‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में’
– बशीर बद्र
शब्बीरपुर का नाम आते एक ही एक भयानक सा दृश्य आंखों के सामने सहसा नजर आने लगता है. जले हुए घर, टूटे दरवाजे, घरों का बिखरा सामान, कहीं कोई गाय दर्द से कराह रही है और अपने जीवन की अंतिम सांसे गिन रही है, क्या ये ही हकीकत है? शब्बीरपुर, सहारनपुर जिले का एक छोटा सा गांव, उत्तर प्रदेश की राजधानी से काफी दूर पर देश की राजधानी से सिर्फ 160 किलोमीटर और जिला मुख्यालय से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। लगभग 4000 की आबादी वाला गांव। आज तक देश इसे नहीं जानता था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से पूरा देश इस गांव को जानने लगा है।
दरअसल बीते एक महीने से यह गांव देश के दिग्गज नेताओं के लिए राजनीतिक पर्यटन का केंद्र बना है। यहां आने वाला हर नेता दलितों और ठाकुरों के बीच जातीय संघर्ष की बात कहकर सिर्फ राजनीति कर रहा है।
शब्बीरपुर की वास्तविक घटना है क्या? घटना क्यों हुई? कारण क्या थे? क्या महज यहां का बवाल दलितों और ठाकुरों के बीच बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्ति लगाने और महाराणा प्रताप की जयंती के मौके पर शोभायात्रा निकालने को लेकर हुआ? या फिर इस बवाल के कुछ और कारण थे। जब हम इस मामले की पड़ताल करने शब्बीरपुर गांव में पहुंचे तो हकीकत कुछ और निकली। टीम में कुछ पत्रकार और दिल्ली विशविद्यालय के शिक्षक थे। लगभग 6-7 घंटे गांव में बिताने के बात कुछ तथ्य सामने आए।
देश के बाकी गांवों की तरह शब्बीरपुर भी उन्हीं गांवों में से एक है। यहां भी जाति की जड़ता, मोहल्लों का बंटवारा मौजूद था। गांव के मुहाने पर जिस रास्ते से हम गए, पहले दलित समाज के घर थे और उसके बाद ठाकुरों के। बीच में एक सडक़ है। यह दोनों जातियों के बीच का बॉर्डर है।
दलितों के घर के पास ही पुलिस की छावनी थी, जहां उत्तर प्रदेश पुलिस, आरएएफ और सीआरपीएफ के जवान गश्त कर रहे थे। छावनी बने गांव में जब हम पहुंचे तो जय भीम के गीत गाए जा रहे थे और बहुत से बच्चे नाच रहे थे।
इस गांव की डेमोग्राफी को समझने के लिए गांव के लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि 1200 की आबादी यहां राजपूतों की है और लगभग 700 की आबादी दलितों की है, पिछड़ों में जोगी, निषाद आदि भी हैं। वैसे तो पूरा गांव हिंदू बहुल है, परंतु गांव में थोड़ी संख्या में मुसलमान भी हैं। जमीन पर अधिकार राजपूत ठाकुरों का है और वे आर्थिक रूप से संपन्न हैं। पर सभी ठाकुर सम्पन्न हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है। वही दूसरी ओर दलितों के पास भी जमीन है लेकिन ठाकुरों की तुलना में कम। अधिकतर दलित आबादी मजदूरी पर निर्भर है और बहुत अच्छी स्थिति में हो ऐसा नहीं है। शहर के करीब होने और दिल्ली के करीब भी होने के कारण गांव के युवाओं का शहरीकरण से संपर्क जरूर हुआ है। इस मामले में दलित और राजपूत युवकों में कोई खासा अंतर नहीं किया जा सकता है। गांव के कुछ दलित युवकों का ‘भीम आर्मी’ के प्रति झुकाव है। उन्होंने इसकी सदस्यता भी ले रखी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। भीम