बनेगा गांधी के सपनों का भारत

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डॉ ​बिंदेश्वर पाठक

इस बात को अब दुनिया ने भी मान लिया है कि भारतीय संस्कृति में स्वच्छता की लंबी परंपरा रही है। हालांकि अतीत के कुछ कालखंडों में पता नहीं कहां से अस्वच्छता की अवधारणा आई या फिर बढ़ती जनसंख्या का दबाव रहा कि हमारी जिंदगी से स्वच्छता की अवधारणा कुछ कालखंड में कमजोर पड़ी। निश्चित तौर पर आधुनिक भारत में इस समस्या पर सबसे पहले और गहन ध्यान महात्मा गांधी ने दिया था। 1901 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में हिस्सा लेते वक्त उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को शौचालय की सफाई के लिए प्रेरित किया। जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो उन्होंने खुद ही टोकरी, झाड़ू और खुरपी उठा ली। उसके बाद तो जैसे बदलाव की शुरुआत हो गई। गांधीजी ने आजादी के आंदोलन के साथ ही स्वच्छता को भी अभियान के तौर पर जोड़ दिया। गांधीजी तो कई बार कहा करते थे कि आजादी से पहले स्वच्छता ज्यादा जरूरी है। उन्होंने स्वच्छता को लेकर जन जागरूकता फैलाने की जो पहल की वैसी पहल भारतीय राजनीति में दूसरी बार फिर तब दिखाई पड़ी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले के अपने पहले भाषण से ही देश को स्वच्छ बनाने का आह्वान किया।

banda-largeदो अक्टूबर 2014 को उन्होंने खुद फावड़ा उठाकर जिस तरह स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की उससे भारतीय समाज में स्वच्छता को लेकर नई चेतना पैदा हुई है। इस अभियान की कामयाबी का ही उदाहरण है कि अब सड़क, रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन से लेकर हाट-बाजार तक में छोटे-छोटे बच्चे कचरा फैलाने वालों तक को टोक दे रहे हैं। 1यह सोचने का विषय है कि जिस भारतीय संस्कृति में साफ-सफाई एक संस्कार के रूप में रही है वह आखिर 19वीं सदी में गंदगी का पर्याय क्यों बन गई? मोहनजोदड़ो-हड़प्पा की सभ्यता में मिले प्रमाणों से साफ है कि भारतीय संस्कृति में स्वच्छता को लेकर कितनी स्पष्ट अवधारणा रही है। संयोग से आजकल नवरात्र के दिन चल रहे हैं। देवी पुराण में शौच के लिए जो विधान बताया गया है वह आज के नजरिये से भी वैज्ञानिक साबित होता है। देवी पुराण में कहा गया है कि रिहायश से तीर छोड़ने के बाद जहां गिरे वहां मिट्टी खोदें, घास-पात डालें, शौच करें और फिर घास-पात डालकर ढक दें। शौचालय की थोड़ी चर्चा बुद्ध काल में पाई गई है। बौद्ध साहित्य में शौचालय निर्माण से लेकर उसके इस्तेमाल तक की जानकारी दी गई है। मुगलकाल में भी जिस तरह शौचालय का विवरण मिलता है वह साबित करने के लिए काफी है कि भारतीय संस्कृति के हर कालखंड में साफ-सफाई की भावना रही है।

sauchalaya 2दुर्भाग्य से मौजूदा भारत में अब भी काफी लोग खुले में शौच करने के लिए मजबूर हैं। इस अस्वास्थ्यकर व्यवस्था को रोकने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने अभियान छेड़ रखा है। स्वच्छ भारत अभियान का मकसद 2019 यानी मौजूदा सरकार का कार्यकाल खत्म होने तक खुले में शौच से मुक्ति हासिल करना है। अगर प्रधानमंत्री की मंशा के मुताबिक 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करना है तो इसके लिए युद्ध स्तर पर काम किया जाना जरूरी है। देखने में यह लक्ष्य हासिल करना कठिन तो है, लेकिन तैयारियों के साथ काम किया जाए तो इसे हासिल भी किया जा सकता है। मेरा मानना है कि अगर बुनियादी व्यवस्था तैयार कर दी जाए तो देश को 2019 तक खुले में शौच से मुक्त किया जा सकता है। इसके लिए हर पंचायत के स्तर पर एक-एक नौजवान का चुनाव किया जाना चाहिए। उसे छह महीने तक शौचालय निर्माण, उसकी देखरेख आदि की ट्रेनिंग दी जाए तो वह इस अवधि में पूरी तरह प्रशिक्षित होकर शौचालय निर्माण कार्य को अपने हाथ में न सिर्फ ले सकता है, बल्कि उस पर तेजी से काम कर सकता है। 1एक अनुमान के मुताबिक देश को खुले में शौच से मुक्त कराने के लिए करीब साढ़े बारह करोड़ शौचालय की जरूरत है। अगर प्रति पंचायत के हिसाब से दो लाख 51 हजार नौजवानों का चयन किया जाए तो ट्रेनिंग के बाद हर नौजवान प्रति महीने तीस-तीस शौचालय का भी निर्माण करा सकता है। इस तरह हर नौजवान दो साल की अवधि में 720 शौचालयों का निर्माण करा सकता है। इस तरह पूरे देश में करीब 18 करोड़ शौचालय बनाए जा सकते हैं। अब सवाल उठता है कि इसके लिए पैसे कहां से आएंगे? हमारा आकलन है कि एक गांव को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए करीब साठ लाख का खर्च आता है। एक पंचायत में तकरीबन तीन गांव हैं तो इस हिसाब से हर पंचायत के लिए करीब दो करोड़ का खर्च आएगा। एक ब्लॉक में करीब तीस पंचायतें होती हैं, इस लिहाज से हर ब्लॉक को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए 60 करोड़ और इसी तरह एक जिले को करीब 600 करोड़ के खर्च की जरूरत होगी। इसके लिए धन सरकारी स्तर पर भी खर्च किया जा सकता है या फिर दुनियाभर में फैले दो करोड़ के करीब प्रवासी भारतीयों को प्रेरित किया जा सकता है। इसी कड़ी में अपने यहां के उन साधु-संतों, मंदिरों-मठों, गिरिजाघरों, मस्जिदों को प्रेरित किया जा सकता है जिनके पास संपत्ति और संसाधन हैं। भारत में करीब 16,057 कंपनियां हैं, जिनका टर्नओवर पांच करोड़ से ज्यादा है। उनका अपना सीएसआर फंड है। उनको भी इस दिशा में आगे लाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सरकार गांवों में शौचालय बनाने के लिए 12 हजार रुपये दे रही है। आज के दौर में इस राशि से शौचालय बनाना आसान नहीं है। बाकी की रकम के लिए बैंकों से कर्ज देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। अगर पैसा मिल भी जाए तो साढ़े बारह करोड़ शौचालय बनाने का काम बिना गैरसरकारी संगठनों के पूरा नहीं हो सकता। दो लाख ऐसे एनजीओ हैं जो रिटर्न दाखिल करते हैं। इस काम के लिए इन एनजीओ में से संस्थाओं का चुनाव किया जा सकता है। (लेखक सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन के संस्थापक हैं साभार:दैनिक जागरण)

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