
purple blotch disease: किसानों के लिए प्याज प्रमुख नगदी फसल है। इसकी खेती रबी एवं खरीफ दोनों सीजन के दौरान की जाती है। लेकिन मौसम के बदलाव के कारण प्याज की फसल में पर्पल ब्लॉच रोग तेजी फैल रहा है। जिसे फसल का विकास रुक जाता है। और फसल उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रोग की गंभीरता को कम करने और फसल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इसका उपाय ज़रूरी करना चाहिए। हालांकि कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि पर्पल ब्लॉच रोग की रोकथाम के लिए किसानों को इस रोग के लक्षण मिलते ही तुरंत उपाय करना होगा। नहीं तो ये रोग फसल को पूरी तरह से बर्बाद कर देगा। ऐसे में आइए जानते है की पर्पल ब्लॉच रोग के लक्षण क्या है। और रोकथाम के लिए क्या करना चाहिए।
रोग के लक्षण
प्याज में लगने वाला ये कीट काफी खतरनाक होता है। इसकी पहचान कि बात करें तो शुरूआत में छोटे, पानी से भरे हल्के पीले धब्बे दिखाई देते हैं। ये धब्बे धीरे-धीरे बढ़कर भूरे या बैंगनी रंग के हो जाते हैं। चारों ओर पीले रंग का घेरा बनता है। जिसमें पत्तियों पर बहुत छोटे गंभीर संक्रमण होने पर पत्तियां सूख जाती हैं। तने भी प्रभावित होते है। पत्तियों को समय से पहले सुखाकर बढ़ोतरी को रोक देता है। जिससे उत्पादन में कमी आती है।
पर्पल ब्लॉच रोग का प्रसार
यह रोग मुख्य रूप से मौसम में बदलाव के कारण तेजी से फैलता है। जैसे हवा, संक्रमित पौधों के अवशेष, और नमी के कारण फैलता है। उच्च आर्द्रता 80-90 प्रतिशत, 18 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान, और बारिश या भारी सिंचाई, रोग के प्रसार को तेज करती हैं।
रोग प्रबंधन के उपाय
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया की फसल चक्र को अपनाएं प्याज को अन्य फसलों के साथ चक्रीय रूप से उगाएं। खेत में पुराने पौधों के अवशेषों को हटा दें। ये रोग का मुख्य स्रोत होते हैं। खेतो में साफ सफाई रखें और खेत में पानी का जमाव न होने दें। हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने कहा की नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, और पोटाश का संतुलित मात्रा में उपयोग करें। नाइट्रोजन की अधिकता रोग के प्रकोप को बढ़ा सकती है।
प्रतिरोधी किस्मों का चयन
अपने क्षेत्र के हिसाब से विशेष संस्तुति रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें। जैसे प्याज की एग्रीफाउंड गहरा लाल और अर्क कल्याण प्रतिरोधी किस्में रोग के प्रसार को रोकने में मदद करती हैं।
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जैविक प्रबंधन
ट्राइकोडर्मा जैसे जैव-एजेंट का उपयोग करें। ट्राइकोडर्मा, पर्पल ब्लॉच रोग के रोगजनक पर नियंत्रण पाने में सहायक है। अगर रोग ज्यादा है। तो आप नीम के तेल का 5% निमोल का छिड़काव करें। इसके अलावा जैविक खाद का उपयोग पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।
रासायनिक प्रबंधन
रोग के प्रकोप की प्रारंभिक अवस्था में निम्न रासायनिक फफूंदनाशकों का उपयोग करें। जैसे मैनकोजेब 75 WP की 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। या प्रोपिकोनाज़ोल 25 EC की 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। या क्लोरोथैलोनिल नामक कवकनाशक की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल पर दो बार ही करें।
सिंचाई प्रबंधन
सुबह के समय ड्रिप सिंचाई का उपयोग करें। साथ ही ओवरहेड सिंचाई (स्प्रिंकलर) से बचें, क्योंकि यह पत्तियों पर नमी बढ़ाकर रोग को बढ़ावा देती है।
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रोग रोकथाम के सुझाव
किसान अपने खेतों की निगरानी जरूर करें प्रारंभिक अवस्था में लक्षण देखकर रोग का प्रबंधन शुरू करें। बुवाई से पहले बीज का उपचार जरूरी है। बीज को थायरम या कैप्टन (2 से 3 ग्राम/किलो बीज) से उपचारित करें। पौधा संरक्षण करते रहे है। 30 से 35 दिन की फसल पर फफूंदनाशकों का छिड़काव करें। खेतों का उचित रखरखाव करें खरपतवार और रोग फैलाने वाले कारकों को नियंत्रित करें।




