प्रत्येक वर्ष जब ‘प्रथम’संस्था द्वारा असर रिपोर्ट जारी होती है, तो चर्चा इस बात को लेकर होती कि कितने बच्चे अपनी कक्षा के पाठ्य सामाग्री को पढ़ पाते हैं, बच्चों की गणितिय गणना कैसी है, उनका उच्चारण कैसा है, स्कूल की व्यवस्थाएं कैसी हैं। स्कूल में लाईब्रेरी है कि नहीं। शौचालय कि क्या स्थिति है,यदि स्कूलों में शौचालय है तो कितने फीसदी लड़के और लड़कियां इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन इस वर्ष प्रथम ने ‘असर’ रिपोर्ट जारी नहीं किया। हालांकि ऐसा भी नहीं है असर ने असर डाला हो। रिपोर्ट जारी करने के बजाय इस बार प्रथम संस्था और असर सेंटर द्वारा ‘लाखों में एक अभियान’ के जरिए असर मात्र 3 माह में देश के डेढ़ लाख गांवो में जाकर समुदाय को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लाखों में एक अभियान के साढ़े तीन लाख स्वयंसेवक लगभग एक करोड़ बच्चों तक पहुचा।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इसका उद्देश्य क्या था। असर की ब्रांड अंबास्डर वहीदा रहमान कहती हैं कि ‘यदि हमारे गांव में बच्चे नहीं पढ़ते तो उनको मदद करना हमारा फर्ज है। वहीदा ने कहा कि लाखों में एक अभियान का यह सिलसिला जारी रहे। शिक्षा देना एक ऐसी जायदाद है जो आपसे कोई छीन नहीं सकता। हम इसके जरिए बच्चों का भविष्य गढ़ते हैं। मुंबई में सरकारी स्कूलों में बच्चों और बच्चों के बीच उनके आर्थिक स्थिति के अनुरूप भेदभाव किया जाता है। हालांकि छत्तीसगढ में अब बड़ी संख्या में लड़कियां स्कूल जाने लगी है। वहीदा की अपील है..मै भी लाखों में एक हूं, आप भी लाखों में एक बनिए।मैं इस काम के लिए देश में कहीं भी जाने को तैयार हूं।’
तीन लाख से ज्यादा वोलंटियर..गांव में घूमने के दौरान सबके अपने—अपने अनुभव..उद्देश्य लोगों के शैक्षणिक स्तर को बढ़ाया जाए। बच्चे ठीक से पढ सकें। लेकिन इसके लिए समाज को खुद आकर जुड़ना होगा। पढता लिखता गांव बनाना होगा। केवल कमियां ढूढना नहीं बल्कि लिखने, सीखने, पढ़ने में आ रही कमियों का स्थाई निदान। इसके लिए लाखों में एक अभियान के तहत 17 जनवरी से 25 जनवरी के बीच 25000 हजार समुदायों में रीडिंग वीक का आयोजन किया। इन समुदायों में बच्चों के शैक्षणिक अभिरूची को बढ़ाने वाले ऐसे गतिविधि चलाये गये जो न सिर्फ बच्चे, बल्कि उनके माता—पिता भी आसानी से कर सके। पंजाब के अनुभव सुनाते हुए वहां की कॉडिनेटर ने कहा कि हम गांव में वो गतिविधियां कर रहे हैं जो अब तक निजी स्कूलों में होता आया है
झारखंड के कॉडिनेटर सूरज बताते हैं कि प्रदेश में लाखों में एक अभियान की टीम 4,234 गावों में पहुंची है। जिसमें 4,093 ग्रामीण क्षेत्र के गांव हैं वही 141 शहरी गांव है। इस अभियान में 9,897 वोलंटियर लगे हुए हैं। इस दौरान हम 2,08,648 बच्चों तक पहुंचे। मात्र सिंहभूम में 1300 गांवो में लाखों में एक अभियान की टीम पहुंची। सबसे बड़ी बात है कि सभी टीमों में आधे से ज्यादा महिलाएं है।
चलो बिहार अभियान के तहत 300 लोग लाखों में एक अभियान से जुड़कर बिहार में काम कर रहे है। बिहार में यह टीम 15,335 गांवो में पहुंची। जिसमें ग्रामीण क्षेत्र के 13,716 गांव और शहरी क्षेत्र के1,619 गांव है। इस अभियान में 41,014 वोलंटियरों ने योगदान दिया। इस दौरान कुल 1,88,590 बच्चों को इस अभियान से जोड़ा गया। हाल ही में नालंदा से लौंटी केन्या की सारा कहती हैं एक शिक्षक जो यह समझता है कि वह बदलाव ला सकता है, वही लाखों में एक है।
‘लाखों में एक’ अभियान का महत्व इस बात में भी है कि आज देश में लगभग 96 फीसदी बच्चों का स्कूल में नामांकन है। लेकिन जब हम उनकी शैक्षणिक स्तर को जांचते हैं तो पता चलता है कि वे ठीक से सीख नहीं पा रहे हैं। और यदि वे ठीक से सीख नहीं पा रहे हैं तो स्कूलों में किया गया निवेश लोगों, परिवारों और समुदाय को कोई लाभ नहीं दे पाएगा। इस समस्या से तभी पार पाया जा सकता है जब समुदाय अपने बच्चों के प्रति,उनके शिक्षा के प्रति जागरूक हो तभी हम सही मायने में लाखों में एक हो सकते हैं।


