एक बार फिर से केंद्र सरकार बजट निर्माण की प्रक्रिया में लगी होगी। निश्चित रूप से गांव और किसानों की भी इस बजट से अपेक्षाएं होंगी क्योंकि भारत गांवो का देश है। इसी परिप्रेक्ष्य में आज प्रज्ञा संस्थान ने एक परिचर्चा का आयोजन किया। परिचर्चा में पूर्व केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री सोमपाल शास्त्री ने बजट निर्माण की प्रक्रिया,गांव और खेती किसानी की जरूरतें,अभी तक किये जा रहे आवंटन पर विस्तार से अपनी बात रखी।

सोमपाल शास्त्री ने कहा कि बजट के दो निहितार्थ हैं एक तो है भौतिक जरूरतें और दूसरी उससे जुड़ी सामाजिक अपेक्षाएं। शास्त्री ने कहा कि कल्याण कारी राज्य अपने शासन के जरिए संसाधन इकटठा करता है,और जहां अभाव है ,उसकी पूर्ति करता है। सबसे बड़ा सवाल है कि बार—बार यह कहा जाता है कि खेती लाभकारी नहीं है, लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं होती कि कोई भी व्यवसाय हो वही अच्छा माना जाता है जिसमें 5 वर्ष में लागत मूल्य की वापसी हो जाए। जबकि खेती में लगा हुआ पैसा मात्र दो साल में वापस आ जाता है। यदि यही पैसा लघु सिंचाई में लगाया जाये तो 6 माह में पैसा वापस आ जाता है और कृषि की उत्पादकता 2.35 प्रसेन्ट बढ़ जाती है। यह तो रही आर्थिक उत्पादकता की बात। इसका सामाजिक पहलू भी है। यदि आप कृषि में पैसा लगाते हैं तो वह किसी भी चीज की तुलना में ज्यादा रोजगार पैदा करता है। उन्होंने कहा कि पूरे सेवा क्षेत्र में 9 फीसदी लोगों को रोजगार मिलता है, जबकि 81 फीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में रोजगार पाते हैं, इसमें से भी 52 फीसदी लोगों को रोजगार कृषि के जरिए मिलता है।

72 फीसदी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, मतलब वोट बैंक की राजनीति करने वालों को भी यह समझ लेना चाहिए कि वोट गांव में है। और यदि आप 72 फीसदी लोगो को संबोधित नहीं करते तो समता कैसे आयेगी। कृषि ही ऐसा क्षेत्र है जहां रोजगार सृजन की संभावना है, यदि यह नहीं हुआ तो समावेशी विकास का सपना पूरा नहीं होगा। यह बात जीडीपी से तय नहीं हो सकती कि अतिरिक्त आय किसके पास जा रहा है। यदि हम कृषि की महत्ता की बात करें तो यह विदित है कि 72 फीसदी लोग गांव में रहते है। कृषि का योगदान जीडीपी में 14 फीसदी है। निर्यात में योगदान 12 फीसदी है।
बार—बार यह कहा जाता है कि गांवो में विकास के लिए सरकार पैसा दे रही है, जबकि गांव में स्थित बैंक की शाखाओं में जितना पैसा जमा होता है उसका 30 फीसदी ही गांवो को ऋृण के रूप में मिलता है जबकि 70 फीसदी पैसा गांव से बाहर भेज दिया जाता है। उद्योग धंधो के लिए जो चीजें बनती है उसका 46 फीसदी बाजार तो गांव में है। आप मेक इन इंडिया की बात करते हैं लेकिन खरीदार तो विश्व में है ही नहीं। वो तो आपके गांव में है, जिसके विकास पर आपका कोई ध्यान नहीं है।
विगत दो वर्षो में खेती को हर तरह से नुकसान हुआ है। मौसम, अतिवृष्टी, ओला वृष्टी, सुखा सब तरह से नुकसान हुआ है। बासमती की बेहतरीन किस्मों का भी मंडी में खरीदार नहीं है। सारी मंडियां बेजार परी हुइ है। ग्रामीणों की क्रय शक्ति कम हुई है। मनरेगा ने सभी को ग्रामीण कामकाजी लोगों को महात्मा बना दिया है। मजदूर के हांथ में नकदी आने के कारण शराब की प्रवृति बढ़ी हैं
क्या किया जाना चाहिए
हमारी 60 फीसदी कृषि आज भी वर्षा पर निर्भर है। हरित क्रांति की बात होती है लेकिन हरित क्रांति में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता उन्ही ईलाकों में बढ़ी जहां सिचाई की सुविधा थी। वर्षा पर आधारित कृषि में जहां उत्पादकता 1.2 टन प्रति हेक्टेयर होती है वहीं जहां सिंचाई है वहां उत्पादकता 4 टन प्रति हेक्टेयर प होती है। यहां तक कि कुछ ईलाकों में तो 12 टन प्रति हेक्टेयर तक भी धान की उत्पादकता देखी गयी। इसलिए खेती को लाभकारी बनाने के लिए लघु सिंचाई योजनाओं में खर्च करना होगा। हर खेत को पानी दें तो उत्पादकता खुद बखुद बढ सकता है। यदि सिचाई योजनाओं पर 5 लाख करोड़ का बजटीय आवंटन हो तो ढाई मिलियन हेक्टेयर भूमि को सिंचा जा सकता है। यदि 50 हजार करोड़ प्रति वर्ष जल परियोजना पर ख्रर्च किया जाए तो हम 10 साल में अमेरिका को पीछे छोड़ देगें। शहरों पर दबाव कम होगा, पलायन रूकेगा अटल बिहारी वाजपेयी के समय में शुरू की गयी ग्राम सड़क योजना से खेती को काफी फायदा हुआ। गांव और किसान मंडियों से जुड़े। हमने पंचायती राज के जरिए सोचा था कि गांव में विकास होगा, विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन आज पंचायतें भ्रष्टाचार का अडडा बन गयी है। पंचायत चुनाव में करोड़ो खर्च किये जा रहे है। प्रत्येक गांव की योजना उस गांव को ईकाई मानते हुए बनाई जाएं।
जिस गांव की जैसी जरूरत वैसी योजना बने, गांव की योजना, गांव की सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य,खेती की जरूरतों कोपूरा करे। गांव से ब्लॉक, ब्लॉक से जिला स्तर पर योजनायें बने। जहां जिसकी जरूरत हो, वहां उसे दिया जाए। तभी गांव विकास का सपना पूरा हो सकेगा और बजट के जरिए सामाजिक अपेक्षाएं पूरी हो सकेंगी।
कार्यक्रम का संचालन संस्था के सचिव राकेश कुमार सिंह ने किया।