स्मार्ट गांव की हकीकत बड़बोलापन

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अब वह दौर है जब राजनीतिक बड़बोलेपन से लोग ऊब चुके हैं। मगर नीतीश कुमार के लिए बड़बोलापन ही राजनीति है क्योंकि अपने बड़बोलापन के बल पर ही नरेन्द्र मोदी स्मार्ट सिटी के काम में जुट गए हैं। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘स्मार्ट सिटी’ के बरक्स ‘स्मार्ट गांव’ बनाने का नारा दिया है। अब देखना यह है कि क्या वे बिहार के पांच गांव को भी स्मार्ट गांव बना पाएंगे?

बिहारीलाल

अब ‘स्मार्ट’ शब्द हिंदी का हो गया है। स्मार्ट से महसूस होता है कि यह भी किसी प्रकार का स्वर्ग मार्ग है। अरविंद कुमार की अरविंद वर्ड पावर में स्मार्ट की हिंदी है: सक्षम, योग्य, शातिर फैशनानुकूल, पीड़ा होना, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली, सुवेशित। यह भी ‘जाकि जैसी भावना’ वाला शब्द है। भावना के कारण ही भारत सरकार ‘स्मार्ट सिटी’ की सहारा लेती है। कुछ शहरों को स्मार्ट सिटी भी बनाया जाएगा जिस पर करोड़ों-अरबों का खर्च होगा। बहुत सारे राज्यों के नगरों को स्मार्ट होने का अवसर नहीं मिला। इन राज्यों में बिहार भी है। बिहार स्मार्ट न बना तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस कारण पीड़ित हो गए। नीतीश कुमार नारा विशेषज्ञ भी हैं, उन्होंने नारा दिया- ‘स्मार्ट गांव’ का। लोग इसे घोषणा मानते हैं। हमेशा की तरह उनकी यह घोषणा उनकी नहीं है। अगर उनका इसमें विश्वास होता तो उनके नीतीश निश्चय में यह होता। सच तो यह है कि 9 जून, 2015 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महासचिव देवी प्रसाद त्रिपाठी ने अपनी पार्टी के पटना सम्मेलन में ‘स्मार्ट सिटी’ की घोषणा के बजाय ‘स्मार्ट गांव’ की घोषणा की थी।
राज्यसभा के सदस्य देवी प्रसाद त्रिपाठी मानते हैं कि स्मार्ट गांव की रूपरेखा महात्मा गांधी की है। गांधी जी ने माना कि आदर्श भारतीय गांव में साफ सफाई और स्वच्छता से भरपूर होंगे। हालांकि गांधी ने साफ शब्दों में शौचालय की बात नहीं कि, मगर साफ सफाई और स्वच्छता से ही जुड़ा है शौचालय। बिहार सरकार ने ग्राम पंचायत से लेकर नगर निकायों के उम्मीदवारों के लिए शौचालय की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। मजे की बात है कि हर बात में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का विरोध करने वाले भाजपा के सुशील कुमार मोदी ने भी इसका समर्थन किया, क्योंकि इस अनिवार्यता के कारण बहुत सारे योग्य उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। यानी बिहार के लिए साफ-सफाई-स्वच्छता से ज्यादा जरूरी है चुनाव जीतना।
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यह जानना मुश्किल है कि बिहार के मुख्यमंत्री ने गांधी को पढ़ा है या नहीं, बल्कि स्वंयभू लोहियावादी होने के नाते लोहिया को जरूर पढ़ा होगा। लोहिया भी गांव में शौचालय की बात करते थे। 1990 में जब नीतीश कुमार लालू प्रसाद के चाणक्य कहे जाते थे तो दूसरे लोहियावादी रघुवंश प्रसाद सिंह ने मुख्यमंत्री लालू प्रसाद से शौचालय निर्माण की बात की थी और लालू प्रसाद ने घोषणा भी की थी। 2004 में जब रघुवंश प्रसाद सिंह यूपीए एक में ग्रामीण विकास मंत्री थे तो उनकी कल्पना थी निर्मल ग्राम। निर्मल ग्राम का एक उद्देश्य गाव में शौचालय निर्माण भी था। गांधी के हिंद स्वराज में यह भी था कि आदर्श गांव के घर में समुचित प्रकाश और हवादार होने चाहिए जो गांव के पांच मील के आसपास से ही लिए जाएं। इतना ही नहीं गांव की गलियां धूल से मुक्त होनी चाहिए। गांव में कुआं होना चाहिए जिसका पानी का सब इस्तेमाल कर सकें।
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गांधी यहीं नहीं रूके, उन्होने कहा कि सबके लिए आराधना स्थल हों। गांधी गांव के मवेशियों को भी नहीं भूले। कहा कि उनके लिए चारागाह होना चाहिए और गांधी सहकारिता आधारित दूध उत्पादन केंद्र की कल्पना की। गांधी ने प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल के साथ एक ऐसी पंचायत की कल्पना की जो झगड़ों का निपटारा कर सके। गांधी की सोच थी कि गांव अपना खाद्यान्न स्वयं उत्पादित करेगा और अपनी खादी भी बुनेगा। गांधी की समझ थी कि जहां तक संभव हो सके बड़ा से बड़ा ग्रामीण उद्योग को बढ़ावा देगा। गांव में कोई निरक्षर नहीं होगा, सड़कें साफ-सुथरी होंगी और कुंओं में भी गंदगी नहीं होगी। सभी समुदायों में मेल-मिलाप होगा और छुआछूत नहीं होगा।
हो सकता है कि गांधी की सोच आज के संदर्भ में पुराना हो। इधर भारत सरकार की भी योजना है कि देश के लगभग साढ़े दो लाख गांवों में से ढ़ाई हजार को स्मार्ट बनाया जाएगा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जो यह निश्चय है तो क्या वे बिहार के पांच गांव को भी स्मार्ट गांव बना पाएंगे? वैसे यह तो खुन्नस है कि बिहार के किसी शहर को स्मार्ट सिटी में शामिल नहीं किया गया। अब वह दौर है जब राजनीतिक बड़बोलेपन से लोग ऊब चुके हैं। मगर नीतीश कुमार के लिए बड़बोलापन ही राजनीति है क्योंकि अपने बड़बोलापन के बल पर ही नरेन्द्र मोदी स्मार्ट सिटी के काम में जुट गए हैं। (साभार: यथावत)

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