तेमाल सूखा राहत के लिए किया गया। यूपी अपने अप्रैल-मई के रोजगार मानव दिवस के अपने लक्ष्य को पार कर गया है।
हमारा सुझाव है कि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में अगले एक सप्ताह के भीतर नई नौकरी-कार्ड प्रदान करने के लिए शिविरों का आयोजन किया जाना चाहिए। स्थानीय अधिकारियों को आदेश दिया जाना चाहिए कि विशेष रोजगार ड्राइव चलाएँ और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये निर्देशों के अनुसार सक्रिय रूप से लोगों द्वारा काम मांगे जाने को प्रोत्साहित करें। मनरेगा के धन की हेराफेरी को सामने लाने के लिए विशेष सामाजिक अंकेक्षण किया जाना चाहिए।
पीडीएस: सुप्रीम कोर्ट के आदेश में स्पष्ट है कि खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सभी को राशन दिया जाए चाहे उनके राशन कार्ड की कैटगरी (वरीयता / गैर-वरीयता) कुछ भी हो और उनके पास राशन कार्ड न हो तब भी। इस सम्बन्ध में सभी जगहों पर घोर असमानता देखने को मिली। महाराष्ट्र में कई घर ऐसे हैं (अलग-अलग गाँवों में, 10 घरों में 1 घर से लेकर 4 घरों में 1 घर के पास) जिनके पास राशन कार्ड नहीं है और उन्हें सब्सिडी वाला अनाज नहीं मिलता। जिनके पास राशन कार्ड है उनको भी तय की गयी मात्रा में राशन नहीं मिलता और कुछ केस में बहुत ही घटिया अनाज दिया जाता है। कई जगह यह भी पाया गया कि उचित मूल्य की दुकानों में भी 2 रू प्रति किलो गेहूं (2 किलो प्रति व्यक्ति प्रति मास) और 3 रू प्रति किलो चावल (3 किलो प्रति व्यक्ति प्रति मास) के तय दाम से भी ज्यादा दाम लिए जा रहे हैं। एमपी के बुन्देलखंड में स्थिति कुछ बेहतर है, लेकिन अनियमित और अपर्याप्त अनाज-वितरण की शिकायतें भी मिली हैं।
उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के कार्यान्वयन में सुस्त है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कई अनुपालन सिर्फ़ कागजों में है। राशन कार्ड जारी करने में भ्रष्टाचार की शिकायतें चारो तरफ से मिली और राशन डीलरों द्वारा भी स्वीकार किया गया। कुछ जगहों पर राशन डीलरों ने राशन कार्ड जारी करने के लिए जो पैसा ग्रामीणों से लिया था उसे वापस किया या वापस करने का वादा किया। लोगों को राशन से वंचित करने के लिए कई साज़िशें अपनायी गयी हैं – या तो ट्रैक्टर मालिक होने या आयकर वाली संपत्ति होने के अवैध आधार लाभार्थियों की सूची से हटा दिया गया है या परिवार के सदस्यों की संख्या कम कर दी गयी है। राज्य के अधिकारियों ने खुले तौर पर सार्वजनिक बैठकों में इस तरह की प्रणाली को स्वीकार किया।
इसलिए हम अनुशंसा करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को प्रभावी करने के लिए सभी सरकारों को तुरंत एक जी.आर. जारी करना चाहिए। वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया जाना चाहिए कि शिविर लगाएँ और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की निगरानी करें ताकि कोई भूखा न रहे। किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को कठोर सजा दी जानी चाहिए।
मिड–डे मील: सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह साफ स्पष्ट है कि आदेश से 7 दिनों के भीतर गर्मी की छुटियों में भी मिड डे मील दिया जाना चाहिए। राज्यों ने समय सीमा के अनुसार कागज पर आदेश जारी कर दिया है लेकिन जमीन पर बहुत ही सीमित प्रभाव है। लातूर, उस्मानाबाद और बीड के तीन जिलों में पदयात्रा मार्ग में आने वाले किसी भी गांव के स्कूल में छुट्टी की अवधि के दौरान मध्यान्ह भोजन दिए जाने की सूचना नहीं है। बुंदेलखंड के कुछ गांवों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कागज पर पालन किया गया है, लेकिन ऐसा लगता है कि जान-बूझकर कोई जानकारी नहीं दी गयी है ताकि कम बच्चे आयें। अंडे / दूध किसी भी गांव में नहीं दिया गया है।इसलिए हम अनुशंसा करते हैं कि सरकारें तत्काल यह सुनिश्चित करें कि हर गांव में व्यापक प्रचार हो कि स्कूल भोजन के लिए खुले हैं, और यह भी सुनिश्चित हो कि स्कूल वास्तव में खुलें और सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पौष्टिक आहार दिया जाए।
फसल नुकसान का मुआवजा: जिन क्षेत्रों का दौरा हमने किया वहाँ कहीं भी राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से फसल नुकसान के मुआवजे के पूर्ण वितरण की बात सामने नहीं आई। मराठवाड़ा और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में असिंचित भूमि के लिए इनपुट सब्सिडी (6800 रु प्रति हेक्टेयर) किसानों तक आंशिक रूप से ही पहुँचा, जबकि सिंचित भूमि और बागवानी के लिए इनपुट सब्सिडी (13,500 रु प्रति हेक्टेयर) को वितरित ही नहीं किया गया है। उत्तर प्रदेश के किसानों सबसे ज्यादा घाटे में हैं। पिछले तीन वर्षों में छह फसलों में से चार खोने वाले किसानों को कम से कम तीन फ़सल का मुआवजा भी नहीं दिया गया है। 2 हेक्टेयर से ऊपर वाले किसानों को केवल एक बार मुआवजा मिला है। पिछले साल के ओलावृष्टि से होने वाले नुकसान का भुगतान भी अभी किया जाना बाकी है। हम सरकार से आग्रह करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार यह काम त्वरित हो।
फसल-ऋण पुनर्गठन: भारतीय रिजर्व बैंक और नाबार्ड के दिशा-निर्देशों के अनुसार कृषि ऋण पुनर्गठन और पिछले ऋण के लंबित रहने के दौरान नए ऋण के लिए सूखा प्रभावित किसानों की पात्रता के बारे में सपष्ट होने के बाद भी किसी भी राज्य में यह नहीं हो रहा है। महाराष्ट्र सरकार के दिनांक 20 मई 2016 के आदेश के अनुसार जो 31 जुलाई तक पुनर्गठन की बात करता है का मतलब है कि कोई नया ऋण आगामी खरीफ फसल के लिए मंजूर नहीं किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में बैंक की बकाया राशि के भुगतान के लिए किसानों को नोटिस अभी भी मिल रहा है। उत्तर प्रदेश में नोटिस जारी नहीं किया जा रहा है लेकिन कोई नया ऋण वहाँ भी नहीं मंजूर किया जा रहा है। फसल मुआवजा की राशि और चीनी मिलों से प्राप्त धन को भी लोन अकाउंट में भेजने की धोखाधड़ी के व्यापक रिपोर्ट सामने आ रहे हैं। हम मांग करते हैं कि राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (एसएलबीसी) यह सुनिश्चित करे कि किसानों को नई फसल के लिए ऋण मिले।

