
नई दिल्ली: भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की आधे से ज्यादा आबादी आज भी रोजगार के लिए खेती पर ही निर्भर होती है। हालांकि पिछले कुछ सालों में पारंपरिक खेती को छोड़ किसानों का रुझान आधुनिक खेती की ओर तेजी से बढ़ा है। फसल जैसे गेहूं, धान को छोड़ किसान अब नकदी फसलों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। जिनसे उन्हें अच्छा मुनाफा भी हो रहा है। इन्हीं नकदी फसलों में से एक है मशरूम जिसकी खेती सीमित मात्रा में होती थी लेकिन बदलते समय के साथ किसानों की रूची मशरूम की खेती के प्रति बढ़ी है और अब पहले की तुलना में ज्यादा किसान मशरूम की खेती कर रहे हैं। मशरूम की खेती से किसान भाई बेहतर आमदनी भी कमा रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने दी सलाह
ऐसे ही एक शख्स है दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के रहने वाले हसनपुर गांव के किसान जिन्होंने पारंपरिक फसलों को छोड़ नकदी फसलों तरफ अपना रूख किया। खेती में आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया। जिससे आज वे लाखों की कमाई कर रहे हैं।
प्रगतिशील किसान मशरूम (बटन मशरूम) की खेती करते हैं। जैसा कि उनहोंने बताया कि वह भी अन्य किसानों की तरह पहले पारंपरिक फसलों की खेती किया करते थे। लेकिन इलाके में खारे भूजल के कारण खरीफ सीजन के दौरान उन्हें गेहूं और सरसों उगाने में संघर्ष करना पड़ता था। जिससे फसल के उत्पादन पर भी असर पड़ता था। खारे भूजल के कारण उनका फसल उत्पादन पहले के मुकाबले काफी कम हो गया था। जिसके बाद उन्होंने आईसीएआर-कृषि विज्ञान केंद्र दिल्ली के वैज्ञानिकों से इस संबंध में सलाह मांगी। दिल्ली के वैज्ञानिकों ने उन्हें पारंपरिक फसलों की खेती छोड़ कर मशरूम फार्मिंग का सुझाव दिया। जिसके बाद उन्होंने मशरूम की खेती शुरू की और आज वे इससे लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं।
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गांव के किसान की मेहनत
हसनपुर गांव के किसान ने 2016 में दिल्ली में आयोजित मशरूम की खेती पर एक व्यावसायिक प्रशिक्षण में भाग लिया। यहां से प्रेरित होकर और वैज्ञानिकों की सलाह पर उन्होंने अपने खेत में एक मशरूम इकाई स्थापित की। वैज्ञानिकों से नियमित सलाह लेते रहे और वह अपनी मशरूम इकाई में सुधार करते रहे। व्यावसायिक प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने 2016-17 में आईसीएआर-केवीके की देखरेख में 700 वर्ग फुट में एक बटन मशरूम उत्पादन इकाई स्थापित की। इसके लिए उन्हें केवीके की ओर से तकनीकी सहायता भी मिली।
वहीं अच्छी क्वालिटी के मशरूमों का उत्पादन करने के लिए उन्होंने आईसीएआर- मशरूम अनुसंधान निदेशालय सोलन से भी संपर्क किया। जिसके बाद उन्होंने अपनी हाई-टेक मशरूम इकाई को 900 वर्ग फुट से बढ़ाकर 5000 वर्ग फुट किया। शुरुआत में उन्होंने अपनी उपज को स्थानिय बाजार में ही बेचना उचित समझा। लेकिन बाद में उन्होंने दिल्ली-एनसीआर के रेस्तरां और मॉल में भी मशरूम की आपूर्ति शुरू की। जिससे उन्हें काफी अच्छा मुनाफा हुआ। उन्होंने अनुबंध के आधार पर उपभोक्ता की मांग को पूरा किया और मशरूम आपूर्ति के लिए बुकिंग पोर्टल भी बनाया।
अभी बाजार में मशरूम की कीमत 100 से 120 रुपये प्रति किलोग्राम है। जबकि ऑफ-सीजन में कीमत बढ़कर 160-180 रुपये प्रति किलोग्राम हो जाती है। फिलहाल हसनपुर के किसान अपनी इकाई से सालाना लगभग 54 हजार किलोग्राम मशरूम का उत्पादन कर रहे हैं। जिससे उन्हें 21 लाख की कमाई हो रही है। और उन्होंने देश भर के विभिन्न मशरूम उत्पादकों को काफी प्रभावित किया है। उन्होंने एनसीटी दिल्ली में उच्च गुणवत्ता वाले मशरूम उत्पादक उपलब्ध कराए हैं और एक सफल कृषि उद्यमी का दर्जा स्थापित किया है। वह किसानों को बटन मशरूम में नवीनतम तकनीकों को अपनाने के लिए भी प्रेरित करते हैं। मशरूम की खेती में रुचि रखने वाले या मशरूम उत्पादन शुरू करने के इच्छुक लोग उनकी केंद्र में आते हैं।
बेहतर खाद,बेहतर पैदावार
खाद जो कि गेहूं या चावल के निकले भूसे और कुछ केमिकल्स को मिलाकर तैयार कि जाती है। जिसके बनने में एक महीना का समय लगता है। खाद तैयार होने के बाद उसे कमरे में किसी सख्त जगह पर 6-8 इंच मोटी परत बिछाकर मशरूम के बीज लगाना होता है और उसे तैयार किए गए कंपोस्ट से ढकना होता है।