आर्मी के समर्थक युवा अरुण कुमार से पूछने पर मालूम चला कि वे भीम आर्मी के प्रति लगाव रखते हैं। अरुण ने बताया कि भीम आर्मी हमारे अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। इसलिए हमारा भीम आर्मी के प्रति लगाव है और इन दिनों हमारा और दलित समाज के लोगों का भीम आर्मी के प्रति आकर्षण और बढ़ा है। भीम आर्मी सहारनपुर के आसपास के कई स्कूलों को आर्थिक सहायता भी दे रही है, जिससे दलित बच्चे अच्छी पढ़ाई कर सकें. हमारे सवाल कि आपके गांव के स्कूल में भी भीम आर्मी ने कोई सहायता दी है? पर वो चुप हो जाते हैं। गांव के दलित परिवारों में तमाम हिन्दू देवी-देवताओं के साथ बाबा साहब आंबेडकर और संत रविदास के चित्र भी लगे हैं. आंबेडकर के बारे में कुछ पूछने पर वो बाबा साहब को अपना मुक्तिदाता बताते हैं, दलित युवाओं में कहीं ज्यादा बाबा साहब आंबेडकर के प्रति लगाव है।![]()

शब्बीरपुर ठाकुर बहुल गांव है। जाति की जड़ता को देखें तो अन्य गांवों की तरह इस गांव में भी वह मौजूद दिखाई देती है। ठाकुर समाज के लोग जातीय स्वाभिमान से पूरी तरह से लबरेज हैं. गांव में भ्रमण के समय हम एक स्थानीय डॉक्टर की दुकान पर बैठ गए, हालांकि डॉक्टर साहब किसी मरीज को पैरासिटामोल और किसी को डाइजीन की गोली से ज्यादा कुछ दे नहीं रहे थे पर उनकी दुकान पर मरीज आ ही रहे थे। हमारे ग्रामीण अंचलों की स्वास्थ्य सेवा की डोर इन्ही छोटे संदिग्ध डिग्री वाले डॉक्टरों के हाथों में होती है। ये ही गरीब-गुरबा लोगों के लिए भगवान होते हैं।
बहरहाल हम उन डॉक्टर के पास पहुंच गए, ये दुकान ठाकुरों के घरों के बीच में स्थित है और मरीज भी उस समय राजपूत ही आ रहे थे। हमने पूछना शुरू किया कि ‘ कैसे ये घटना हुई, इस गांव के पुराने प्रधान (जितेंद्र सिंह) ने कहा कि ”चमारों के लड़कों ने हमारे लड़कों से बदतमीजी की इसी कारण लड़ाई हुई।” परंतु बार-बार जातिसूचक शब्द कहना और उनको छोटी जात का मानना उनकी जातीय दंभ को बार-बार दिखा रहा था. उनके करीब बैठे एक साथी ने बताया कि हमारे गांव का तो प्रधान भी चमार है और उसके कारण ही ये सारी मुसीबत गांव में आई है. कितनी बदनामी हो रही है देश में गांव की, हमने तो चमारों को जमीन भी मुफ्त मे बांट दी थी. फिर भी ये मानने को राजी नहीं हैं।”
इसी तरह एक कश्यप समाज के परिवार के यहां जाना हुआ। उन्होंने कुछ और तथ्यों से अवगत कराया, ये धींवर जाति से थे। जो अपने को वेद व्यास का वंशज मानते हैं। ये जाति अब कहीं दलित हैं और कहीं पिछड़ी जाति में आती हैं। इनकी बातों में अजीब सा डर था, हालांकि इनके घर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया था। उन्होंने बताया—
‘‘साहब ये जो ठाकुरों के लोग हैं, इनको हम लोगों ने प्रधानी के चुनाव में हरा दिया। इन्हें यह बात बर्दाश्त नहीं हो रही है कि एक चमार का लड़का सामान्य सीट से चुनाव कैसे जीत गया।’’
इसी प्रकार की बात बबलू सिंह की दिव्यांग मां दलितों के लिए कह रही थी। कितने सारे लोग थे गंदी—गंदी गाली बक रहे थे। आज ठाकुरों का ये हाल कर देंगे। इनकी तो मां का ………….. ऐसी गाली दे रहे थे।
