
महाराष्ट्र की रहने वाली कल्याणी सुखेशवर सिंह पुणे में शिक्षा की अलख जगा रही है। छोटी सी उम्र में ही कल्याणी अपने NGO के माध्यम से झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों की बेहतरी के लिए काम कर रही है।
कल्याणी का जन्म महाराष्ट्र के सतारा में हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव में हुई। वह बेहद साधारण परिवार से आती है उनके माता-पिता गांव में किनारे की छोटी सी दुकान चलाते है। कल्याणी के माता-पिता का सपना था उनकी बेटी पढ़-लिखकर अपना नाम कमाए। अपने माता-पिता का सपना पुरा करने के लिए 12वी के बाद ग्रेजुएशन की पढ़ाई लिए पुणे शिफ्ट हो गई।

कल्याणी कहती है कि वह बड़े शहर में जाने के नाम से डर हुई थी। लेकिन जल्द ही उनका यह डर समाप्त हो गया। उन्होंने कॉलेज में इकोनॉमिक्स की पढ़ाई करते हुए कई डिबेड कॉम्पिटिशंस में हिस्सा लिया और जीता भी। अगल-अगल मौके पर प्रतियोगीओं में हिस्सा लिया।
बच्चों से चंद घंटों की मुलाकात ने बदली जिंदगी
इकोनॉमिक्स की पढ़ाई करते हुए उन्होंने कॉलेज में कई डिबेड कॉम्पिटिशंस जीते। अलग-अलग मौकों पर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। कल्याणी जब ग्रेजुएशन के फस्ट ईयर में थी तो उनका जन्मदिन आया। जिसे अपने दोस्तों के साथ अलग तरीके से सेलीब्रेट करने का फैसला लिया। उन्होंने अपना जन्मदिन एक अनाथाश्रम में मनाया। बच्चों के साथ बिताये चंद घंटों ने कल्याणी के जीवन को एक मकसद दे दिया। वह उन बच्चों के लिए कुछ करना चाहती थी। लेकिन छोटे से गांव से निकलर आई फर्स्ट ईयर की एक छात्र आखिर कर भी क्या सकती थी? उनके पास इतने पैसे नहीं होते थे उन बच्चों के लिए कुछ कर सके। वह खुद एक छात्र थी, यदि कमा रही होती तो शायद बच्चों के लिए कुछ कर पाती।
कल्याणी सोचती रही कि वह इन बच्चों के लिए क्या कर सकती है। ऐसे में उन्होंने सोचा की बच्चों वही कुछ सिखाऊं जो उन्हें आता है। उन्होंने बच्चों को डिबेट करने और भाषण देने की कला सिखाने में जुट गई।
बच्चों को मुखर होकर बोलना सिखाया
बच्चों को सिखाने के दौरान उन्होंने देखा कि बच्चे अपना बात कहने में डरते है और हमेशा डरे सहमे दिखते है। हमेशा दूसरे उनके लिए बोलते थे। वे अधिकतर समय चुप रहते। क्लयाणी चाहती वह उन बच्चों को अपने हक लिए बोलना सिखाएं। इस तरह उनके जीवन में समाजसेवा की शुरूआत हुई।

समाजसेवा के लिए छोड़ी पढ़ाई
कल्याणी गांव छोड़कर पुणे पढ़ने के लिए आई थी। लेकिन उन्हें लोगों की मदद करने और समाजसेवा का ऐसा जुनून चढ़ा कि कुछ वक्त के लिए पढ़ाई ही छोड़ दी। ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उन्होंने सोशल वर्क से मास्टर्स की पढ़ाई शुरू की। इस दौरान वह सेवा इंटरनेशनल फेलोशिप के लिए चुनी गई। उनके सामने सवाल था कि वह पढ़ाई जारी रखे या सेवा के साथ सोशल वर्क करे।
बच्चों को पढ़ाने के लिए किताबे लिखी
स्लम एरिया में कल्याणी बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने देखा कि 7 वीं-8वीं के बच्चों को लिखना-पढ़ना नहीं आता। उन्हें उनकी किताबों से नहीं पढ़ाया जा सकता था। उन्होंने बच्चों के लिए पुस्तके तैयार की है। जो सभी उम्र के बच्चों को पढ़ना और लिखना सिखाती है। उनकी यह तरकीब कामयाब रही। इसकी मदद से वह दर्जनों बच्चों को पढ़ना और लिखना सिखा चुकी हू्ं।
