
नयी दिल्ली: आज से सावन मास शुरू हो चुका है। इस मास का हिंदू धर्म में काफी मान्यता है और श्रद्धालु इस पूरे माह में भगवान शिव की आराधना कर उनका आर्शीवाद पाने की कामना करते हैं। क्योंकि हिंदू मान्यताओं में ऐसा माना जाता है कि सावन मास भगवान शिव को सबसे अधिक प्रिय है। जहां तक हिंदू पंचांग का सवाल है कहा जा रहा है वर्ष 2023 का श्रावण मास बेहद खास है, क्योंकि इस बार सावन मास 30 दिन का नहीं बल्कि 59 दिनों का रहेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू पंचांग विक्रम संवत 2080 के अनुसार इस साल अधिक मास पड़ रहा है जिसमें पूरे 13 महीने होंगे। विद्वानों का कहना है कि 19 साल बाद ऐसा संयोग बन रहा है कि जब सावन का महीना पूरे 59 दिनों का रहेगा।

शिवभक्तों के लिए अहम है सावन मास
सनातन धर्म और सनातन परंपराओं में विशेष महत्व रखने वाला सावन मास शिव भक्तों के लिए किसी पर्व से कम नहीं। भक्तों की ये धारणा होती है कि श्रावण मास में भगवान शिव सृष्टि का संचार करते हैं और इस दौरान वे न सिर्फ अपने भक्तों की आवाज को बड़ी ही आसानी से सुन लेते बल्कि उनकी हर कामना भी पूरी करते हैं। यही कारण है कि सावन मास में शिवलिंग का जलाभिषेक और दूध अभिषेक करना शुभ फलदाई माना जाता है।
4 जुलाई 2023 से शुरू हुआ है सावन मास
— पहला सोमवार 10 जुलाई 2023
— दूसरा सोमवार 17 जुलाई 2023
— तीसरा सोमवार 24 जुलाई 2023
— चौथा सोमवार 31 जुलाई 2023
— पांचवां सोमवार 7 अगस्त 2023
— छठवां सोमवार 14 अगस्त 2023
— सातवां सोमवार 21 अगस्त 2023
— आठवां सोमवार 28 अगस्त 2023
क्यों पसंद है भगवान शंकर को सावन मास का सोमवार
कहा जाता है कि भगवान शंकर में माथे पर सोम विराजमान है। सोम मतलब चंद्रमा। भगवान चंद्रमा को अपने सिर पर धारण करते हैं इस लिए उनका नाम शशि शेखर है। उन्होंने न बुध का धारण किया न शनिचर को धारण किया ना मंगल को धारण किया।
इससे जुड़ी प्रचलित मान्यता व कथा
एक दिन चंद्रमा सोम (चंद्रमा ) उनके पास आते हैं और कहते हैं कि मुझे राहु सता रहा है मेरी रक्षा करो। हम जानते है कि पूर्णमासी और दोज के चंद्रमा को ग्रहण लगता है। तो जब सोम राहु के डर से भागकर भगवान शिव के पास आए तो भगवान शिव ने कहा ” तुम्हारे अंदर जो अहंकार कि मैं बहुत तेज हूं और पूर्ण हूं इसी लिए राहु तुम्हे परेशान कर रहा है। तुम अहंकारी हो इसी लिए मैं भी तुम्हारी रक्षा नही कर सकता, भाग जाओ यह से!” फिर चंद्रमा भाग जाते हैं और जाकर लघु रूप धारण कर लिया तब भगवान शिव ने देखा कि चंद्रमा कितना विनम्र हो गया। इसी बात से खुश होकर भगवान ने उसे अपने सिर पर धारण कर लिया और चंद्रमा को सर्वत्र पूज्य बना दिया। हिंदू धर्म के लगभग सारे त्योहार चंद्रमा की स्थिति के अनुसार होते हैं यहां तक कि करवा चौथ और गणेश चतुर्थी आदि त्योहार बिना चंद्रमा के पूर्ण नही होते। हिंदू धर्म के साथ साथ इस्लाम में भी ईद के दिन चंद्रमा का महत्व है।
प्रमुख स्थान जहां भक्त करते हैं जलाभिषेक
वैसे तो सावन मास में देश भर के सभी शिवालयों में स्थानीय भक्त शिवलिंग पर जल एवं दूध चढ़ाते है लेकिन जलाभिषेक के लिए झारखंड स्थित वैद्यनाथ शिवलिंग बेहद ही खास है। झारखंड में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक वैद्यनाथ ज्योतिलिंग श्रावण मास में जलाभिषेक के लिए विख्यात है। कावड़िए गंगा नदी से जल भरकर बाबा धाम तक पैदल यात्रा करते हैं और जल को बिना जमीन पर रखे शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।