दोनों पक्षों के विचारों को जानने के बाद हमारे सामने यक्ष प्रश्न खड़ा था कि दोनों पक्षों में सच्ची बात कह कौन रहा है? इस सब ने हमारी उत्सुकता को और ज्यादा बढ़ा दिया। जब हम ठाकुरों के मोहल्ले में थे तो वे दलितों के खिलाफ बोल रहे थे और जब दलितों के मोहल्ले में थे तो वह ठाकुरों के खिलाफ बात कर रह थे। हमने आकलन लगाया कि किसका कितना नुकसान हुआ, उस आधार पर देखे कौन ठीक कह रहा है? ठाकुरों के यहां के नुकसान का आकलन करने निकले तो देखा कि एक परिवार में जहां भैंसे बांधी जाती हैं, उस फूस के छप्पर को दलितों की ओर से जला दिया गया था। इस परिवार में बीसीए की पढ़ाई पूरी कर चुकी एक लडक़ी थी। परिवार का एक सदस्य चिकित्सक के पेशे से संबंधित भी था. ये आर्थिक रूप से सम्पन्न और पढ़ा—लिखा परिवार था और बातचीत में पता चला कि इस परिवार के दो सदस्य हाल की घटना में जेल में हैं। इस परिवार की मुखिया एक दिव्यांग बूढी मां है, जो बता रही हैं— ”हमारे बच्चों ने कुछ नहीं किया। गांव के लोगों ने हमें फंसा दिया है। हमारा घर जलाने की कोशिश की गई। हमारे जानवरों के लिए बने फूस के छप्पर को जला दिया। ये कहो कि कोई जानवर उसके नीचे नहीं था उस समय।”
ठाकुरों की बस्ती में कोई घर तो नहीं जला हुआ मिला परंतु उपले वाले ढेरों को जरूर जला दिया गया था और ये घटना भी 23 मई को मायावती के आने के बाद ही हुई थी। ठाकुरों ने कहा कि हजारों संख्या में लोग थे ‘जय भीम’ के नारे लगा रहे थे और ठाकुरों को गंदी-गंदी गालियां दे रहे थे। एक ठाकुर युवक ने कहा कि हमारी बहन-बेटियों को भी नहीं छोड़ा, उन्हें भी गाली दे रहे थे। जब हद हो गई तो हमारे लडक़े भी निकले और थोड़ी सी वार में सारे भाग गए।
जब हम दलितों के मोहल्ले में गए तो तमाम घर जले मिले और जिनके घर बंद थे उनके दरवाजों को तोड़ दिया गया था। अंदर का सामान टूटा हुआ था। औरतें बता रहीं थीं — हमारे साथ बदतमीजी की गई, गंदी- गंदी गलियां दी गई, गांव के लोगों ने रोशन कुमार का घर दिखाया। जिनके घर को जला दिया गया और सारा समान तोड़ दिया गया था. एक गाय घर में बंधी थी, उस पर भी तेज धार वाले हथियार से वार किया गया था। गांव के ही धींवर समाज से संबंध रखने वाले जनक कश्यप का कहना था कि जितनी भी भीड़ थी, अधिक लोग बाहर के थे, तलवारों से हमला किया गया। जिसमें दलसिंह, श्याम, रानीपाल चमार और प्रधान शिवकुमार का लड़का संतराम ज्यादा जख्मी हुए। संतराम तो अभी भी देहरादून हॉस्पिटल में हैं।
इसी प्रकार एक महिला उर्मिला तिलक राम चमार ने अपने टूटे टीवी की ओर इशारा करते हुए बताया कि औरतों को भद्दी-भद्दी गाली दी और मार—पीट भी की गई। हमारा टीवी भी तोड़ दिया।
सहारनपुर पुलिस सी.ओ. सिद्धार्थ से बात हुई तो उन्होंने बताया कि चमारों और राजपूतों के कुछ लड़कों में लड़ाई हुई। इस लड़ाई में बाहर के लोगों ने हस्तक्षेप करके इसको और ज्यादा फैलाने का काम किया। सिद्धार्थ के अनुसार लड़ाई— बाबा साहब की मूर्ति लगाने के सवाल पर हुई मामूली कहा सुनी से शुरू हुई। 