किसान भाईयों को पसंद आ रही है बौछारी सिंचाई विधि

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  • स्प्रिंकलर प्रणाली से पानी के बूंद-बूंद को होता है उपयोग
  • खेती व गृह वाटिका तथा बागवानी के लिए वरदान जैसी

    पंचायत खबर टोली
    मउ :किसानों को खेती किसानी के लिए पानी की आवश्यकता होती है। किसान खेतों को पानी देने के लिए परेशान रहता है। जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है वहांं अधिक जल के दोहन की संभावना होती है। इस बीच हमारा किसान भाई भूगर्भ जल के दिनों दिन गिरते जलस्तर से परेशान हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने किसान  भाईयों के इस समस्या को देखते हुए गिरते भू-गर्भ जलस्तर के बीच खेती के कार्यों मे जल बचाव के लिए  ने कई नवीन विधियों का निर्माण किया है। इस बीच महकमा इस बात के लिए प्रयासरत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजन वन ड्राप मोर क्राप का अनुसरण करते हुए स्प्रिंकलर विधि से खेती-किसानी किए जाने का बढ़ावा दिया जाये। किसानों में भी यह विधि लोकप्रिय हो रही है। इसके जरिए सिंचाई की सामान्य विधि से आधा से भी कम जल का उपयोग कर भरपूर फसल प्राप्त की जा सकती है। गृह वाटिका व बागवानी के लिए यह विधि वरदान सदृश है। पूर्वोत्तर भारत में इसके प्रति जागरुकता न होने के कारण इस अधुनातम तकनीकी का प्रयोग अभी नहीं हो रहा है। इसको बढ़ावा दिए जाने के लिए विभाग द्वारा 50 प्रतिशत का अनुदान प्रदान किया जा रहा है।

  • क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक
    उपकृषि निदेशक डाॅ. आशुतोष मिश्र बताते हैं कि हमारे यहां बौछारी और बूंद-बूंद सिंचाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाए तो न केवल उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। बल्कि कृषि की उन्नत तकनीक भी विकसित की जा सकती है। असमतल भूमि और ऊंचाई वाले क्षेत्र में भी बौछारी प्रणाली से खेती की जा सकती है। इस तकनीक से श्रम की भी बचत होती है। बौछारी से पानी सीधी पौधों पर ही गिरता है। ऐसे में खरपतवार पर नियंत्रण रहता है। बीमारियों और कीड़े-मकोड़ों की संभावनाएं कम रहती हैं। कृषि में इस तकनीक के उपयोग से फसल पैदावार एवं गुणवत्ता में वृद्धि के साथ उत्पादन लागत में भी कमी आएगी। बौछारी सिंचाई पद्धति में मुख्य भाग पंप, मुख्य नली, बगल की नली, पानी उठाने वाली नली एवं पानी छिड़काव वाला फुहारा होता है।
    सिंचाई प्रणाली की क्रिया विधि
    बौछारी सिंचाई में नली में पानी दबाव के साथ पंप द्वारा भेजा जाता है जिससे फसल पर फुहारा द्वारा छिड़काव होता है। मुख्य नली बगल की नलियों से जुड़ी होती है। बगल की नलियों में पानी उठाने वाली नली जुड़ी होती है। पानी उठाने वाली नली जिसे राइजर पाइप कहते हैं। इसकी लंबाई फसल की लंबाई पर निर्भर करती है। फसल की ऊंचाई जितनी रहती है राइजर पाइप उससे ऊंचा हमेशा रखना पड़ता है। इसे सामान्यतः फसल की अधिकतम लंबाई के बराबर होना चाहिए। पानी छिड़काव वाले हेड घूमने वाले होते हैं जिन्हें पानी उठाने वाले पाइप से लगा दिया जाता है। पानी छिड़कने वाले यंत्र भूमि के पूरे क्षेत्रफल पर अर्थात फसल के ऊपर पानी छिड़कते हैं। दबाव के कारण पानी काफी दूर तक छिड़क जाता है। जिससे सिंचाई होता है।
    स्प्रिंकलर सिंचाई से लाभ
    बौछारी सिंचाई के निम्नलिखित लाभ हैं। जैसे-सतही सिंचाई में पानी खेत तक पहुँचने में 15-20 प्रतिशत तक अनुपयोगी रहता है। सिंचाई में एकसा पानी नहीं पहुँचता जबकि बौछारी सिंचाई से सिंचित क्षेत्रफल 1.5 -2 गुना बढ़ जाता है अर्थात इस विधि से सिंचाई करने पर 25-50 प्रतिशत तक पानी की सीधे बचत होती है। इस विधि में सिंचाई के पानी के साथ घुलनशील उर्वरक, कीटनाशी तथा जीवनाशी या खरपतवारनाशी दवाओं का भी प्रयोग आसानी से किया जा सकता है। पाला पड़ने से पहले बौछारी सिंचाई पद्धति से सिंचाई करने पर तापक्रम बढ़ जाने से फसल का पाले से नुकसान नहीं होता है।पानी की कमी, सीमित पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में दुगुना से तीन गुना क्षेत्रफल सतही सिंचाई की अपेक्षा किया जा सकता है।

  • रखरखाव एवं सावधानियां
    डा.मिश्र बताते हैं कि बौछारी सिंचाई के प्रयोग के समय एवं प्रयोग के बाद परीक्षण कर लेना चाहिए और कुछ मुख्य सावधानियाँ रखने से सेट अच्छी तरह चलता है। प्रयोग होने वाला सिंचाई जल स्वच्छ तथा बालू एवं अत्यधिक मात्रा घुलनशील तत्वों से युक्त नहीं होना चाहिए तथा उर्वरकों, फफूंदी, खरपतवारनाशी आदि दवाओं के प्रयोग के पश्चात सम्पूर्ण प्रणाली को स्वच्छ पानी से सफाई कर लेना चाहिए। प्लास्टिक वाशरों को आवश्यकतानुसार निरीक्षण करते रहना चाहिए और बदलते रहना चाहिए। रबर सील को साफ रखना चाहिए तथा प्रयोग के बाद अन्य फिटिंग भागों को अलग कर साफ करने के उपरान्त शुष्क स्थान पर भण्डारित करना चाहिए।
    50 प्रतिशत अनुदान उपलब्ध
    डा. मिश्र ने बताया कि सामान्य सिंचाई की विधि में जल का हो रहे दोहन को रोकने के लिए यह विधि बहुत ही प्रभावी है। गृह वाटिका व बागवानी के साथ खेती में विशेष रूप से दलहन की फसल के लिए यह विधि सर्वाधिक प्रभावी है। इस विभाग द्वारा स्पिंकलर सिस्टम पर 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जा रहा है। इस बाबत इस वर्ष परियोजना का प्रस्ताव बनाकर शासन को प्रेषित कर दिया गया है। इसकी स्वीकृति भी प्राप्त हो गई है।

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