क्या है पूजन विधि
–सावन मास की किसी भी दिन को विशेषतः सोमवार को प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर बिना कटे- फटे व साफ-सुतरे 5, 7 या 9 आदि की संख्या में लें। अक्षत अर्थात बिना टूटे-फूटे कुछ चावल के दाने लें।
-साफ लोटे या पात्र में जल हो सके तो गंगा जल लें। तत्पश्चात अपनी सामर्थ्य के अनुसार गंध, चंदन, धूप, अगरबत्ती आदि लें।
-अगरबत्ती न लें तो अच्छा रहेगा, क्योंकि इसमें बांस की लकड़ी उपयोग की जाती है जिसे हिंदू धर्म में जलाना अशुभ माना जाता है। यह सब सामान लेकर शिव मंदिर जाएं। यदि नजदीक ही कोई शिव मंदिर न हो तो पीपल के वृक्ष के पास जाएं या बिल्व वृक्ष के पास जाएं।
सावन मास में समान लेकर मंदिर में प्रवेश करते समय मंत्र
‘अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशा।
सर्वेषामवरोधेन ब्रह्मकर्म समारभे।
अपसर्पन्तु ते भूताः ये भूताः भूमिसंस्थिताः।
ये भूता विनकर्तारस्ते नष्टन्तु शिवाज्ञया।’
शिवलिंग या पीपल या बेल के वृक्ष को धुल कर और निम्न मंत्र पढ़ते जाएं-
मंत्र- ‘गंगा सिन्धुश्च कावेरी यमुना च सरस्वती। रेवा महानदी गोदा अस्मिन् जले सन्निधौ कुरु।’
तत्पश्चात शिवलिंग या वृक्ष के ऊपर अक्षत चढ़ाएं और यह मंत्र पढ़ें-
मंत्र- ‘क्क अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया ऽअधूड्ढत। अस्तोड्ढत स्वभानवोव्विप्प्रान विष्ट्ठयामती योजान्विन्द्रते हरी।’
सावन मास में फूल चढ़ाए और यह मंत्र पढ़ते जाएं
मंत्र- ‘क्क औषधि प्रतिमोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः। अष्वाऽइव सजित्वरीर्व्वीरुधः पारयिष्णवः।’
हल्दी-चंदनादि जो भी उपलब्ध हो, उसका शिवलिंग पर लेप लगाएं और निम्न मंत्र पढ़ते जाएं-
मंत्र- ‘क्क भूः भुर्वः स्वः क्क द्द्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम् पुष्टि वर्धनम् उर्व्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतम्।’
भगवान को धूप अर्पण, बेलपत्र अर्पण करें… मंत्र पढें-
मंत्र- ‘काशीवास निवासिनाम् कालभैरव पूजनम्। कोटिकन्या महादानम् एक बिल्वं समर्पणम्। दर्षनं बिल्वपत्रस्य स्पर्षनं पापनाशनम्। अघोर पाप संहार एकबिल्वं शिवार्पणम। त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्। त्रिजन्मपाप संहारं एकबिल्वं शिवार्पणम।’
जल या गंगा जल चढ़ाएं _ मंत्र पढ़ें-
मंत्र- ‘गंगोत्तरी वेग बलात् समुद्धृतं सुवर्ण पात्रेण हिमांषु शीतलं सुनिर्मलाम्भो ह्यमृतोपमं जलं गृहाण काशीपति भक्त वत्सल।’
सबसे अंत में करें क्षमा-याचना _मंत्र
‘अपराधो सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निषं मया, दासोऽयमिति माम् मत्वा क्षमस्व परमेश्वर। आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर। मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर, यत्पूजितं मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे’
जो भक्त मंत्र नहीं जानता है, वह पूजा भी पूजा कर सकते हैं। बिना मंत्र पढ़े भी यह समस्त सामग्री भगवान को अर्पित की जा सकती है। केवल विश्वास एवं श्रद्धा होनी चाहिए।
भगवान भोलेनाथ ने स्वयं कहा है कि-
‘न मे प्रियष्चतुर्वेदी मद्भभक्तः ष्वपचोऽपि यः। तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्।’