14 अप्रैल को दलित युवा लड़कों की टोली ने बाबा साहब अंबेडकर की मूर्ति को रविदास मंदिर में लगाना चाहा। जिसको राजपूत समाज के युवा लड़कों ने रोका कि आप ये मूर्ति बिना पुलिस, प्रशासन के अनुमति के नहीं लगा सकते। बढ़ता विवाद देख कर कुछ लोगों ने पुलिस को फोन कर दिया और पुलिस ने प्रशासन की अनुमति न होने के चलते दलित युवाओं को रोक दिया। इसी तरह जब 05 मई को महाराणा प्रताप की जयंती को लेकर निकाली जा रही शोभायात्रा जिसमें डी.जे. भी बज रहा था, गांव से होकर गुजरी तो उसको दलितों ने भी रोक दिया और पुलिस को सूचना दी। शोभायात्रा निकाल रहे लड़कों के पास भी कोई अनुमति नहीं थी। सो पुलिस को इन्हें भी रोकना पड़ा।
शोभायात्रा रोक दिए जाने के बाद, उस यात्रा में कुछ युवकों ने बाहर से यात्रा का इंतजार कर रहे लड़कों को बुलाया। जिसके बाद पत्थरबाज़ी की घटना हुई।
लड़ाई की असल वजह बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा को लगाने से ही शुरू हुई थी। दलित समाज के लोगो ने बताया कि वे 14 अप्रैल को बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा को रविदास मंदिर में लगाना चाहते थे। दलित समाज के युवकों ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। इसी पर युवा ठाकुरों ने आपत्ति की और बात बढ़ते—बढ़ते पुलिस तक आ गई। दलितों के पास प्रशासन की अनुमति न होने के कारण मूर्ति मंदिर में नहीं लग पाई। इस बात से बाबा साहब की मूर्ति लगाने के लिए प्रयासरत समाज आक्रोश में था। यह आक्रोश 05 मई को जब महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य मे शोभायात्रा निकाली जा रही थी, तब फूट पड़ा। दलित युवकों ने आगे बढ़कर इस शोभायात्रा को रोक दिया और पुलिस को सूचना दे दी। पुलिस ने प्रशासन की अनुमति न होने के कारण इस शोभायात्रा को भी रोक दिया। जैसे पहले आंबेडकर की मूर्ति लगाने को रोक लगा चुका था। इसी विवाद में राजपूत युवाओं और दलित लड़कों में आपसी धक्का मुक्की हुई और कुछ पत्थरबाज़ी भी हुई.
इसके कुछ बाद राजपूत युवकों ने वहां पास के शिमलाना गांव के महाराणा प्रताप इंटर कॉलेज में महाराणा प्रताप जयंती का कार्यक्रम का आयोजन कर रहे अपने साथियों को फोन कर दिया. इसके बाद सैकड़ों की संख्या में राजपूत समाज के युवक वहां पहुंच गए और संघर्ष प्रारंभ हुआ। इसी में दलितों के घरों को फूंक दिया गया। जिसकी शुरुआत दलसिंह के घर से हुई, जिनकी जाति चमार है। दलसिंह कहते हैं— ”मेरे यहां शादी हुई थी, इसलिए काफी मेहमान घर पर रुके थे। ठाकुरों ने हमारे घर पर आग लगा दी, जिसमें काफी सामान और घर जल गया।”
लगातार कई दशकों से चमार और राजपूत जाति के लोग इस गांव में साथ-साथ रहते आ रहे थे। इस घटना ने दोनों जातियों के बीच सामाजिक कटुता पैदा करने का काम किया।
यह आपसी विवाद दोनों समाज मिलकर सुलझा लेता लेकिन दिक्कत तब पैदा हुई जब भीम आर्मी का इस कहानी में प्रवेश हुआ। जिसने दलित नवयुवकों को आंदोलित किया. गांव के प्रधान शिव कुमार दलित परिवार से आते हैं. उनको बीएसपी के जिला अध्यक्ष का खासमखास माना जाता है। ऐसा गांव के लोगों ने बताया। घटना के इतना बड़ा रूप लेने में, इन प्रधानजी का भी बड़ा हाथ साफ दिखा। लोगों का कहना था कि प्रधानजी चाहते तो ये संघर्ष टाला जा सकता था। गांव के एक बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा, ”अरे लड़ाई तो नए लुंडेरों (नए लड़कों) मे थी। प्रधान ठाकुरन के लोंडोन की जगह उनके मां–बापू से बात कर बात को खत्म कर देता पर उसने मामले को बढ़ाने को काम किया है।”
गांव के तमाम लोगों और पुलिस से मिली जानकारी में शब्बीरपुर का कोई भी व्यक्ति इस संघर्ष में नहीं मरा है। जिस एक राजपूत लड़के की मौत हुई है, वो गांव रसूलपुर का है। शब्बीरपुर का नहीं है। इस राजपूत युवक की मौत भी
किसी हमले में नहीं बल्कि गर्मी और सांस लेने में हुई दिक्कत से हुई है। ऐसा मेडिकल रिपोर्ट बयान कर रहा है। खबरों में 23 मई को जिस दलित युवक की हत्या की बात आ रही है, वह युवक भी इस गांव का नहीं है। इस पूरे गांव से प्रधान का लड़का संतराम ही अभी स्वास्थ्य लाभ के लिए अस्पताल में है। इनके अलावा गांव के तीन लोग दल सिंह, श्याम, रनीपल सभी वापस गांव में आ गए हैं।
समाज में खेमेबाजी हो गई है। एक तरफ बाबा साहब के मानने वाले समाज के लोग हैं तो दूसरी तरफ महाराणा प्रताप के समर्थक वर्ग। शब्बीरपुर की घटना सामाजिक और राजनीति के गिरते मूल्यों का परिणाम हैं। आज निरंतर समाज में बढ़ती दूरियां और आपसी द्वेष ने समाज को मूर्तियों, रंगों और खानपान के बंटवारों में उलझा दिया है। इस तरह की तमाम घटनाएं हमारे सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती हैं कि हम कैसे समाज में एकता और साहिष्णुता लाएं। चंद मुट्ठी भर लोग व्यक्तिगत लाभ और लोभवश मुद्दों को तिल का ताड़ बना रहे हैं। यह घटना सिर्फ जातिगत संघर्ष की लड़ाई ही नहीं बल्कि आपसी अहंकार की लड़ाई ज्यादा दिखाई पड़ती है। जहां एक ओर देश के प्रधानमंत्री के अथक प्रयत्नों ने विकास को एक जन आंदोलन बनाया। वहीं ऐसी घटनाएं थोड़े से राजनीतिक लाभ से प्रेरित होकर भारतीय समाज को कमजोर करती हैं। दलितों पर अत्याचार कोई आज की बात नहीं है, पर यह संघर्ष साफ तौर पर आपसी रंजिश एवं वर्चस्व का है। बदलती परिस्थितियों में समाज को एकजुट होकर अपने सपनों का भारत बनाने की ओर अग्रसर होना पड़ेगा। जिसके लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को, समाज के अंतिम व्यक्ति को विकास की मुख्य धारा में लाना होगा। इससे ही सबका साथ सबका विकास का स्वप्न साकार हो पाएगा।
फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट
दिन शुक्रवार 2
6 मई को सुबह 6 बजे मीडिया स्कैन के तत्वावधान में दयाल सिंह कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में राजनीति विज्ञान विषय के प्राध्यापक डॉ. प्रवेश कुमार के नेतृत्व में आठ सदस्यों की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम सहारनपुर के लिए रवाना हुई और पूरे दिन सहारनपुर में बिताने के बाद इस टीम ने कई जानकारियां इकट्ठी की। टीम के लिए यह बात चौंकाने वाली थी कि जिस संघर्ष को मीडिया से लेकर कथित तौर पर दलितों से सहानुभूति रखने का दावा करने वाला समूह जातीय संघर्ष का नाम दे रहा है, उस संघर्ष में कई तत्व शामिल हैं। इसकी तफ्तीश डॉ. प्रवेश कुमार की टीम ने की है। इस ग्राउंड जीरो रिपोर्ट को युवा पत्रकार केशव कुमार ने संपादित किया है। (मीडिया स्कैन से साभार)
